मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

फरवरी, २०१७ के श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु

आम्र मंजरी
पीहू पीहू गायन
वसंत दूत
     प्रीति दक्ष
ऋतु वसंत
जीवन का स्पंदन
अभिनन्दन
       डा, रंजना वर्मा
सौंपता नहीं
ऋतुराज को राज
अड़ा शिशिर
       दिनेश चन्द्र पाण्डे
करो इतना
वीना से प्रेम धुन
बरसे हे माँ
       प्रियंका वाजपेयी
ऋतु वसंत
लाया नवजीवन
शरद अंत
      मुकेश वर्मा
वासन्ती  ताव
बढाने को आतुर
प्रेम का भाव
       निगम 'राज़'
रुग्ण तरु का
कर रहे इलाज
वैद्य बसंत
     अभिषेक जैन
वृक्षों को देता
नई नई पोशाक
दानी बसंत
      राजीव गोयल
बसंत जोर
दिग दिगंत शोर
ओर न छोर
       रमेश कुमार सोनी
काफी मनाया
खुली छूट मिली थी
मना नहीं था
      (दो सुखन )-आर के भारद्वाज
टेसू में छिप
चलाए कामदेव
शिव पे तीर
       -राजीव गोयल
मीत के गाँव
इमली मीठी लगे
प्रीत का स्वाद
      रमेश कुमार सोनी
कडुवाहट
जैसे ही मैंने पी ली
ज़िंदगी जी ली
        तुकाराम खिल्लारे
रिश्तों की नाव
विश्वास पतवार
लगाती पार
       राजीव गोयल
पल में टूटी
ये नाज़ुक बड़ी थी
विश्वास डोर
     मंजूषा मन
लड़खड़ाती
गिरती पड़ती है
बेचारी मौत
       जितेन्द्र वर्मा
कितनी पीड़ा
फूटा जैसे ही घड़ा
भूकंप आया
        विष्णु प्रिय पाठक
अच्छी लगे है
तुरशी दोपहर की
बैठते साथ
       जितेन्द्र वर्मा
गलन बढी
कम्बल रजाई से
लगन बढी
     डा. रंजना वर्मा
थू थू कड़वा
मीठा तो लप लप
स्वार्थी मनवा
        विष्णुप्रिय पाठ
प्रेम दिखावा
तोड़े गए गुलाब
बिना सबब
        डा. रंजना वर्मा
जीत का स्वाद
संघर्षों की हांडी में
पके तो मीठा
       रमेश कुमार सोनी
लड़कपन
खट्टा मीठा सरीखा
पागलपन
       विष्णु प्रिय पाठक
फूले गुलाब
हुई नवल भोर
हों पूरे ख़्वाब
        मंजूषा  मन
शहर बसे
तू से आप हो गए
यार पुराने
      दिनेश चन्द्र पाण्डेय
पेट में आग
चूल्हे में तिरता है
आँखों का नीर
       प्रीति दक्ष
मने रोटी डे
बाँटें सब रोटियाँ
बुभुक्षकों को
       डा. रंजना वर्मा
जुगलबंदी (१)
-------------
कागज़ नाव
लिखा एक हाइकु
तैरने लगा
       डा.सुरेन्द्र वर्मा
होती कामना
कागज़ की नाव सी
डूब ही जाती
         डा. रंजना वर्मा
जुगलबंदी (२)
--------------
निराश मन
नमी अभी बाक़ी है
आशा किरण
      डा. सुरेन्द्र वर्मा
आशा निराशा
तैरे कभी डूबती
मन की नाव
       राजीव गोयल
------------------
कंदुक बना
हर ठौर ठोकर
लुढ़के सच
       विष्णु प्रिय पाठक
आँखों की भाषा
मौन से मौन तक
प्यार ही प्यार
       रमेश कुमार सोनी
समय चांटा
चमकता सितारा
धूल में पड़ा
        विभा श्रीवास्तव
रंगीन मंच
सफ़ेद लिबास में
भौंकता कुत्ता
        विष्णु प्रिय पाठक
दबा गुलाब
डायरी के पन्नों में
अब भी ताज़ा
        जितेंद्र वर्मा
