मंगलवार, 28 जनवरी 2020

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - दिसंबर, २०१९

  श्रेष्ठ हिंदी  हाइकु दिसंबर २०१९

प्रत्येक  पौधा
पर्यावरण हेतु
 बना है योद्धा
       बलजीत सिंह
युग बदला
देह मात्र ही रही
आज भी नारी
      -सुरंगमा यादव
जागा संसार
गंध बाँट सो गया
हरसिंगार
      -शिव जी श्रीवास्तव
उम्र पोनी  से
बुने मृत्यु चादर
काल पुरुष
      -शिव जी  श्रीवास्तव
नियत अच्छी
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी
      -बलजीत सिंह
मीठे कड़वे
सुर में है बजती
मन की वीणा
      -प्रियंका ...अद्वैता
नभ ने खोला
अपना वातायन
झांका सूरज
       -सुरंगमा यादव्
छलक उठे
देख जलती धरा
मेघों के नयन
   -राजीव गोयल
विकास रथ
वन्य जीवन पथ
रौंद के चला
   -सुरंगमा यादव
शीत की धूप
मुंडेर से उतरी
झाँक के भागी
      -सुरंगमा यादव
बढ़े जो पैसे
घटता चला गया
जीवन मूल्य
      -अभिषेक जैन 
मौसम टाँके
हवा के आँचल पे
शीत के बूटे
      -आभा खरे
सर्द हवाएं
मंजीरा बनकर
दांत बजाएं
      -सुरंगमा यादव
फूले किवाड़े
गरमी का ताव देख
एंठना भूले
       -सुरंगमा यादव
ऊंची कुर्सियां
सुनने लगी ऊंचा
 मची तबाही
      -सुरंगमा यादव
सर्दी डायन
निकली है  रात में
ढूँढे  शिकार
       -राजीव गोयल
दीपक -बाती
प्रकाश गीत गाते
जब मिलते
        -सुरंगमा यादव
सर्दी की शाम
मफलर घूमते
गप्पें हाँकते
      -रमेश सोनी
 अलाव तापे
पूस रातों की यादें
कहानी किस्से
      -रमेश कुमार सोनी
प्यार है तो
कभी तुम आओ  न
मेरे दिल में
      -निगम राज
सर्दी की धूप
मुख्य अतिथि जैसे
थोड़ा ठहरे
      -सुरंगमा यादव
जग जीवन
हम सब कृषक
बोते-काटते
     -सुरंगमा यादव
लगाने न दे
गरीबों को सरदी
भूख की आग
       -राजीव गोयल
घोसले में भी
असुरक्खित  चिडी
कैसा समय
      -सुरंगमा यादव
ठिठुरा दिन
पाला ग्रसित रात
झुलसे पात
        -सुरंगमा यादव
 ताके आकाश
कितना वैभव है
धरा के पास
       -सुरंगमा यादव
रंगीन यादें
बचपन की मेरी
कंचों में कैद
      -राजीव गोयल
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शनिवार, 30 नवंबर 2019

श्रेष्ठ हिंदी हाइकू अक्तूबर नवम्बर २०१९

श्रेष्ठ हिंदी हाइकू अक्तूबर नवम्बर  २०१९

बच्चों का घर
दीवारों पर उभरे
ख़्वाब सुन्दर
   -राजीव गोयल

सूर्य से मिली
कई दिनों के बाद
धरती खिली
  -सुरंगमा यादव

गढ़ी है फांस
निकाल देगी शीघ्र
वक्त की सुई
  -सुरंगमा यादव

कन्या का जन्म
मरूस्थल  में जैसे
पानी का सोता
   -सुशील शर्मा

तुम आये तो
व्यथाएं लग रहीं
भूली कहानी
   -सुरंगमा यादव

कच्ची मिटटी है
संवार दो नेह से
बस दो प्यार
  -भावना सक्सेना

सागर तट
घर रेती का टूटा
हंसता बच्चा
   -तुकाराम खिल्लारे

उंची हवेली
उजाला छिटक के
कुटी  में  घुसा
  -सुरंगमा यादव

न तुम न मैं
कौन भूल पाया है
बीता समय
  -अमन चांदपुरी (श्रद्धा सुमन सहित )
पीर पर्वत
लांघ कर मिलेगा
सुख निर्झर
      -सुरंगमा यादव
उषा उतरी
सतरंगी डोली में
गीतिका झरी
      -पुष्पा सिन्धी
भाव प्रवाहल ल 
दूर बहा ले गया
मन तारिणी
        -सुरंगमा यादव
वक्त की मार
मुसीबत में मोम
अग्नि से प्यार
         -बलजीत सिंह
चाँद आया तो
उछल  पडा कैसे
देखो सागर
   -सुरंगमा यादव
नहीं ठिकाना
घर से जो निकले
टूट के पत्ते
   -सुरंगमा यादव
नारी न होती
पीडाओं को आश्रय
मिलता कहाँ
    -सुरंगमा यादव
दर्द या प्रेम
जीवन में समाये
ढाई आखर
    -सुरंगमा यादव
मिटटी के दिए
तमस के राज्य को
मिली चुनौती
   -सुशील शर्मा
नन्हे दिए ने
अँधेरे को भगाया
बिना डर के
   -मुकेश शर्मा
किया कमाल
दीपकों ने ठोंकी है
तमों से ताल
   -संतोष कुमार सिंह
धरा के दिए
जलते देख,जले
नभ के तारे
   -संतोष कुमार सिंह
दीपों का डेरा
पराजित अँधेरा
अमां की रात
   -सुरंगमा यादव
असंख्य दीप
जल में लहराते
तारों के बिम्ब
    -सुशील शर्मा


नवम्बर २०१९

शर्म न शंका
राजनीति में बजे
चोरों का डंका
   -बलजीत सिंह
माँ का आँचल
इतना निर्मल ज्यों
गंगा का जल
      -सूर्य नारायण गुप्त
दूध का क़र्ज़
माँ रोती बेटा भूला
अपना फ़र्ज़
    -सूर्य नारायण गुप्त
मन में -सोयी
जाग उठी स्वप्न  में
याद पुरानी
   -सुरंगमा यादव
प्रेम की लय
अनसुने स्वरों में
मन विलय
   -सुरंगमा यादव
ऊषा उतरी
सतरंगी डोली में
गीतिका झरी
   -पुष्पा सिंघी
भाव प्रवाह
दूर ले गया बहा
मन तरिणी
   -सुरंगमा यादव
पुरानी बस्ती
आज तक जो मेरी
बताती हस्ती
     -निगम राज़
खाता है ताने
पहने उलहाने 
गरीब बच्चा
   -राजीव गोयल
दानी  वे गुप्त
घावों पर नमक
छिडकें मुफ्त
   -संतोष कुमार सिंह
मीठी लोरियां
बाल किलकारियां
हंसा आँगन
  -पुष्पा सिंघी
पर्दे के पीछे
छिपकर लाडला
कहता ढूँढो
   -सुरंगमा यादव
बाल उमंग
हमारे समाज ने
की बदरंग
   -निगम राज
दुःख की पाती
जीवन भर बांची
फिर भी शेष
   -सुरंगमा यादव
आँखों से बहा
पा के सहानभूति
मन का दर्द
   -शिव डोयले
विकल मन
व्यथा की वीथियों में
ढूँढ़ता पथ
  -सुरंगमा यादव
शैशव छंद
मलय मकरंद
मुग्ध चमन
    पुष्पा सिन्धी
जल से भरे
बिन बरसे नैना
धीर ना धरे
   -सुरंगमा  यादव
वर्षा की झरी 
दरख्तों पे लटकी
बूंदों की लड़ी
   -राजीव गोयल
लो उड़ चली
बदली मनचली
हवा के संग
   -सुरंगमा यादव
है दिव्य सेतु 
धरा से नभ तक
इन्द्रधनुष
   -राजीव गोयल
चुरा के भागी
बगिया से सुगंध
चोरनी हवा
   -राजीव गोयल
होंगे फिर से
पतझड़ के बाद
दरख़्त हरे
   -राजीव गोयल
विदाई बेला -
झरा देहरी पार
हरसिंगार
   आभा खरे
मन की झील
रात भर चमका
यादों का चाँद
     -सुरंगमा यादव
माँ है कमाल
 वृद्धाश्रम  से पूछे
बेटे का हाल
  -अभिषेक जैन
बुने हमने
उधेड़े समय ने
कितने ख़्वाब
   -सुरंगमा यादव
लौटी चिड़ी माँ
हर्ष से झूम उठा
भूखा घोंसला
   - राजीव गोयल
बहता रहा
जीवन का दरिया
उमर  भर
   -प्रियंका
गहरे हुए
उदासियों के रंग
सांझ के संग
   -सुरंगमा यादव
चश्में के पार
अनुभव की पोथी
बाबा की आँखें
   -सुरंगमा यादव
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शनिवार, 17 अगस्त 2019

हिन्दी के श्रेष्ठ हाइकु - जुलाई २०१९

हिन्दी के श्रेष्ठ हाइकु -जुलाई २०१९ 
  
प्रेम तपस्या
जीवन तपोवन
मन साधक
        -सुरंगमाँ यादव
ढलती उम्र
यादों की लाठी थाम
चलता वक्त
      -शिव डोयले
मेघों की डोली
आई वर्षा दुल्हन
हवा कहार
     --राजीव गोयल
नन्ही सी बूंद
मेघ की दहलीज़
छोड़ के चली
        -सुरंगमा यादव
छोड़ पीहर
जब बारिश चली
रोई बदली
      -राजीव गोयल
बूढ़े माँ बाप
बासी अखबार
कोने में पड़े
     -राजीव गोयल
आषाढ़ मेघ
जल कलश लिए
पावस पर्व
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
घास पे पड़ी
मोतियों की चादरें
बूंदों की लड़ी
          -प्रियंका
चिड़िया उडी
हज़ार बार देखा
पीछे न मुड़ी
       -निगम राज़
खुश थे बड़े
सपनों में थे खोए
जागे तो रोए
      -सुरंगमा यादव
जा बसे दूर
छोड़  गए आँखों में 
यादें पुरानी
     -शिव डोयले
वंशी की तान
तुमसे मिलकर
छेड़ते प्राण
     -सुरंगमा यादव
सूरज उगा
कर सूर्य नमन
दीपक बुझा
       -राजीव गोयल
नियत सच्ची
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी
        -बलजीत सिंह
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगडाई
       -बलजीत सिंह
मस्त हवाएं
सागर की लहरें
तुम्हें बुलाएं
      -निगम राज़
गा रहा बांस
मिल हवा के संग     
सुरीला गान
       -राजीव गोयल
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
      -बलजीत सिंह
बरसे मेघ
तृप्त हो रहीं जड़ें
झूमते पेड़
         -सुरंगमा यादव
अन्धेरा घर
जलता विदेश में
कुल दीपक
         -राजीव गोयल
कभी कभी तो
आईना देखा करो
दिखाने वालो
       -सुरंगमा यादव
अन्धेरा रोकें
बन प्रहरी खड़े
द्वार पर  दिये
        -राजीव गोयल
 दरक गया
यथार्थ के घूंसे से     
भ्रम का कांच
        -अभिशेख जैन
मेरे काव्य में
नाचते मंद मंद
शब्दों के छंद
          -निगम राज़
थका  सूरज
पहार से लुढ़क
नदी में डूबा
        -राजीव गोयल
यादें थीं सोयी
सावनी फुहारों ने
आ के जगाया
        -सुरंगमा यादव
भूखे घरों में
वादों की हांडी चढी
ताकते चूहे
        -रमेश कुमार सोनी
आसमान में
घटाओं का पहरा
सूर्य सहमा
        -सुरंगमा यादव
मेघ गर्जन
चपला की चमक
डरता मन
        -शिव डोयले 
बड़े विचित्र
मन-केनवास पे
यादों के चित्र 
         -सुरंगमा यादव