अम्मा और बाबा
घर में हैं सबके
काशी और काबा
         अमन चांदपुरी
मौत के साए
भागती है ज़िंदगी
जिए ज़िंदगी
       जितेन्द्र वर्मा
न शोरगुल
न पसरा सन्नाटा
चहकी भोर
       प्रियंका वाजपेयी
आकाश सुर्ख
आदित्य की आहट
लजाती भोर
        प्रियंका वाजपेयी
कर्तव्य किया
क्यूँ अपेक्षा करूं मैं
मुक्त पखेरू
       -तुकाराम खिल्लारे
महकी सासें
तुझे छूकर आया
मंद पवन
       डा. रंजना वर्मा
पत्थर दिल
रहता है शीतल
स्पर्श तो कर
       विष्णु प्रिय पाठक
जुगलबंदी
-----------
संधु  में डूब
करती आत्मह्त्या
थकी नदियाँ
      डा. रंजना वर्मा
पाती सकून
आ सागर बाहों में
थकी नदियाँ
      -राजीव गोयल
-------------
मधुबन हूँ
ज़िंदगी के रंगों से
गुलज़ार हूँ
       -प्रियंका वाजपेयी
नन्ही सी बूंद
हथेली पर गिरी
स्वप्न सी उड़ी
       - कैलाश कल्ला
खुश थी रात
सब उसके पास
चाँद सितारे
         -राजीव गोयल
केलि करतीं
कलियाँ हवा संग
सरसों डोली
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
भौंरों ने छुआ
कली से फूल हुई
स्पर्श का जादू
       -रमेश कुमार सोनी
काट के पेड़
थके लकड़हारे
ढूँढ़ते छाँव
      -राजीव गोयल
होते ही भोर
रसोई में बर्तन
मचाते शोर
       -राजीव गोयल
वर्षा की झड़ी
पत्तों पे सजा गई
मोती की लढी
       -राजीव गोयल
धरा के पैर
दरारें जब पडीं
वर्षा ने भरीं
       -राजीव गोयल
फकीर द्वार
लिए आशा हज़ार
खड़ी कतार
        -राजीव गोयल
वर्षा की बूँदें
करें धरा स्पर्श
सोंधी खुश्बू
      -कैलाश कल्ला
नभ को छोड़
रवि खम्बों पे चढ़ा
गोधूलि बेला
       - राजीव गोयल
वो बाँझ सीपी
एक बूंद स्वाति की
आस में जिए
        -राजीव गोयल
कर न सका
माली ही हिफाज़त
कलियाँ बिकीं
        -राजीव गोयल
हाथ न आता
वक्त बिना पंख के
उड़ता जाता
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
आंधी तू ज़रा
फूल से तितली को
छुडा के दिखा
         -राजीव गोयल
एक उत्सव
रोज़ होता है जैसे
जिओ ज़िंदगी
        -जितेन्द्र वर्मा
छुपाए दर्द
जीता रहता हूँ मैं
दर्द ज़िंदगी
        जितेन्द्र वर्मा
आती बहार
खोल वक्त के द्वार
यादें हज़ार
      -राजीव गोयल
बजाए सीटी
गुज़रे जब हवा
आवारा बांस
       -राजीव गोयल
त्रिदल-बंदी
-----------
मातुल छोड़
उड़ निकली चिड़ी
पराए नीड़
      -विष्णु प्रिय पाठक
भीगा आँचल
वीरान है घोंसला
आँखों में जल
       -डा. रंजना वर्मा
आते ही पंख
उड़ जातेहैं चूजे
यादें रुलाए
       -राजीव गोयल
--------------
जो न मिला
पाया उसे स्वप्न में
स्वप्न का खेल
      -जितेन्द्र वर्मा
मारे कंकर
नदिया की धार में
मुड़ी न रुकी
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
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समाप्त 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

ऋतु चक्र ४ -सर्दियों के हाइकु : डा सुरेन्द्र वर्मा


शरद-काल
उतारे श्वेत वस्त्र
धारे, चांदनी

हंसता चाँद
शारदीय पूर्णिमा
करे ठिठोली

माह कार्तिक
शीत-उष्ण पवन
सुखद स्पर्श

पुलक उठीं
जूही मधुमालती
स्वागत क्वांर

शरद ऋतु
मल्लिका इतराई
झूमी डगालें

शरद आया
इठलाई शेफाली
मिलनातुर

क्वार-कार्तिक
हंस पडा शरद
चाँद बौराया

नभ निर्मल
झिलमिल चांदनी
शरदोत्सव

शरादोल्लास
हास और परिहास
यौवनाभास

कांसे का गुच्छा
हरसिंगार की माल
शरद दूल्हा

शेफाली वन
पगलाई पवन
मन सुमन

शरद रात
इठलाई चांदनी
करती बात

शरदागम
खिल खिल उठते
वक्ष सुमन

शरदागम
दिन हो गए छोटे
धूप लजाई

हंसता चाँद
शारदीय पूर्णिमा
करे ठिठोली

सर्द रात में
मन में मैदान में
श्वान भूँकते

शिशिरागम
कचनार सुगंध
मंद पवन

हलकी सर्दी
कचनार ने  बाहें
फूलों से ढँकीं

ओस  से भीगा
शिशिर शरारती
भरे बाहों में

गुलदाउदी  
और अमलतास
हेमंत लास्य

टोपी धवल
श्वेत बर्फ की धारे
सजे हेमंत

सर्द रात में
एक अकेली हवा
बजाती सीटी    

शीत नायिका
धूप में खिली खिली
करे श्रृंगार

खामोश रात
झींगुर की आवाज़
मौन तोड़ती

जाड़ों की वर्षा
पूंछ बरसात की
चूहे से बडी

लपेटे रही
कोहरे की चादर
बेचारी धूप

ठंडी हवाएं
वृक्ष के पत्र दल
थरथराए

धता बताता
सर्दी को, रुका नहीं
कुसुमायन

धूप बेचारी
कराहती ही रही
घना कोहरा

कोहरा डरी
धूप अगहन की
लुप्त हो गयी

सर्द आलम
हम हुए मुश्ताक
धूप बेज़ार

सूर्य निस्तेज
सर्द सर्द हवाएं
आतंक राज

आएगी धूप
कबतक टिकेगा
यह कोहरा

कोई बताए
कैसे लाएं सम पे
सर्दी विषम

सर्द हवाएं
फिरें हैं इठलाती
सत्ता बेकाबू

सुर  न सधा
ठण्ड बजती रही
साज बेसुरा

सर्द हवाएं
आसमाँ लगा रोने
आंसू बहाए

सर्दी का रंग
हेमंत अवाक् खड़ा
फींका क्यों पड़ा

डालियाँ काँपीं
असहाय शजर
शीत लहर

धुंध को चीर
जो आर पार देखे
प्रकाश वीर

कोहरा ओढ़े
गले पड़ गई वो
शाल लपेटे

गंगा ने ओढ़ा
कोहरे का कवच
धार रक्षित

धुंध विचित्र
धुंधली कर गई
उजले चित्र

ठण्ड की मारी
धरती ने ओढ़ ली
कमली काली

समर संधि
सर्द,तो कभी गर्म
संक्रांति काल

देख सरदी
नई रजाई ओढ़
मिन्नी दुबकी

कोहरा ओढ़े
सर्दी में जनवरी
सांवरी भई

सरदी मुन्नी
सड़क पे निकली
कोहरा चुन्नी

शरद श्वेत
उरई के पात पे
बूँदें सफ़ेद

कोहरा ढंका
कभी तो बीतेगा ही
उदास दिन

चम्पई भोर
फुनगी पर काग
करता शोर

ओस से भीगा
शिशिर शरारती
भरे बाहों में

सूर्य निस्तेज
सर्द सर्द हवाएं
आतंक राज

आएगी धूप
कबतक टिकेगा
कोहरा रूप ?