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गुरुवार, 27 जून 2019

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु (जून माह)

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु (जून माह, २०१९)

ग्रीष्म आतंक 
सूखा नल का कंठ 
व्याकुल प्यास 
      -सुरंगमा यादव 
छाया उल्लास 
भोर का आगमन 
सुमन हास 
      -सुरंगमा यादव
नयन घन
नव पौध  उगाने
आतुर मन
       -पुष्पा सिन्धी
माँ मिल गई
हुई ममतामयी
ज़िंदगी नई
     -निगम 'राज़'
झूठ के पैर
घुटने टिका कर
चलता सच
      -सुरंगमा यादव
धरा वक्ष पे
चितकबरी धूप
चित्र उकेरे
       -राजीव गोयल
एक तितली
हमलावर दौर
सहमे पंख
     -सुशील शर्मा
थका नहीं है
दे अब ही आसरा
बूढा पीपल
       -(पिता) राजीव गोयल
कर दी नई
पुराने कागज़ों ने
यादें तुम्हारी
         -राजीव गोयल
जर्जर घर
नया रंग रोशन
यादें पुरानी
       -पुष्पा  सिन्धी
नन्हीं दुनिया
पिता है आसमान
वसुधा सी माँ
       -सुशील शर्मा
पढ़ा न लिखा
ज्ञानी सी सीख देता
कबीर दिखा
       -शिव डोयले
वक्त घूमता
कल, आज से कल
ज़िंदगी खेल
        -रेश कुमार सोनी
याद ढूँढ़ती
तारों के देश तुझे
कब आओगे
      -रमेश कुमार सोनी
पाखी का घर
चार दिन बसेरा
यादें रहतीं
       -रमेश कुमार सोनी
हार रंगों का
बाँध रही किरणें
 मेघा के द्वार
      -राजिव गोयल
योग दिवस
अखबारी सुर्खियाँ
कल रद्दी में
       -पुष्पा सिन्धी
स्वप्नों में खोई
रजनी अलसाई
प्रिया न सोई
       सुरंगमा यादव
मेघ आ जा रे
आई मिलन ऋतु
धरा पुकारे
     -सुरंगमा यादव 

रविवार, 2 जून 2019

श्रेष्ठ हिंसी हाइकु मई २०२०

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु (मई, २०२०)

मजबूर हूँ
इस धरा पर मैं
मज़दूर हूँ
     -भीम प्रजापति
कड़वे मीठे
शब्द समेटे कोष
चुनाना हमें
     -सुरंगमा यादव
मेघों की डोली
बारिश दुल्हनियां
हवा कहार
      -राजीव गोयल
दौड़ लगाती
ज़िंदगी की रफ़्तार
आगे तो पीछे
       -शिव डोयले
परम्पराएं
जो पाँव उलझाएँ
उन्हें क्यों ढोएँ ?
      -सुरंगमा यादव
जीवन  शेष
हर क्षण विशेष
जिओ जी भर
       -सुरंगमा यादव
मन का सूप
फटके जीवन की
छाँव व धूप
      सूर्य नारायण गुप्त
महकी धरा
आकाश से थोड़ा सा
पानी जो गिरा
        -राजीव गोयल
माँ का आँचल
इतना निर्मल ज्वूँ
गंगा का जल
        -सूर्य नारायण गुप्त
और न छोर
आकाश सा विशाल \
माँ का दुलार
        -राजीव गोयल
ठोकर लगी
माँ ने कहा, उठो भी
दौड़ पडा मैं
       -रमेश कुमार सोनी
जन्मों तक भी
कोई चुका न पाया
दूध का कर्ज़
        -वलजीत  सिंह
पसरी पडी
चितकबरी धूप
अंगना मेरे
        -राजीव गोयल
मन निहार
खुशियों का विस्तार
है आस-पास
      -सुरंगमा यादव
सिखा रहे हैं
सही सबक़ मुझे
ग़लत लोग
      -राजीव गोयल
कहती राहें
सबके लिए खुलीं
हमारी बाहें
      -सुरंगमा यादव
महकी धरा
आकाश से थोड़ा सा
पानी जो गिरा
       -राजीव गोयल
बहता पानी
रोकने की खातिर
टोकती नानी
    -निगम 'राज'
बना ही लेते
पानी और जवानी
अपने रस्ते
      -सुरंगमा यादव
दुष्ट मनई
जहां रही तहवाँ
करी कनई
     (भोजपुरी) -भीम प्रजापति
भीगता बच्चा
छाते तले बचाता
कागज़ी नाव
      -राजीव गोयल
मन भुवन
स्मृति का संकीर्तन
करे जोगन
        -पुष्पा सिन्धी 
गुज़री हवा
जो बासों के वन से
बजी सीटियाँ
       -राजीव गोयल
कुरेदे जख्म
सांत्वना के बहाने
वाह, ज़माने
      -सुरंगमा यादव

---------------------समाप्त
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बुधवार, 1 मई 2019

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु  - अप्रेल माह

मृत्यु अटल
आज नहीं तो कल
व्यर्थ विकल
      -सुरंगमा यादव
मैं या मय  का
होते खतरनाक
दोनों ही नशे
      -राजीव गोयल
अहं पर्वत
बौने लगते सारे
अपने आगे
       -सुरंगमा यादव
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        -बलजीत सिंह
हल्की फुहार
सौन्दर्य का दर्पण
देती निखार
       बलजीत सिंह
श्यामा लावण्य
नालफूल का हीरा
मेघ में चाँद
       -विभा श्रीवास्तव
मिटी  दिलासा
जगी दिल में आशा
मिटी  निराशा 
       -सुरंगमा यादव     
चैत  की सांझ
अनमना मौसम
एकाकी चाँद
      पुष्पा सिन्धी
जीवन व्यथा
लिखने जब बैठी
बनी कविता
       -सुरंगमा यादव
गहरी नदी
सूख के रेत हुई
मिट्टी पलीद
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
टालते काम
बीते कितने कल
आया न कल
       -सुरंगमा यादव
अंधी  है दौड़
कैसे कितना पा लूँ
मची है होड़
       सुरंगमा यादव
गर्म जो हुआ
सूरज का तंदूर
पकी फसलें
     -राजीव गोयल
मोती ओस के
दूब के बदन से
गर्मी  ने लूटे
       -राजीव गोयल
बड़े मकान
शो पीस की तरह
सजे हैं रिश्ते
        -सुरंगमा यादव
आएगा बेटा
वृद्ध है आश्रम में
प्रतीक्षारत
       -राजीव गोयल
हवा न आग
उम्मीदों के सहारे
जले चराग
      -बलजीत सिंह
दूर से दिखे
मंदिर का चिराग
आशा का पुंज
      -प्रियंका वाजपेयी
खुश हूँ मैं कि
आधुनिक युग में
ज़मीन से जुडी
        -प्रियंका 'अद्वैता'
प्रेम की कमी
मन की धरा पर
दरारें पडीं
       -सुरंगमा यादव     
समेटती हूँ
नींद के कतरों को
पूरी ही रात
       -प्रियंका वाजपेयी
पाँव में छाले
अपनी ही शर्तों पर
जिया है कोई
       -प्रियंका 'अद्वैता'
मजबूर हैं
इस धरा पे हम
मज़दूर हैं
     भीम प्रजापति
     (एक मई, मज़दूर दिवस )

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---------------------------------------समाप्त


रविवार, 31 मार्च 2019

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - मार्च २०१९

आतंकी भीड़
कैसी हवाएं चलीं
उजड़े नीड़
      -पुष्पा सिन्धी 
शांत है हवा
धीरे से घूँघट को
उठाती हवा
      -बी पी प्रजापति
रंगने लगे
फागुन के संग में
टेसू वन के
     -राजीव  गोयल
महुआ फूले
फागुन राग गूँजे
रंगों का नशा
      राजीव गोयल (?)
निंदिया बोए
अंखियों के खेतों में
ख़्वाब फसल
        राजीव गोयल
पलाश खिले
पूरा का पूरा गर्व
धूप का झरे
        -तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
मैं न निभाऊँ
झूठ की परिपाटी
दुर्गम घाटी
       -पुष्पा सिन्धी
नारी की च्यथा
द्रोपदी मीरा राधा
सीता की कथा
        सूर्य नारायण गुप्त
बहुत हुआ
बंद करो अब तो
अग्निपरीक्षा
       -सुरंगमा यादव
हिन्द की नारी
कठिन समय में
कभी न हारी
        -सुरंगमा यादव
काबू मे रख
ख्वाहिशों की लगाम
तू ही सारथी
       -राजीव गोयल
कोमल पांव
परम्परा की बेड़ी
पराया गाँव
      पुष्पा सिन्धी
पराया देश
ढूँढे अपनापन
नई  दुल्हन
     -सुरंगमा यादव
ये शैतानियाँ
बच्चों की भर लाईं
किलकारियां
     निगम राज
उमड़ता है
चाहतों का सागर
चाँद निष्ठुर
      -सुरंगमा यादव
उड़ा अबीर
गोरी का मन अब
धरे न धीर
     सुरंगमा यादव
दिन गुलाबी
वासंती बयार में
रात शराबी
       -सूर्य नारायण गुप्त 
दीपक जला
डर कर अन्धेरा
पैरों में गिरा
      राजीव गोयल
झूठ का शोर
सच खामोश हुआ
भीड़ ने ठगा
       रमेश कुमार सोनी
होली के रंग
प्रियतम के संग
उठे उमंग
       -डा. रंजना वर्मा
फागुन मास
करने को स्वागत
खिला पलाश
        राजीव गोयल
हलचल है
मन के भीतर भी
कोलाहल है
        -निगम 'राज़'
होली की भोर
छिपती फिरे गोरी
मिले न ठौर
        सुरंगमा यादव
छाई कंगाली
क्या होली क्या दीवाली
खाली है थाली
        सुरंगमा यादव
होली में हो ली
साजन संग आज
गालों पे रोली
          भीम प्रजापति
चंग की थाप
गोरी का मुख लाल
फींका गुलाल
         पुष्पा सिन्धी
राधा अनंग
रँगी कृष्ण के रंग
गोपियाँ दंग
        निगम 'राज़'
खोखली हँसी
खनक कह रही
बर्तन खाली
       सुर्रंगामा यादव
तिनका गिरा
जो आँखों में मेरी
टूटा गुरूर
      -राजीव गोयल
दूध नहाई
तारों की चूनरी ले
चांदनी आई
      -सूर्य नारायण गुप्त
जब विचार
बनते व्यवहार
स्वप्न साकार
        सुरंगमा यादव
होली तो हो ली
बता मन की गांठें
क्या तूने खोलीं
       -राजीव गोयल
गिने पृष्ठ हैं
गिनती है अज्ञात
जीवन पोथी
      -सुरंगमा यादव
पात्रों का मेला
जीवन रंगमंच
है अलबेला
     पुष्पा सिन्धी
झूठी  कसमें
सत्य का उपहास
न्याय की आस
     -सुरंगमा यादव
--------------------------------
----------------------समाप्त








शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

फरवरी माह के श्रेष्ट हाइकु


मावसी रात
बिखेरते  चांदनी
जूही के फूल
     -राजीव गोयल
विजय पथ
धूमिल कर जाएं
हारी आशाएं
      सुरंगमा यादव
होतेही भोर
चुगें धूप के हंस
ओस के मोती
      -राजीव गोयल
अंतर मन में
कितनी कवितायेँ
लिखते आंसू
        -सुरंगमा यादव
रिश्ता मंहगा
जीवन के बाज़ार
अकेला लौटा
       -रमेश कुमार सोनी
जीवन सत्ता
सुख-दुःख के साथ
गठबंधन
       सुरंगमा यादव
छोड़ा जो साथ
पतंग की डोर का
लूट ली गई
        -राजीव गोयल
लिए सलाई
दिन बुनता रहा
कल के ख़्वाब
       -शिव डोयले
कभी न पटे
प्रीत-नींद सौतन
भूखे ही सोए
      -रमेश कुमार सोनी
शाखों में झूमे
वासंती गुजरिया
मन बहके
       रमेश कुमार सोनी
ऋतु बसंत
देती यह आनंद
हमें अनंत
       -बलजीत सिंह
ऋतु बसंत
खोज रहा मन
अपना कंत
       -भीम प्रसाद प्रजापति
माघ पंचमी
ऋतुराज पधारे
हर्षित सारे
      -सुरंगमा यादव
जीवन-नाद
भोर का आना तय
रात के बाद
      -पुष्पा सिन्धी
प्रेम कस्तूरी
मन मृग भीतर
ढूँढे बाहर
      -सुरंगमा यादव
ले प्रतिशोध
करना आचमन
शत्रु लहू से
      -डा, रंजना वर्मा
उठा उबाल
विछिन्न कर देंगे
शत्रु का भाल
      -सुरंगमा यादव
शब्दों के बीज
कागजके खेतों पे
उगाते गीत
       -राजीव गोयल
अश्रु से भरी
दर्द नदी बहती
बंजर मन
      रमेश कुमार सोनी     
पूरन मास
विराहियों में उठी
मिलन प्यास
      -सूर्य किरण सोनी
हृदय चीर
नयनों से निकली
रिश्तों की पीर
        -सूर्यकिरण सोनी
बहरा हुआ \
चिल्ल पों शहर में
रोज़  तमाशा
    -रमेश कुमार सोनी
जीत के जंग
सरहद से लौटे
सिर्फ बदन
       -राजीव गोयल 
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समाप्त 

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

जनवरी २०१९ के श्रेष्ठ हाइकु

जनवरी २०१९ के श्रेष्ठ हाइकु

नव वर्ष यूँ
नव निर्मित घर
गृह प्रवेश
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
मन दीवारें
क्रोध घृणा के जाले
चलो निकालें
      सुरंगमा यादव
सूरज हांफे
जाड़े में छुप कर
ठण्ड से काँपे
         -सूर्यनारायण गुप्त 'सूर्य'
धीमा ज़हर
है संवादहीनता
मरते रिश्ते
      सुरंगमा यादव
एक ही छत
कमरों की तरह
बंटे हैं मन
      -सुरंगमा यादव
सूरज डरे
कोहरे के भय से
कैसे उतरे
      सूर्य नारायण गुप्त ;सूर्य'
गुलाबी सर्दी
ओढ़ स्वेटर शाल
हुई गुलाबी
        -शिव डोयले
फुटपाथ पे
ढूँढ़ रही शिकार
सर्दी डायन
      -राजीव गोयल
व्यथित जन
लगते हैं मुझको
यों परिजन
       - रमश कुमार सोनी
विश्वास रहा
ह्रदय में उसका
आवास रहा
      -निगम 'राज़'
सांझ पुकारे
सूर्य शर्म से लाल
चाँद  जो झांके
       रमेश कुमार सोनी
दुःख का वेग
सांत्वना के तटों ने
किया मद्धिम
        -सुरंगमा यादव
कुम्भ का मेला
डुबकी लगा रहे
प्रवासी पक्षी
      -विभा श्रीवास्तव
लालच खोंटी
पूर्ण पाने में खो दी
अधूरी रोटी
     सोनी जी
संक्रांति पर्व
टूटेगा अब शीघ्र
शीत का दर्प
       -सुरंगमा यादव
जीवन क्या है !
उडी, चढी, लो कटी
गिरी पतंग
        -सुरंगमा यादव
निहाँ निशां थे
इश्क भरे दिल में
कई आस्मा थे
      (निहां - छिपे हुए)
    -निगम 'राज़'
हुई क्या भूल?
सींचा प्रेम जल से
उगा बबूल
     -सुरंगमा यादव
सर्दी की रात
क्यों उतरा झील में
सोचता चाँद
     -राजीव गोयल
दूर या आस
हर पल आभास
तुम हो साथ
     -सुरंगमा यादंव
चुरा के भागी
सुगंध बगिया की
चोरनी हवा
      -राजीव गोयल
रोक लेते हैं
धूप मेरे हिस्से की
ऊंचे मकान
      -राजीव गोयल
प्रेम आसव
लिए लिए फिरती
हवा बासंती
       -सुरंगमा यादव
गिरते जाएं
ज़िंदगी शजर से
उम्र के साल
       -राजीव गोयल
हुई सयानी
ओढ़े चूनर धानी
झूमें सरसों
       -सुरंगमा यादव
ख्याति अमर
संग्रहालय बना
पुश्तैनी घर
     -पुष्पा सिन्धी
मीत मिलाप
चहुँ दिश बिखरा
प्रीत पराग
      -सुरंगमा यादव
पत्र ओ बांचे
अम्बर ने वासंती
धरती नाचे
     -निगम 'राज़'
घूँघट हिला
वसंत पद-चाप
ह्रदय खिला
       -पुष्पा सिन्धी
ज़िंदगी जी ली
पता ही नहीं चला
उम्र गुज़री
        -निगम 'राज़'
आया बसंत
फिर से बौरा गए
संत महंत
      -अमन चांदपुरी
जो हैं वंचित
उनकी भी किंचित
सुधि लें हम
        -सुरंगंमा यादव
बिस्तर पर
बदले करबट
रात अकेली
        -अमन चाँदपुरी
नियत सच्ची
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी
      बलजीत सिंह
जीत ली जंग
लौटे बेजान तन
हारी ज़िंदगी
     -राजीव गोयल
घना कोहरा
आँगन में पसरा
सूर्य कहाँ हो
      पुष्पा सिन्धी
ताउम्र रोई
माँ की याद दिल में
कभी न सोई
        -निगम 'राज़'
फैलाने लगी
सिमटे पाँव, धूप
गुनगुनाई
        सुरंगमा यादव 
सजाके तारे
रजनी की जुल्फों में
सो गया रवि
      -राजीव गोयल
नश्वर तन
समय आरी, काटे
वृक्ष सघन
       -पुष्पा सिन्धी
प्रेम की पीर
पहाड़ भी रो देता
पवित्र नीर 
      -रमेश कुमार सोनी

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समाप्त

     
  








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मंगलवार, 1 जनवरी 2019

दिसंबर माह के श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु

तुम हो मेरे
रेत पे जैसे कोई
चित्र उकेरे
       -सुरंगमा यादव
सर्दी में गर्मी
बुनती सलाई पे
हमारी अम्मा
       -राजीव गोयल
घायल किया
और ज़िंदा भी रखा
उम्मीदों ने ही
        -राजीव गोयल
सत्य का पाँव
भटक गया आ के
झूठ के गाँव
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
ढील पे ढील
फँस गई पेंच में
कहीं पतंग
       -सुरंगमा यादव
सावन मन
शब्द हथेली पर
रचें हाइकु
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
काव्य के वन
महकते हाइकु
चन्दन बन
       -अभिषेक जैन
जागा संसार
गंध बाँट सो गया
हरसिंगार
      - डा. शिव जी श्रीवास्तव
उम्र पोनी से
बुने मृत्यु चादर
काल पुरुष
       - डा. शिव जी श्रीवास्तव
मिले सत्कार
जीवन में भर लो
ऐसे संस्कार
        बलजीत सिंह
पूरब दिशा
सुना रहा सूरज
भोर के गीत
      -राजीव गोयल
ठण्ड की रात
अंधेरी पगडंडी
सूर्य की खोज
     सुशील शर्मा
लंबा शैशव
छोड़ हाइकु हुआ
अब तो युवा
      -सुरंगमा यादव
लव्जों की नदी
रचती इतिहास
पढ़ती सदी
       -निगम 'राज़'
शीत कांटे-सी
मौसम गुलाब -सा
मन तितली
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
शब्द वीरान
खोखले से, खामोश
झरते पत्ते
      -सुशील शर्मा
स्वेद की स्याही
श्रम का महाकाव्य
रचे किसान
        -सुरंगमा यादव
ढूँढे शिकार
गरीबों की बस्ती में
सर्दी की रात
      -राजीव गोयल
अन्धेरा घोर
लाएंगे मिलकर
सुहानी भोर
      -सुरंगमा यादव
चैन से जिया?
या सुकून से मरा ?
बता तो सही ....
      -प्रियंका वाजपेयी
एकाकीपन
उद्वेलित रहता
सागर मन
      -सुरंगमा यादव
सन्नाटा बोला
शोर ने छुपाया जो
वही सच था
       -प्रियंका वाजपेयी
मन भारी था
बरस पड़ा वह
बादल जैसा
       -डा. सुरेन्द्र वर्मा
अकड़े तुम
हम भी रहे तने
बात क्या बने
      -सुरंगमा यादव
गृह कलह
बिखरे ब्लॉक्स को
जोड़े बालक
      -अभिषेक जैन
हंसी उड़ा लो
नहीं रहेंगे जब
तब पूछोगे
     -डा.सुरेन्द्र वर्मा
नोक न तीर
कलेजा देती चीर
चुभती शीत
       -सुरंगमा यादव
हवाएं सर्द
पेड़ों पर टंगे पत्ते
हो गए ज़र्द
      -राजीव गोयल
मिलिट्री स्कूल
छोटे का फ़ार्म भरे
शहीद की माँ
      -अभिषेक जैन
शीत ओढ़ के
फुटपाथ पे सोया
फिर न जागा
       -सुरंगमा यादव
जल से रिक्त
कटि पर गागर
लम्बी कतार
       -तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
वन ढूँढ़ते
मोर गाँव में आया
बिसरा नाच
       तुकाराम पुंडरिक खिल्लारे 
साल सरका
देता गया स्मृतियाँ
बांचते हम
       प्रियंका वाजपेयी
हुई अलग
जब पेड़ से पत्ती
कुचली गई
      -राजीव गोयल
कोरा कागज़
तनहा जीवन सा
अक्षर जोहे
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
राख में उगे
आशा के दूब हरे
श्रम का भाग्य
       -रमेश कुमार सोनी
देखो हाइकु
हथेली पर बैठा
बटरफ्लाय
      -तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
मोह की माया
अहसास प्यार का
उभर आया
      -निगम 'राज़'
पत्ता टूटता
आशा और निराशा
भूत भविष्य
       -शिव डोयले
धूल हटेगी
फिर से निखरेंगे
मलिन पात
     -सुंरंगमा यादव
उधड़ गई
सी लूंगा फिर से
नई  ज़िंदगी
      -राजीव गोयल
खिली सेवंती
लगन मंडल पे
आव्या की छाया
      विभारानी शीवास्तव
* 'आव्या' - सुबह की पहली किरण
भाव निश्छल
रख ह्रदय तल
मिलेगा फल
       -सुरंगमा यादव
ओढ़ रजाई
मीठे सपने देखे
निशा बावरी
        -शिव डोयले
है खिली हुई
सुख की भोर नई
जागो तो सही
       -सुरंगमा यादव
जीवन संध्या
एकाकीपन साथ
शिथिल गात
       -सुरंगमा यादव
सर्द आलम
हम हुए मुश्ताक
धूप बेज़ार
      डा. सुरेन्द्र वर्मा
गुज़रा साल
भर गया तिजोरी
यादों से फिर
       -राजीव गोयल
कहीं तो होगी
नैराश्य परिणति
योग या भोग
       -सुरंगमा यादव
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समाप्त 