सिकुड़ा पडा
मौसम मनहूस
धूप ले डूबा

सर्दी सताए
आसमां लगा रोने
पत्र गवाह

सर्दी न भाई
छिप गई ठण्ड में
बूढी रजाई

डालियाँ कांपी
असहाय शजर
शीत लहर

सर्दी का रंग
हेमंत खडा अवाक   (क हलंत)
फींका क्यों पडा

कैसा मज़ाक
शिशिर तो मुश्ताक
शीत गायब

मक्की के खेत
हरयाली मायावी
कोहरा ढंकी

ऋतु तो वही
मौसम की जुबान
नेता सी पल्टी

सर्द मौसम
ऋतु से छेड़छाड़
मिज़ाज गर्म

हवा बेकाबू
डगमग पतंग
पता न पंथ

शातिर जुबां
तेज़ कातिल हवा
रोके न रुके

है बड़ा दिन
धरती हो कुटुम्भ
बड़ा हो दिल

व्यतीत वर्ष
पुराना, स्वागत हो
नवल वर्ष

वर्ष पुराना
उसी की राख से
नया जनमा

नए वर्ष में
रचें कुछ मौलिक
बड़ा / सार्थक

सर्दी कम हो
तो खुलें हाथ पैर
कुछ काम हो

नया सोच हो
ढर्रा पुराना छूटे
नई दृष्टि हो

खेले सूरज
लुका-छिपी का खेल
असमंजस

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समाप्त 

सोमवार, 2 जनवरी 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - दिसंबर माह २०१६

१.१२. १६
रात अंधेरी
शिकार पे निकली
डायन सर्दी
      -राजीव गोयल

२ १२ १६
होठों में दबा
वो हंसी का टुकड़ा
ढाए गज़ब
      -राजीव गोयल

३.१२ १६
रात की रानी
महकी रात भर
बनी कहानी
        -राजीव निगम राज
जो काली बिल्ली
काट रही थी रास्ता
दब के मरी
         -राजीव गोयल

४ १२ १६
पथिक संग
चलता रहा रात
चाँद अकेला
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
श्रमिक कथा
आखों से छलकती
उर की व्यथा
       प्रदीप कुमार दाश
तेज़ हवाएं
समुद्र से आ गातीं
विप्लव गीत
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
खेत में गिर
कृषक का पसीना
उगाए सोना
       -राजीव गोयल

५ १२ १६
उम्र पर्यंत
तलाशता ही रहा
बाहर खुदा
      -प्रियंका वाजपेयी
कुचल गए
मोटी किताबों तले
मासूम फूल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
जलता दीप
तन्हाई में गूँजता
खामोश गीत
      -राजीव गोयल
राहें कोहरा
एक एक कदम
खुलती जातीं
         -प्रियंका वाजपेयी

६ १२ १६
चन्दा उड़ेले
मरमरी चांदनी
रात नहाए
        -राजीव गोयल
माँ का आँचल
रजाई से भी भारी
मिटाए सर्दी
         -कैलाश कल्ला
जला अलाव
सभी मिल,बातों का
करें हवन
         -वी पी पाठक

७ १२ १६
फूलों से लदा
बिन पत्तों का पेड़
टेसू का दर्द
      -राजीव गोयल
ये जिंदगानी
अनकही कहानी
नई पुरानी
      -डा. रंजना वर्मा
बातूनी पेड़
बिछड़ी जो पत्तियाँ
हुआ खामोश
      -राजीव गोयल
पहचानिए
रचयिता भीतर
जग रचना
       -जितेन्द्र वर्मा