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - नवम्बर माह

बांटता फिरे
ये बसंत डाकिया
सुगन्ध पत्र
       -राजीव गोयल
ओस की बूंद
पल में खुशियों ने
आँखें ली मूंद
        -सुरंगमा यादव
प्रीत के पाँव
बिन पायल बाजे
सुनता गाँव
        -सुरंगमा यादव
दीपकोत्सव
स्याह अन्धेरा फैले
साझे दर पे
      -विभा श्रीवास्तव
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगडाई
      -बलजीत सिंह
ज्यों तेल बाती
आलोकित जीवन
जीवन साथी
       -शिव डोयले
नोच के फेंकी
कैसा बाल दिवस
कोख की कली
        -राजीव गोयल
बालक मन
मजबूर हुआ है
बंधुआ तन
       -निगम राज़
उसी कक्षा में
दादी का नामांकन
बाल दिवस
      विभा श्रीवास्तव
जग कॉलेज
ज़िंदगी की किताब
बांटती ज्ञान
     -राजीव गोयल
चाँद न तारे
अभिलाषा के फूल
सबसे प्यारे
       -वलजीत सिंह
दूर सबसे
गर्व-गिरि पे तुम
चढ़े जब से
        -सुरंगमा यादव
प्रेम समीर
बहती आसपास
तेरी खुशबू
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
साईं की कृपा
कांटे स्वयं दे रहे
फूलों का पता
     -सुरंगमा यादव
कैसा समाज
शरीफों को ठोकर
चोरों को ताज
       -बलजीत सिंह
 शब्दों की फाँस
वर्षों तक देती है
मन को त्रास
       सुरंगमा यादव
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        बलजीत सिंह
आंसू न कहो
पीड़ा के सागर से
छलकी बूँदें
      - सुरंगमा यादव
एक पर का
पंछी फड़फड़ाए
बहते आंसू
     तुकाराम खिल्लारे
वृद्धा आश्रम
माँ बाप खाते जहां
बेटे का गम
     -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
खुद को पाया
जग भर को पाया
पल में मैंने
     -सुरंगमा यादव
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - अक्टूबर माह

खो गई मस्ती 
वक्त ने दे दी मुझे 
दर्द की बस्ती 
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य' 
थामी उसने 
सत्य अहिंसा लाठी 
नाम था गांधी 
      -राजीव गोयल 
पुतला जला 
दशानन अनेक 
अभी हैं ज़िंदा 
       सुरंगमा यादव
कितनी बार
समस्या सुलझाती
चाय की मेज़
       -डा. रंजना वर्मा
लूट ले गया
दरख्तों का वैभव
ये पतझड़
       -राजीव गोयल
पिरोती रही
तन्हाई की डोर में
आंसू के मोती
       राजीव गोयल
नित सुकर्मी
नवीन स्वप्न देखे
प्रयोगधर्मी
      निगम 'राज़'
मृत्यु खिलाड़ी
लपकने को खड़ी
जीवन गेंद
       सुरंगमा यादव
बाबा उदास
चंचल नदी दौड़ी
सिन्धु के  पास
      -पुष्पा सिन्धी
तितली देख
पकड़ने को बढे
हाथ अनेक
        सुरंगमा यादव
झड़ा पलाश
सजी पेड़ों के नीचे
फूलों की सेज
       -राजीव गोयल
अच्छा है धंदा
किराए पे दें कंधा
यही विकास
      -निगम 'राज़'
दादी की याद
बरामदे में धूप
सुखद लगे
       शिव डोयले
प्रभु की माया
राम हो गए बौने
रावण छाया
       -निगम 'राज़'
लुटेरी आँखें
दिल का त़ाला टूटा
भरे बाज़ार
      -रमेश कुमार सोनी
हो गए रिश्ते
अब तो गुणा-भाग
 किससे कहूँ ?
       सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
शरद पूनो
मन आँगन फैली
प्रीत चांदनी
       -सुरंगमा यादव
दोनों शर्माते
चाँद ने देखा चाँद
प्यार छलके
    -रमेश कुमार सोनी
पैरों के नीचे
दर्द से कराहती
सूखी पत्तियां
       -राजीव गोयल
चौथ का चाँद
उठी नव तरंग
प्रेम सिन्धु में
       -सुरंगमा यादव
मीटू है आई
जाग गए हैं भूत
ले अंगड़ाई
      भीम प्रजापति
इच्छाएं लादे
थक गए हैं काँधे
निभे न वादे
      -निगम 'राज़' 
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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकू - सितम्बर माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु , माह सितम्बर

चाँद न तारे
अभिलाषा के पुष्प
सबसे प्यारे
      -बलजीत सिंह
कंस जो फूले
शरद दौड़े आता
वर्षा का गौना
      -रमेश कुमार सोनी
करूं प्रतीक्षा
ये मन महाकाव्य
बाँचे तो कोई
       -सुरंगमा यादव
यमुना तीर
हरी हरी ने चीर
रार मचाई
      -(जन्माष्टमी) सुरंगमा यादव
हे राधे कृष्ण
तुम जैसे दूध में
मिला माखन
       -राम कुमार माथुर
श्रमिक मुख
लिख रही झुर्रियां
संघर्ष गाथा
      -सुरंगमा यादव
पथ में गड्ढा
तम में बाँह खींचे
गुरु ज्ञानेश्वर
       -विभा श्रीवास्तव
ये रनिवास
सजी-धजी रानियाँ
प्रतीक्षालय
      -सुरंगमा यादव
खाली है कुर्सी
अब पापा की फोटो
दीवार पर
      -राजीव गोयल
बारिश आई
सोंधी खुश्बू लाई
हवा नहाई
      निगम 'राज़'
घुप्प अधेरा
साफ़ सुथरी स्लेट
बच्चे के हाथ
      अभिषेक जैन
छंटा अन्धेरा
बच्चे की स्लेट पर
बारहखड़ी
     -अभिषेक जैन
दुनिया सारी
पलाश के खून से
खेलती होली
      -राजीव गोयल
देह से परे
कभी मन को मेरे
छूकर देखो
       -सुरंगमा यादव
एक बादल
धरती का आँचल
करता गीला
        -शिव डोयले
जल अमृत
बनता हलाहल
डूबते लोग
       मुकेश शर्मा
संध्या शर्माई
रात को बुला लाई
छुपी छुपाई
      -निगम 'राज़'
मन का सूप
फटके जीवन भर
छाँव व् धूप
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
रवि ने बुनी
किरणों की चुनरी
भोर ने ओढी
     -राजीव गोयल
हर सिगार
करता दिलों पर
गहरी मार
        -बी पी प्रजापति
पग को धोता
एक महासागर
नाम है हिन्द
      -अमन चाँदपुरी
मेघों की धूप
घूँघट से झलके
गोरी का रूप
       -सुरंगमा यादव
जन्म लेता है
आंसुओं की कोख से
विरह काव्य
      अमन चांदपुरी
वर्षा की बूंदें
शांत वातावरण
पत्तों पे बैठीं
      -अमन चांदपुरी
हंसता कांस
बरसात चल दी
घर अपने
      -शिव डोयले
नभ में छाए
इंद्रधनुषी रंग
बादल संग
      -अमन चाँदपुरी
सभी गर्दने
फुर्ती से मुड़ गईं
मैडम आयी
     हास्य हाइकु /- तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
अहं को ढोया
जीवन की किताब
पढ़ न सका
       -शिव डोयले
उड़ती रही
वाष्प की तरह ही
धरा की आह
       -प्रियंका वाजपेयी
ईद का चाँद
साल में एक दिन
हिन्दी आबाद
      -पुष्पा सिन्धी
दबी आवाज़
नारों जयकारों में
बेबस हिन्दी
      -पुष्पा सिन्धी
ओ रे बदरा
इतना न इतरा
अति न भली
      -सुरंगमा यादव
हिन्दी खज़ाना
अंग्रेज़ी डाले डाका
हस्ती है ज़िंदा
        -रमेश कुमार सोनी
कृष्ण की प्रिया
हुई अवतरित
राधिका रानी
       (राधा अष्टमी)- रंजना वर्मा
मैं ही मय हूँ
पक्का खुदगर्जी हूँ
पर फर्जी हूँ
       -निगम 'राज़'
पिघला रहीं
समय की किरणें
उम्र की बर्फ
      -राजीव गोयल
बंद घड़ी सी
ठहरी लगती है
जीवन संध्या
     -सुरंगमा  यादव 
मीठे पानी के
काले बादल बने
सागर खारे   
       -रमेश कुमार सोनी
धिया दिवस
पंख फड़फाड़ाई
चिडी मुक्त हो
       -विभा श्रीवास्तव
कभी न कहा
नैनों में भेद छिपा
क्या क्या न सहा
      प्रिंका वाजपेयी
सूर्य किरण
लिखती नभ पर
भोर के गीत
      -राजीव गोयल
खूब छकाते
जीवन के मसले
उम्र पकाते
     -निगम 'राज़ '
कीकर कैर
धोरों का सौन्दर्य
बबूल बेर
     -सूर्य किरण सोनी 'सरोज'
मेरे समीप
दूर तक फैले हैं
पीड़ा के द्वीप
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
सूना मकान
बुनता रहा जाला
एक मकड़ा
      -शिव डोयले
सत्य की सांस
आज भी गतिमान
ज़िंदा है गांधी
      -निगम 'राज़'
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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु अगस्त माह

 श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - अगस्त माह


घायल पड़ा
शब्दों के बाणों पर
रिश्तों का भीम
      -रालीव गोयल
कहाँ खो गया
आपस का लगाव
वो सांझा चूल्हा
       -राजीव गोयल
गुरु की डांट
जैसे कड़वी नीम
सुख असीम
      -डा. रंजना वर्मा
प्रेम का रंग
देह से अंतर्मन
चढ़ता गया
      -शिव डोयले
सजाया घर
तराश के पत्थर
हुए चोटिल
      -सुरंगमा यादव
पंख भी दिए
परवाज भी दिया
मुक्ति ही न दी
        -प्रियंका वाजपेशी
चंचल हवा
बना फूल हिंडोला
झूले तितली
        -राजीव गोयल
झूला झुलाएं
मृदुल कल्पनाएँ
मोलित मन
       -डा. रंजना वर्मा
झूले ललना
सपनों का पालना
पीया के संग
       -सुरंगमा यादव
तैर रही है
कागजी नाव पर
बच्चों की खुशी
      राजीव गोयल
धरा बुलाती
मेघ पाहुन आए
सुस्वागतम
        शिव डोयले
शब्दित हुईं
खामोशियाँ सहसा
जादू ये कैसा
       -सुरंगमा यादव
सूना मंदिर
बज उठी घंटियाँ
तुम जो आए
       -सुरंगमा यादव
पर्वत पार
घटाओं का संगीत
मेघ मल्हार         
      निगम 'राज़'
भूख की आग
ठंडी अंगीठी पर
पकाती जुर्म
     राजीव गोयल
चाँद लेखनी
लहरों पर लिखूँ
प्रेम रागिनी
       -सुरंगमा यादव
हाथी पे चीटी
पहाड़ पे आदमी
औकात शून्य
       -रमेश कुमार सोनी
यौवनी उम्र
संबोधन मेघ से
मंडरा रहे
        -शिव डोयले
आजादी पर्व
पिजरे में फैलाए
तोते ने पंख
       -अभिशेख जैन
ओ मनमीत
बिना कहे कहानी
तुमने जानी
       -सुरंगमा यादव
ठहरा नहीं
कारवां कभी कहीं
ठहरे हम
       -सुरंगमा यादव
जलती चिता
देखता मैं इसमें
अपना कल
       राजीव गोयल
मेघ लौटाते
पानी माँगते पत्र
कंक्रीट तपे
       -रमेश कुमार सोनी
हारा है मन
प्राणों का भोझ अब
ढोता है तन
      सुरंगमा याद
ज़रा मरण
महाकाल का चक्र
कोई न बचा
        -सुशील शर्मा
कम्बल नहीं
ओढ़ के सर्द रातें
सोई गरीबी
       -राजीव गोयल
लापरवाही
कागज़ न कलम
खरीदी स्याही
      -बलजीत सिंह
वर्षा उदास
बच्चे घरों में कैद
कश्तियाँ रोतीं
     -रमेश कुमार सोनी
खींच लकीरें
बाँट दी सरहद
गहरी पीरें
       -निगम 'राज़'
घर से दूर
गाँव का समाचार
अखबार में
       -शिव डोयले
आवारा पत्ते
छोड़ गए अकेला
बूढा दरख़्त
     -राजीव गोयल
राह दुरूह
कितने चक्रव्यूह
भेदती नारी
      -सुरंगमा यादव
काले बादल
धरा पर तांडव
कुटिल काल
       -राम कुमार माथुर
अपनी ढापें
अपनो के मन की
पीडाएं बांचें
       -सुरंगमा यादव
आया सावन
मन उपवन पे
छाया सावन
    -राम कुमार माथुर
दादी खांसी
टूट न जाए स्वप्न
बच्चे की नींद
      -शिव डोयले
कैलाशवासी
उज्जैन हो या काशी
सर्वत्र व्याप्त
       -शिव डोयले
आई बरखा
नहीं बही बहार
जल सैलाब
       -राम कुमार माथुर
घिरे बादल
सांवला हुआ नभ
जैसे मोहन
      (हाइगा) -डा, रंजना वर्मा
सफ़र ख़त्म
हुई जीवन संध्या
छुपा दिगंत
     -अमन चांदपुरी
बुज़ुर्ग हँसा
मुंह से गिर गए
नकली दांत
      -राजीव गोयल
रक्षा बंधन
गर्भनाल से जुड़ा
अटूट रिश्ता
      -सुशील शर्मा
पड़ा अचेत
शब्द बाण शैया पे
रिश्तों का भीम
      राजीव गोयल
बातें बनाती
सारी बिगड़ी बातें
बातों से हल
      -रमेश कुमार सोनी
मुख में राम
हाथ में कमंडल
चित्त उद्विग्न
      -राम कुमार माथुर
भादों का आना
सावन की बिदाई
नई उम्मीद
     -शिव डोयले
सत्य का पाँव
भटक गया आ के
झूठ के गाँव
       सूर्य नारायण गुप्त
तम सघन
हौसला आज़मा के
देख ले मन
      -सुरंगमा यादव
मौन हो गए
ये विहग वाचाल
निशीथ काल
      -सुरंगमा यादव
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगड़ाई
        - बलजीत सिंह
कोई न सगा
सुख के साथी बन
सब ने ठगा
       -सूर्य नारायण  गुप्त 'सूर्य'







   











मंगलवार, 31 जुलाई 2018

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु माह जुलाई

पुरुवा आई
चन्दन वन से
खुशबू लाई
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
आँखें पावस
बिखरी फुलवारी
टूटा साहस
         सूर्य किरण 'सरोज'
कौमार्य भंग
उड़ने से पहले
कटी पतंग
        -सूर्य किरण 'सरोज'
क्वाँरे ख़्वाब
लूट कर ले गया
नर पिशाच
        -राजीव गोयल
काले बादल
जंगलों में छिड़कें
जीवन जल
       -सूर्य नारायण 'गुप्त'
लगे बजाने
झींगुर शहनाई
बरखा-काले
       -डा. रंजना वर्मा
दृष्टि पिया की
झील मेरा बदन
उठी तरंग
       -निगम 'राज़
बूँदें ओस की
घास ग़लीचे पर
जड़तीं मोती
      -डा. राजीव गोयल
शांत नदी में
हिलोरें सी उठना
आपका आना
      -सुरंगमा यादव
पावस आया
बादल घिर आए
आप न आए
       -इंद्र कुमार दीक्षित
प्रसन्न नारी
भोर के उजास में
पुष्प क्यारी
       -इंद्र कुमार दीक्षित
नन्हा सा आंसू
सागर भर दर्द
कैसे समेटे ?
      -सुशील शर्मा
नभ सागर
बादलों की किश्तियाँ
हवाएं चप्पू
      -राजीव गोयल
कहाँ जइब
चारु ओर घूमि के
एंहीं अइब
       -इंद्र कुमा र दीक्षित
आंसू पी जाऊं
जग रीत निभाऊँ
मैं मुस्काऊँ
       -सुरंगमा यादव
पावस माह
विरहिन ह्रदय
निकले आह
      -भीम प्रजापति
उमड़े घन
सावन भर नाचे
मयूरी मन
      -निगम 'राज़'
तोहफा कहीं
तो कहीं है प्रलय
वर्षा की बूँदें
      -राजीव गोयल
लेना मुझको
चाँद का ही खिलौना
बच्चे की जिद
      -राजीव गोयल
छद्म उत्साह
देकर कुछ वाह
देता है आह
       निगम 'राज़'
धरा दोहन
बढ़ता प्रलोभन
महाविनाश
      -सुरंगमा यादव
बांसुरी बाजे
कालीदह में कान्हा
श्री राधे राधे
       -भीम प्रजापति
लो लौट आया
दादी का बचपन
बच्चों के संग
       -शिव डोयले
बारिश शुरू
लिए मुंह में अंडे
भागी चीटियाँ
      -राजिव गोयल
करे उजाड़
अहंकार की बाड़
रिश्तों का गाँव
      सुरंगमा यादव
अहं का भार
तिनके से लटका
कोई पहाड़
      -सुशील शर्मा
कोई न सगा
सुख के साथी बन
सबने ठगा
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
पीर सघन
नयन कमल से
बरसे घन
       डा. रंजना वर्मा
उठी हिलोर
मन उड़ना चाहे
नभ की ओर
      -सोनी जी
कभी जीवित
कभी मृत सा लगा
संसार बोध ---
       -प्रियंका वाजपेयी
ढूँढ़ रहा है
कागज़ की वो नाव
वर्षा का जल
       -सुरंगमा यादव
तोड़ पहाड़
बहती जल-धारा
पर्वत पुत्री
        -डा रंजना वर्मा
पर्वत मन
जब होता उन्मन
बने तरल
      -डा, रंजना वर्मा
बंद किवाड़े
आ जाती फिर भी
पीड़ाएं द्वारे
      -सुरंगमा यादव
बाँध आया मैं
पीर की मज़ार पे
धागों में पीर
       -राजीव गोयल
दैविक सेतु
धरा से नभ तक
इन्द्रधनुष
       -राजीव गोयल
होती गर्जन
बढाती धड़कन
गोरी का मन
      -निगम 'राज़'
झटके केश
बदली ने अपना
गिरी फुहार
      -राजीव गोयल
कारवाँ छोड़
जग से मुंह मोड़
चला अकेला
        सुरंगमा यादव
धीरे बोलिए
है फूल अभी सोया
उतरी धूप
      -तुकाराम खिल्लारे
इश्क फसल
बोई जो दिल पर
उपजे आंसू
       -राजीव गोयल
होती ही नहीं
मोहताज पैसों की
बादशाहत
     -निगम 'राज़'
जुगलबंदी
-------
वर्षा की बूँदें
धान की फसल पे
टपके मोती
      विष्णु प्रिय पाठक
मोती समझ
पत्तों ने थाम रख़ी
बरखा बूँदें
      -शिव डोयले
-----------           
साँसों की नदी
गाए उम्मीद गीत
नाव ज़िंदगी
      -रमेश कुमार सोनी
खेत उदास
विष के प्रभाव से
आतंकी उगे
       -रमेश कुमार सोनी
क्या होगा वहां
जहां जाते अकेले
छोड़ के मेले
      -सुरंगमा यादव
बोया जो प्यार
दिलों में उग आया
अपनापन
      -राजीव गोयल
गर्द फांकता
अप्रवासी जीवन
दर्द टाँकता
      -निगम 'राज़'
व्याकुल नैना
बदरा से बरसे
फिर भी प्यासे
       -सुरंगमा यादव
पुन:रोधक
मेरे उनके बीच
चन्द्रग्रहण
       -विष्णु प्रिय पाठक
नदी की शैया
लगा के तकिया
सोया कमल
      -राजीव गोयल
वृद्धा आश्रम
माँ बाप खाते जहां
बेटे का गम
     -सूर्यनारायण गुप्त 'सूर्य'
बरसा आई
अलसाई छातरी
ले अंगडाई
    -सुरंगमा यादव
धरा जलती
बूँदें शान्ति पढती
हरा लिखती
       -रमेश कुमार सोनी
स्थिति विषम
माँ ने हमें सिखाया
रहना सम
         -सूर्य किरण सोनी 'सरोज'
सफ़ेद वस्त्र
बेवा के अंग पर -
केक्टस शूल
     -विष्णु प्रिय पाठक
मरी नदी
पी वर्षा संजीवनी
फिर जी उठी
     राजीव गोयल
चन्द्र ग्रहण
पूनम की रात में
रूप क्षरण
      -सूर्य कारन 'सरोज'
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगडाई
      बलजीत सिंह
मेघा बरसे
मिलन को तरसे
उषा सूर्य से
       -सुरंगमा यादव
लिए बूंदों की
रिमझिम पायल
नाचा सावन
      -राजीव गोयल
वृक्षों को वस्त्र
बसंत पहनाए
बरखा धोवे
      सुरंगमा यादव
रेत के धोरे
तेज़ पवन संग
उड़ने दौड़े
    सूर्य करण 'सरोज'

















शनिवार, 30 जून 2018

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु : जून माह

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - जून माह

रात अंधेरी
अँधेरे में रोशनी
करे तलाश
       शिव डोयले
वश न चला '
विवशता बरसी  .
नैनों की राह
        -सुरंगमा यादव
पडी फुहार
धरा पर बिखरा
नभ का प्यार
        -सुरंगमा यादव
पुष्प कमल
नारी का अंतर्मन
शीश महल
        सूर्य करण 'सरोज'
कैसा दस्तूर
बेगाने नज़दीक
अपने दूर
        -बलजीत सिंह
खुद कमाना
बस दो जून रोटी
रिश्ता पुराना
       -इंद्र कुमार दीक्षित
पानी है खून
जंग का जुनून
भूखी बंदूक
     -सुशील शर्मा
रंक की भूख
आंसू सहेज कर
पी गई दुख
    -सूर्य किरण 'सरोज'
कच्चा मकान
पसर गई नींद
मूंज की खाट
       -पुष्पा सिन्धी
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        -बलजीत सिंह
पुरवा आई
चन्दन बन से वो
खुशबू लाई
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
लाचार बूढा
भर के गुब्बारों में
बेचता साँसें
        -राजीव गोयल
मन की पूंजी
प्रसन्नता की कुंजी
प्रेम सर्वस्व
       -सुरंगमा यादव
धूप मार्ग में
तपन का जुलूस
छाँव रक्षक
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
वृक्षारोपण
नव वस्त्रों से खुश
पर्यावरण
       सूर्य कारन 'सरोज'
प्रकृति रोती
धूल धुआं कचरा
जलती छाती
       -रमेश कुमार सोनी
धरा विन्यास
हरित आवरण
जग उल्लास
       सुरंगमा यादव
एक जंगल
मुट्ठीभर पादप
असंख्य साँसें
       सुशील शर्मा
पिघली बर्फ
झुकता हिमालय
जल संकट
      -डा. रंजना वर्मा
झील में चाँद
नहाया रातभर
तर-ओ-ताज़ा
      -भीम प्रसाद प्रजापतिं
डाली का फूल
नाजुक सी ज़िंदगी
करे कबूल
      -बलजीत सिंह
बोई जो नींद
अंखियों के गमले
उगे सपने
      -राजीव गोयल
अनाथ बच्ची
लावारिस घूमती
कटी पतंग
       -विष्णु प्रिय पाठक
बांह पसार
मेघों की मनुहार
करते वृक्ष
      -सुरंगमा यादव
बंजारा मन
जाएगा किस ओर
कोई न जाने
       -सुरंगमा यादव
मंद हवा सी
छू लूं चुपचाप
रूप तुम्हारा
       -सुरंगमा यादव
रात ने फोडी
सियाही की मटकी
धरा बेरंग
      -राजीव गोयल
लापरवाही
कागज़ न कलम
खरीदी स्याही
       बलजीत सिंह
झूमते वृक्ष
इठलाती बारिश
नहाता पानी
       सुशील शर्मा
आषाढी आस
कृषक स्वप्न बोता
बेटी का गौना
        पुष्पा सिन्धी
सघन वन
डोल रही पवन
बजे झांझर
      डा. रंजना वर्मा
जुगल बंदी
-----------
हवा का झूला
झूल रही ज़िंदगी
पतली डोर
   डा. रंजना वर्मा
साँसों की लय
चलती रहे यूँ ही
कहे पवन
       सुरंगमा यादव
--------------
सूखी खेतियाँ
बह चला आँखों से
एक दरिया
       -राजीव गोयल
प्राथमिक हो
दायित्व का निर्वाह
वास्तविक हो
        -निगम 'राज़'
तोड़ता बाँध
लहरों का उछाल
पूरा है चाँद
        -राजीव गोयल
पिता का नाम
आता ताउम्र काम
उसे सलाम
      -निगम 'राज़'
नि:शब्द हूँ मैं
पितृ दिवस आज
पापा कहाँ हैं ?
       -पुष्पा सिन्धी
पिता का होना
सूरज का उजाला
चाँदनीं रातें
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
लड़ाई में भी
अपनी औलाद से
हारते पिता
      -शिव डोयले
हर सांस पे
पिता का हस्ताक्षर
भूलें तो कैसे ?
       -सुरंगमा यादव
सुमन खिला
उपवन महका
छू गई हवा
       -डा. रंजना वर्मा
आवागमन
श्वास-प्रियतमा का
यही जीवन
      निगम 'राज़'
मन बैसाख
सावन सी बरसी
प्रेम फुहार
      -सुरंगमा यादव
चाँद बुनता
चांदनी की चूनर
ओढ़ती धरा
      -राजीव गोयल
बरसो मेघ
फट रही बिवाई
धरा के पैर
       -राजीव गोयल
निशा विहंसी
गगन पर बिखरे
रजत पुष्प
       सुरंगमा यादव
भागते रहे
अपने परायों से
कभी खुद से
      सुरंगमा यादव
अतिविस्तृत
खगों का कर्म क्षेत्र
नभ असीम
       -डा. रंजना श्रीवास्तव
चन्द्र प्रकाश
देती रही मन को
ठण्ड मिठास
       -बी पी प्रजापति
पहली वर्षा
चीटीं बनाने लगीं
अपना घर
      विष्णु प्रिय पाठक
तुम्हारे बिन
पतझड़ का वृक्ष
मेरा जीवन
      -सुरंगमा यादव
धर दबोचें
भागते सपनों को
जिद के हाथ
       -अभिषेक जैन
ईंगुर गोली
वर्षा की हमजोली
बीरबहूटी
       -डा. रंजना वर्मा
बीमार दादा
मरम्मत न हुआ
जर्जर छाता
        -पुष्पा सिन्धी
बरखा रानी
पात पात बिखरीं
हीरे की कनीं
       -सुरंगमा यादव
कबीर मन
कभी बाहर खड़ा
कभी अंतस
       -सुशील शर्मा
वक्त की गर्द
आँगन में पसरी
बंद मकान
       -डा. राजीव गोयल
ढलता रवि
उफ़क पे बिखेरे
अनूठे रंग
       (हाइगा) -डा. राजीव गोयल
जुगलबंदी
---------
प्यासी नदिया
समंदर किनारे
भाग्य कोसती
       शिव डोयले
प्यासी नदिया
मेघ बरसने की
बात जोहती
      डा. राजीव गोयल
-------------
यादों का देश
भटकता फिरता
एकाकी मन
      -सुरंगमा यादव
मुग्ध वल्लरी
सावन की डोकरी
जादूगरनी
      -पुष्पा सिंघी
आँखों ने देखे
बारिश के सपने
फिसले पैर
        डा. राजीव गोयल
     












     








रविवार, 3 जून 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - मई माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - मई माह

तारा भू टूटा
रहा कोई खड़ा
चोटी पे सदा
      राजीव गोयल
थका बटोही
आम्र कुंजों ने थामीं
स्वेद की बूँदें
        -रमेश कुमार सोनी
चाँद ले आया
सपनों की गठरी
नींद ले उड़ी
     -नरेंद्र श्रीवास्तव
चीख न सुनी
अंधे बहरे गूंगे
गुज़रे लोग
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
जलते रिश्ते
प्यार की छाँव ढूँढे
बेचैन मन
         -सुरंगमा यादव
जीत के जंग
लौटे बस शरीर
ज़िंदगी हारी
         -राजीव गोप्यल
प्रेम में पगी
यादों की सोनपत्ती
सूखी भी हरी
       -रमेश कुमार सोनी
गंध रोटी की
बज रहे कंगन
किताब बंद
       -तुकाराम खिल्लारे
नीयत सच्ची
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी
       बलजीत सिंह
सूना पिंजरा
पंछी क्षितिज पर
स्मृति-अम्बार \ 
       -पुष्पा सिन्धी
मेरे मन को
बहका के ले जाती
बहकी हवा
        -अमन चांदपुरी
धान लगाती
ढेर सारी गोपियाँ
कजरी गातीं
        -अमन चाँदपुरी
श्रम से रोज़
करती गिलहरी
दानों की खोज
      -सूर्य करण 'सरोज'
चांदनी छाई
रूप की रानी बन
वह लजाई
      -सूर्य नारायण गुप्त
कैसी लड़ाई
मुस्कुराए  पड़ोसी
झगड़ें भाई
      -बलजीत सिंह
मन की रेत
कुरेदी तनिक सी
नमी ही नमी
        -सुरंगमा यादव
फागुन मास
धरा पर चांदनी
करे विलास
        -बलजीत सिंह
जेठ की धूप
मध्यान्ह में अकेली
क्रोध से जली
     -रमेश कुमार सोनी
मरण-शैया
हंसने लगा बूढा
शैशव फोटो
        -तुकाराम खिल्लारे
कैसा शीतल
कल कल बहता
गंगा का जल
        -इंद्र कुमार दीक्षित
अन्दरखाने
क्या कुछ चलता
राम न जाने
       -इंद्र कुमार दीक्षित
धूप में छाँव
माँ, जाड़ों में अलाव
सुहानी शाम
       राजीव गोयल
माँ का आँचल
राहत का बादल
होता संबल
       -राजीव निगम 'राज'
मन गुबार
धुंध ही धुंध छायी
दृश्यता घटी
      -सुरंगमा यादव
रहे न रहे
सिर्फ माँ याद आती
दुःख की वेला
       -रमेश कुमार सोनी
बहला गया
माँ तेरा स्पर्श मुझे
सहला गया
       सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'

जुगल बंदी

कैसी हो मम्मी
बड़े बच्चे भटके
पूछना भूले
        -रमेश कुमार सोनी
मैया सिकुड़ी
संसार फैलाकर
कोने में पडी
         -अभिशेख जैन
-----------------
जा नहीं सका
खुदा हर घर में
तो माँ भेज दी
       -राजीव गोयल
माँ की ममता
कोई नहीं समता
अतुलनीय
         -रंजना वर्मा
रंग अनंत
रब ने, माँ में उन्हें
किया जीवंत
        सूर्य किरण सोनी 'सरोज'
मातृ दिवस
माँ की तस्वीर पर
फूलों की लड़ी !
        विष्णु प्रिय पाठक
होकर चूर
सपनों का दर्पण
देता चुभन
        -सुरंगमा यादव
हूँ मजबूर
वतन की खातिर
अपने दूर
      सूर्य कारन 'सरोज'
नींद न हंसी
पत्थरों के देश में
प्रीति यूं फंसी
        सूर्य नारायण 'सूर्य'
जग के लिए
संचित करे गुरु
ज्ञान का मधु
       -सुरंगमा यादव
हवा की धुन
थिरकती डालियाँ
पाँव के बिन
        सुरंगमा यादव
लूट ले गया
एक नर पिशाच
कुंवारे ख्वाब
        -राजीव गोयल
नैन प्रपात
भीगे मसि-कागद
लौटी बारात
        पुष्पा सिन्धी
मेघा बरसे
भागी उन्मादी नदी
तोड़ किनारे
       -राजीव गोयल
दुष्ट मनई
जहां रही तहवाँ
करी कनई
        -भीष्म प्रजापति
मेघ चिरौरी
भरो राम तलैया
प्यासी चिरैया
        -सुरंगमा यादव
धुंधला चाँद
क्षितिज छोर पर
निशा का आंसू
        -डा, रंजना वर्मा
मिट्टी का दीया
कुम्हारिन का दर्द
किसने जिया
        सुशील शर्मा
गोधूली शाम
रामधुन के स्वर
ऊंघता गाँव
       -सुशील शर्मा
हो जाती सुखी
निहार रवि मुख
सूरजमुखी
        -कमल कपूर
शाख पे बैठे
शांत और गुमसुम
जवाकुसुम
      -कमल कपूर
गोरे सजीले
सुरभि के टोकरे
श्वेत मोगरे
       -कमल कपूर 
पिरोता रहा
यादों की डोरियों में
आंसू के मोती 
       -राजीव गोयल
चाल में सर्प
श्रृंग से भू पे जल
सद्यस्नाता स्त्री
        -विभा रानी श्रीवास्तव
मेल-मिलाप
जीवन के वृत्त में
खुशी की चाप
         बलजीत सिंह
शुद्ध निश्छल
बहता प्रतिपल
आगत कल
         -सुशील शर्मा
आँखों के घड़े
अंसुअन से भरे
कंठ हैं प्यासे
        -रमेश कुमार सोनी
भोर का रवि
कैसी निराली छवि
तिमिर हवि
         -डा. रंजना वर्मा
प्रेम का सेतु
सहज पूरी हुई
दिलों की दूरी
       -सुरंगमा यादव
रात अंधेरी
गा रही तनहाई
मौन सुनता
      -डा. रंजना वर्मा
मुदित गाँव
पत्तों की पायलिया
वृक्षों के पाँव
        -पुष्पा सिन्धी
समुद्री द्वीप
बलखाती लहरें
मेघ समीप
       -सूर्य करण 'सरोज'










     






सोमवार, 30 अप्रैल 2018

हिंदी के श्रेष्ठ हाइकु, अप्रेल माह

अप्रेल माह के श्रेष्ठ हाइकु

झील में चाँद
उमस भरी रात
नहाने आया
       सुरंगमा यादव
होते ही रात
चली ख़्वाबों के देश
नींद की नाव
       राजेश गोयल
अग्निशामक
जठराग्नि बुझाती
थाली की रोटी
       विष्णु प्रिय पाठक
नेताजी सोये
लच्छेदार भाषण
रद्दी में रोए
        -पुष्प सिन्धी
बात जुबां पे
अधरों तक दूरी
हुई न पूरी
       -सुरंगमा यादव
नंगा चेहरा
कैसे नहीं पढ़ता
खुली किताब
        -विष्णु प्रिय पाठक
तेरे घर का
ठिकाना मैंने जाना
सुवास आया
       -तुकाराम खिल्लारे
चिकनी राहें
फिसल गईं चाहें
अंधेरी रात
      -पुष्पा सिंधी
कटे जंगल
बढ़ा जंगलीपन
खोया इंसान
      सुरंगमा यादव
चाँद सितारे
आओ न किसी दिन
घर हमारे
      सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
दंगे -फसाद
किराए के बाराती
खूब ही नाचे
      पुष्पा सिन्धी
नीरव वन
धुन मुरलिया की
हर्षाया मन
        -शिव डोयले
मेघ कहार
दूर देश से आया
लेकर जल
       सुरंगमा यादव
लौटे बादल
करके तांका-झांकी
बिन बरसे
       -सुरंगमा यादव
डूब ही गयी
दुःख के सागर में
चाह सुख की 
        -विष्णु प्रिय पाठक
सफ़ेद पुष्प
नागफनी पौधे पे -
बैठी विधवा
        -विष्णु प्रिय पाठक
तपती रेत
नंगे पाँव दौड़ते
स्वप्न अबोध
       -पुष्प सिन्धी
पानी का मूल्य
पूछो रेगिस्तान से
क्या है कीमत ?
        -राजीव गोयल
दिया सहारा
वक्त पर जिसने
वही हमारा
         -सुरंगमा यादव
देखकर भी \
अनदेखा करता
डरा आदमी
      -शिव डोयले
इंसान बन
पढ़ लेना बाद में
गीता कुरान
          -राजीव गोयल
उड़ा ले गई
दिन के आभूषण
चोरनी शाम
       -अभिषेक जैन
चार दीवारी
बने सीलिंग फैन
घूमती नारी   
        -सुरंगमा यादव
उम्र की राह
कभी सकूँ न मिला
उलझी रही
       प्रियंका वाजपेयी 
कितने लोग ...
घिरे ही रहे हम
पर, तनहा
       -प्रियंका वाजपेयी
चख रही हूँ
थकान के दौर में
श्रम का स्वाद
        -प्रियंका वाजपेयी
मांग में भरा
सांवली बदली ने
इन्द्रधनुष
        -राजीव गोयल
पानी बरसा
साफ़ हो गया सारा
मन कलुष
      - राजीव निगम  'राज़'
स्मृति-प्रदेश
हंसता बचपन
विह्वल मन
         -पुष्प सिंधी
हुए अदृश्य
स्वार्थ के कुहासे में
प्रेम के दृश्य
       अभिषेक जैन
नीला आकाश
मिलता ऊंचाई को
महत्त्व ख़ास
          -बलजीत सिंह
मद में चूर
करते कलंकित
पुरुष क्रूर
        सुरंगमा यादव
प्रभात बेला
मंदिर की घंटियाँ
तोड़ें खामोशी
        -राजीव गोयल
घट आकार
बदले कुम्भकार
मृत्तिका वही
         -सुरंगमा यादव
कैसा दुर्योग?
नाम पर आजादी के
भटके लोग
       -सूर्य नारायण गुप्त
सौन्दर्य नष्ट
पाने को नवजात
माँ झेले कष्ट
        -सूर्य किरण 'सरोज'
ठूँठ हूँ अभी
सहने को तैयार
आरी का वार
        -सुरंगमा यादव
तारों का दल
अँधेरे को दिखाए
अपना बल
        सूर्य किरण 'सरोज'
विकृत मन
मासूमों की सुरक्षा
यक्ष प्रश्न सा
        -सुशील शर्मा
भूख तबाही
विकास की बातें तो
हवा-हवाई
        -सूर्य नारायण गुप्त'सूर्य'
राजा व रैंक
सबके लिए सम
मही का अंक
       -सूर्य कारन 'सरोज'
चीर कलेजा
दिखलाती धरती
मेघ पसीजा
       -सुरंगमा यादव
जुगलबंदी -
------------
निखरे भाव
पहन लिए जब
शब्दों के वस्त्र
       -राजीव गोयल
शब्द सहारे
अर्थ पूरित हुए 
भाव हमारे
      -राजीव निगम 'राज़'
------------------------
नभ से आई
मुंडेर पर बैठी
नन्ही किरण
       -राजीव गोयल
मन आँगन
थिरकते सपने
ऊर्जा भरते
      -सुरंगमा यादव
भ्रमित युवा
तलाशता है रंग
अंधियारों में
      -सुरंगमा यादव
आँखों में  ख़्वाब
लाया था मैं गाँव से
शहर खा गया
        -अमन चांदपुरी
बच्चे में खोई
माँ सुने किलकारी
पाँव हैं भारी
      -अमन चाँदपुरी
दुखों का मेला
गुज़ार दी ज़िंदगी
रहा अकेला
       सूर्य किरण 'सरोज'
अप्प दीपक
जलाते ही आंधियां
हीन परास्त
        -सुरंगमा यादव
तेल न बाती
निज दीपक बन
जलो संघाती
        -सुरंगमा यादव
अज़ीज़ वक्त
बीता संग हबीब
कज़ा क़रीब
       (उर्दू हाइकु)- अमन चाँदपुरी












शनिवार, 31 मार्च 2018

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - मार्च माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - मार्च माह

खेलें वो फाग
बुझ जाए बैर की
दिल से आग
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
रोज़ सुबह
अखबार से आए
खूनी बौछार
      -राजीव गोयल
होली की आग
करे भस्म विषमता
लाए समता
       -डा. रंजना वर्मा
नन्द के लाल
लिए रंग गुलाल
राधा बेहाल
       -सुशील शर्मा
पलाश फूल
धरा पर बिखरा
होली का रंग
       -विष्णु प्रिय पाठक
नन्हीं गौरैया
हो चली है विलुप्त
फाग के गीत
      -विष्णु प्रिय पाठक
मैंने जो रचा
सपनों का घरौंदा
वक्त ने रौंधा
      सूर्य नारायण गुप्त
होली तो होली
पर गांठें मन की
क्या तूने खोलीं ?
       -राजीव गोयल
नभ के गाल
उषा करे ठिठोली
मले गुलाल
     -सुरंगमा यादव
पूर्णिमा रात
चन्द्र घट छलका
बिखरी चांदनी
      -सुरंगमा यादव
खिज़ा की मार
दरख्तों ने खो दिया
रूप श्रृंगार
      -राजीव गोयल
बड़े चुभते
कांच की किरच से
टूटते रिश्ते
       सुशील शर्मा
लाल चूनर
गदराया सेमल
युवा बसंत
      -राम कृष्ण त्रिवेदी 'मधुकर'
जुगलबंदी
------------
गहन वन
भूलती पगडंडी
अपना पथ
      -शिव डोयले
जीवन रेखा
पगडंडियाँ  होतीं -
पहाड़ों पर
        -राजीव गोयल
 --------------------
फिर उभरा
यादों के दर्पण में
अक्स तुम्हारा
       -सुरंगमा यादव
सूरज उगा
फूलों पर ठिठका
मोती टपका
       डा. रंजना वर्मा
नन्हीं कोंपल
कंकाल दरख़्त पे
नई ग़ज़ल
       विष्णु प्रिय पाठक
मन में भाव
युद्ध अनवरत
कभी न रुके
      -डा. रंजना वर्मा
नारी की व्यथा
द्रोपदी,मीरा, राधा
सीता की कथा
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
रीत जाता है
जीवन अनकहा
बीत जाता है
         -निगम 'राज'
शक्ति स्वरूपा
नारी ही नारायणी
करुणा मूर्ति
       -डा. रंजना वर्मा
अपराजिता.
हर पल प्रिय से
हारती रही
       -सुशील शर्मा
अतिथि जैसा
है महिला दिवस
आया व गया
        -पुष्पा सिन्धी
सबसे न्यारा
जो दूर है सितारा
वही हमारा
       -निगम 'राज़'
सूर्य-घट से
छलके स्वर्ण-कण
रचते धूप
       -कमल कपूर
मन उमंग
स्वार्थ की भीड़ देख
हो गया दंग
       -सूर्य नारायण 'सूर्य'
उठती रही
तेरी याद लहर
मन सागर
       -राजीव गोयल
दौड़ा विकास
टूटी सडकों पर
लुढ़क गया
       विष्णु प्रिय पाठक
उलझे रहे.
शिकायतों का बुना
मकड़ जाल
       सुरंगमा यादव
फूलों की घाटी
हरे-भरे पहाड़
धरा की थाती
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
ख़्वाब बांटती
नीद की गलियों में
बावरी रात
       -कमल कपूर
बिना विवाद
छोड़ देते आसन
पात पुराने
        -सुरंगमा यादव
देह ने किया
साँसों से अनुबंध
सच्चा सम्बन्ध
        -पुष्पा सिन्धी
बड़े शहर
छोटा होता जा रहा
'इंसानी' क़द
        -राजीव गोयल
चूर चूर हूँ
टुकड़े  हुआ अहं
स्व से दूर हूँ
       -प्रियंका वाजपेयी
राधा अनंग
रंगी कृष्ण के रंग
गोपियाँ दंग 
      -निगम 'राज़'
ताली बजाती
जूतों का चित्र बना
बेपैर बच्ची
       -पुष्पा सिन्धी
a bird's nest
will never be broken
it's my house
        -Tukaram khillare
घर मेरा है
घोंसला चिड़िया का
तोडूंगा नहीं
         अनुवाद (सु. व.)
कंक्रीट वन
छाँव बरगद की
ढूँढ़ते खग
     - राजीव गोयल
बदली ऋतु
धूप बदहवास
आँगन रोए
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
देखा दर्पण
भूल गए ढूँढ़ना
चाँद का दाग
      -सुरंगमा यादव
प्यासी गौरैया
नदी के तट पर
सकोरा ढूँढे
       - नरेन्द्र श्रीवास्तव
नन्ही गौरिया
दर्पण निहारती
चोंच मारती
      -सुरेश शर्मा
राग दीपक
गौरैया मार रही
टोंटी पे चोंच
       -विष्णु प्रिय पाठक
प्यासे पखेरू
नदी में तलाशते
दो बूंद पानी
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सजी कविता
पुलकित आखर
श्रृंगार करें
       पुष्पा सिन्घी
खिली धूप  में
होती जब  बारिश
नहाता सूर्य
       -सुरंगमा यादव
गरम हवा
अम्बिया को छू कर
करती जवां
        -सूर्य किरण सोनी
भूला खिलौने
बच्चा बना श्रमिक
प्लेट धो रहा
       -डा, रंजना वर्मा
बारह खड़ी
धूल में उकेरता
श्रमिक पुत्र 
      -डा. रंजना वर्मा
बड़े सकारे
छुट्टन गओ  खेत
भैंस रंभाए
      (बुन्देलखंडी) -नरेन्द्र श्रीवास्तव
तप्त तवे पे
जल बिंदु-सी स्वाहा
क्रोध में मति
        -सुरंगमा यादव
पकते गीत
भावों की अंगीठी पे
कवि के मन
       -राजीव गोयल
बुरा है दौर
लूट के चल दिए
दिन में चोर
        -सूर्य किरण सोनी
उठा सवाल
कब तक बवाल
राम बेहाल
       -डा. रंजना वर्मा
हल्की फुहार
सौन्दर्य का दर्पण
देती निखार
        -वलजीत  सिंह
दृगों के गाँव
बसती छबि राम
स्पंदित प्राण
         -पुष्पा सिंधी
सचेत सीते
कितने ही मारीच
आज घूमते
        -सुरंगमा यादव
आज अचानक
आई कड़वी याद
मन कसैला
        -सुरंगमा यादव
अन्धेरा भी है
जीवन तेरे संग
सवेरा भी है
         -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
जुगलबंदी
-----------
जगत रीत
है झूठा अभिनय
सत्य प्रतीत
        -पुष्पा सिन्धी
जग की रीत
चलदिए पल में
तोड़ के प्रीत
        -सुरंगमा यादव
------------------
घर चौबारे
मेहनत के रंग
सजाते सारे
       -बलजीत सिंह
कैसा स्वराज
कैद है कबूतर
मुक्त है बाज़
       सूर्यनारायण गुप्त 'सूर्य'
जुगलबंदी
-------------
था निर्जीव वो
मिली हवा से सांस
जी उठा बांस
       -राजीव गोयल
मैं बुझा सा था
मिला दोस्तों का साथ
हूँ खिला खिला
       -राजीव निगम 'राज़'
-----------------
--------------समाप्त----------------
     




बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु -फरवरी, २०१८

आँखों ने बोये
जब नींद के बीज
उगे सपने
      राजीव गोयल
घर बाहर
औरत का संघर्ष
कितने मोर्चे
     -सुरंगमा यादव
नारी विमर्श
कहाँ तक सार्थक ?
आकाश पुष्प
      -पुष्पा सिन्धी
ग्रहण काल
प्रारम्भ हुआ अब
भगवा रंग
        -विष्णु प्रिय पाठ
आंसू की स्याही
औरत लिख रही
आग का गीत
       -शिव डोयले
लाल सलोना
मइया दुलारावे
लगा डिठौना
        -डॉ. रंजना वर्मा
ख़त तुम्हारा
सिरहाने पे रखा
सपनों भरा
      -सुरंगमा यादव
छोटी सी बात
उलझी रह गई
खुली न गाँठ
       -सूर्य किरण सोनी
चाबी न ताले
सपनों के महल
बड़े निराले
       -बलजीत
धूप का स्पर्श
खिल उठी कलियाँ
महकी फ़िज़ा
        -राजीव गोयल
खोलो गवाक्ष
झाँक रही झिरी से
भोर किरण
       सुरंगमा यादव
नन्हा दुलारा
छिपा परदे के पीछे
कहता ढूँढो
        सुरंगमा यादव
मिटी न प्यास
हो गई ज़िंदगी
खाली गिलास
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
मेघ बरसे
ठूँठ रहे ठूँठ ही
मूरख जन
      सुरंगमा यादव
रंग न रूप,
प्रतिभा से चमके
जीवन धूप
      *
मिट्टी न धूल
विश्वास से महके
रिश्तों के फूल
       -बलजीत सिंह
पी रही रात
चाँद के सकोरे से
चांदनी जाम
        -राजीव गोयल
जैसा ज़हन
हर किसी की होगी
वैसी कहन
       -निगम 'राज़'
हवा गुज़री
बांसों के ह्रदय में
बजी बांसुरी
       -राजीव गोयल
चन्द्र कलाएं
घटती व बढ़ती
संवेदनाएं
      -पुष्पा सिन्धी
हवा ने छुआ
तालाब के दिल में
स्पंदन हुआ
        -राजीव गोयल
पिघल गई
माँ की प्रकृति सी
मन की व्यथा
    *
छोड़ न पाई
दायित्व, माँ थी न वो
बुद्ध तो नहीं
      -प्रियंका वाजपेयी
विनाश खेल
बेपटरी होकर
खेलती रेल
       -सुरंगमा यादव
वेलैंटाइन डे
-------------
कान्हा है भोला
कोई भी बहका ले
डरे राधिका
       -राजीव गोयल
आँखों में अश्रु
अधरों पर हास
वर्षा में धूप
        -सुरंगमा यादव
प्रेम तुम्हारा
मेरी ताक़त और
मेरा ग़रूर
        *
प्रेम का पौधा
शुभहा की आंधी में
उड़ा समूल
      -सूर्य किरण सोनी
ज़िंदगी जिएँ
भूखे को दो रोटियाँ
'प्रपोज़' करें
       -निगम 'राज़'
मेघ रथ से
उतरी जल परी
वसुधा हंसी
    राजीव गोयल
हंसी में छिपे
जाने कितने राज़
सोच से परे
         -शिव डोयले
दूध क माछी
पड़लि खुद गाढे
अब न नाची
        - भीम प्रजापति
        (भोजपुरी हाइकु)
जुगल बंदी
---------------
एक लालसा
मृग मरीचिका सी
तुम्हें तलाशे
     -सुशील शर्मा
भूला हताशा
चल पडा डगर
लेकर आशा
       -सूर्यनारायण 'सूर्य'
---------------
हँसा फागुन
पुष्पित तन मन
बरसे रंग
        -पुष्पा सिन्धी
चाँद-सितारे
आओ न किसी दिन
घर हमारे
       *
शाम ज्यों ढली
अम्बर में तारों की
झालरें जली
        -सूर्य नारायण 'सूर्य'
कड़ी सुरक्षा
सूरज के घेरे में
पृथ्वी की कक्षा
       -बलजीत सिंह
नन्हे जुगुनू
धरती के सितारे
मन लुभाते
        -डा. रंजना वर्मा
दिल के राज़
चाँद है राज़दार
तन्हा सी रातें
       -सुशील शर्मा
छूने को चन्दा
मचलती लहरें
होड़ मचाएं
       *
सूरज अस्त
समापन नहीं ये
अल्प विराम
       सुरंगमा यादव
मेघ डोली में
बारिश दुल्हनिया
हवा कहार
       -राजीव गोयल
माया का मोह
गुड़ में लगा चींटा
जीवन बीता
        -सुशील शर्मा
रक्त रंजित
मानवता का मुख
धो रहे आंसू
      -सुरंगमा यादव
सुनो तो सही
शान्ति की अभिलाषा
दर्द -ए -दास्ताँ
          -नरेन्द्र श्रीवास्तव
प्यार की धारा
जीवन की नैया को
देती सहारा
        -बलजीत सिंह
दिल की नाव
प्रेम की सरिता में
ले हिचकोले
          -नरेंद्र श्रीवास्तव
चातक प्रेम
आसन्न इंतज़ार
स्वाति की बूँद
         -सुशील शर्मा
जुगलबंदी
------------
आद्र नयन
वियोग का विषाद
पिया की याद
       -सुशील शर्मा
पिया न पास
नयनों से झरती
मिलन प्यास
        -सुरंगमा यादव
---------------
इक ग़ज़ल
खुद के पीछे खड़ी
ज़िंदगी मेरी
          *
गहरी प्यास
उजाला शरबत
पी गई रात
       -पुष्पा सिन्धी
ऋतु अनंग
रतिवासित अंग
मन मतंग
     *
मधुप गान
कलियन वितान
नैनन बान
      -सुशील शर्मा
डाली का फूल
नाज़ुक सी ज़िंदगी
करे क़बूल
      -बलजीत सिंह
फूलों की बातें
हवा हौले से सुने
बुने कहानी
       -पुष्पा सिन्धी
उत्सव बेला
फूलों से सजी खड़ी
बसंत सेना
      - रमेश कुमार सोनी
बीते ज़माने
नीली झील की थाह
कोई न जाने
        -पुष्पा सिन्धी
भोर मुस्काती
सजा रही अल्पना
फूलों के द्वार
       -शिव डोयले
बासंती सिला
भूल जाते मित्रों का
शिकवा गिला
        -भीम प्रसाद प्रजापति
नींद न हँसी
पत्थरों के देश में
प्रीत यूं फंसी
        - सूर्य नारायण 'सूर्य'
चिर उर्वरा
मिट्टी है रत्नगर्भा
सृजन सर्ग
        -सुशील शर्मा
जुगलबंदी
-----------
आंसू से लिखा
पत्र वाँचते रहे
देव पत्थर
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
क्या पता कब
देवता बन जाए
कोई पत्थर
       -सुरंगमा यादव
--------------
आंधी में धूल
अपना ठौर भूल
हुई बावरी
       -सुरंगमा यादव
युगों से खड़े
अधर देहरी पे
शापित गीत
       पुष्पा सिन्धी
दीप डंसते
अंधेरों के भुजंग
दम तोड़ते
       -राजीव गोयल
जय जवान जय किसान
-------------------------
देश की मिट्टी
प्यार से भरी चिट्ठी
माता ने लिखी
        -रंजना वर्मा
खेतों की माटी
चन्दन सी शोभित
कृषक तन
        -सुरंगमा यादव     
-----------------------
स्वर्गीय डा. भगवतशरण अग्रवाल को उनके ८८वें जन्म दिन पर
श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए सत्रह आखर में उनकी पांच श्रेष्ठ रचनाएं -

धन्य है वर्षा
खेतों में कवितायेँ
बोते किसान

लू से झुलसी
जेठ की दुपहरी
कराहे पंखे

फूला पलाश
यादों के दीप सजा
आया बसंत

पसर गई
सरसों फूली शैया
माघ की धूप

कभी न जीती
मौत से जिंदगानी
हार न मानी
-------------------------------
श्रद्धांजलि
-----------
देव गमन
भगवतशरण
सदा स्मरण
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बुझ गई लौ
अब तो चमकेंगे
तारों में हम
        -सुरंगमा यादव
--------------
भोर का फेरा
उजाला नहीं रुका
रोज़ का डेरा
        -रमेश कुमार सोनी
भौंरे बावरे
प्रणय रस दूबे
ऐसे सांवरे
        -निगम 'राज़'
क्या है संयम
अपने ही विरुद्ध
शाश्वत युद्ध
       -राजीव गोयल
रात पूनम
आँगन में चुगता
युगल पंछी
         -विष्णु प्रिय पाठक
माथे पे लिखा
कैसे पढ़ती आँखें
भाग्य विधान
    *
कहना चाहे
मन कितना कुछ
शब्द तो मिलें
       -सुरंगमा यादव
फागुनी फाग
झुर्रीदार गाल पे
खिला गुलाल
      -विष्णु प्रिय पाठक
------------------------------------
---------------------समाप्त -------