८ १२ १६
आया शिशिर
हुआ टेसू खामोश
बुझे अंगार
       -राजीव गोयल
हरा के धूप,
आ ही गया कोहरा
कोहराम सा
        -आर के भारद्वाल
षोडशी संध्या
अन्धकार से डरी
सिन्धु में गिरी
         -डा. रंजना वर्मा

९ १२ १६
सूखे गुलाब
गुम हो गई महक
स्मृतियाँ ताज़ी
         -प्रदीप कुमार दाश
अनुभूतियाँ
मन का रत्न कोष
भरती रहीं
        -डा. रंजना वर्मा
बो गए ओले
किसान के खेत में
क़र्ज़ के पौधे
        -राजीव गोयल
ये चदरिया
बुनी नेह धागों से
ओढ़ो सप्रेम
     -मंजूषा मन

१० १२ १६
दो सुखन

जागता रहा
सब जगह खोदा
सोना न मिला
      -आर के भारद्वाज
अनाथ बच्ची
मेरे लिए दौलत
पा-ली है मैंने
      आर के भारद्वाज
सूखे से फटे
बिवाइयों से दुखे
खेतों के पाँव
      -प्रीती दक्ष
गुज़री रात
आया न कोई ख़्वाब
आँखें उदास
     -अमन चांदपुरी
शब्द कटार
करती खामोशी पे
अचूक वार
       -राजीव गोयल

११ १२ १६
ओस के चाटे
नहीं बुझती प्यास
चाहिए जल
       -अमन चाँदपुरी
अंजाना कौन
एक बेमानी प्रश्न
अपना कौन
       -जितेन्द्र वर्मा

१२ १२ १६
प्रात की वेला
करते हरि वंदन
शुक के स्वर
       -डा, रंजना वर्मा
बौराए दिन
सन्न सन्न बहतीं
सर्द हवाएं
      -वी पी पाठक

१३ १२ १६
तूफां के पैर
जम गए धरा पे
उखड़े पैर
       -अभिषेक जैन
उम्र  ने बोई
तजुर्बों की फसल
सहेजूँ कैसे
     -प्रीति दक्ष
वीर पहाड़
पहन हिम वर्दी
अटल खडा
       -राजीव गोयल

१४ १२ १६
गो वत्स स्वर
बाबा की पुकार
माता के लिए
      -डा. रंजना वर्मा
मन बावरा
खंगाले उम्र भर
खोखले रिश्ते
       -प्रियंका वाजपेयी
उग न सका
दगा के कोहरे में
वफ़ा का सूर्य
      -अभिषेक जैन

१५ १२ १६
आसमां चुप
सरसराता  धुंआ
चाँद तनहा
       -प्रियंका वाजपेयी
पत्ते की नाव
हवा खेवनहार
चींटी सवार
      -वी पी पाठक
 
१६ १२ १६
बुढापा बैठा
बाहर धूप सकने
ठंडा जीवन
       -जितेन्द्र वर्मा
कांपते होठ
अनकही कहते
मौन की भाषा
        -डा. रंजना वर्मा
प्रिय की यादें
वर्षा के बुलबुले
फूटे बतासे
       -वी पी पाठक

१७ १२ १६
डूबती नदी
किनारों की चाह में
खूब तड़पी
       -आर के भारद्वाज
डूबा है चाँद
मिलने तेरी याद
चली आई है
       -जितेन्द्र वर्मा

१८ १२ १६
भागी निंदिया
तिजोरी के सोने ने
सोने न दिया
         -अभिषेक जैन
पंख पसार
उड़ते पक्षी संग
मैं उड़ जाऊं
      -अमन चांदपुरी (हाइगा)
हंसता नाती
नानाजी ढूँढ़ रहे
अपनी लाठी
        - दिनेश चन्द्र पांडे

१९ १२ १६
जिया जो कल
बनगया है भूत
आज डराता
     ---जितेन्द्र वर्मा
गज़र गया
छोड़ याद केंचुली
पिछला वर्ष
       -राजीव गोयल

२० १२ १६
सच का सीना
दूभर कर देता
झूठ का जीना
       -आर के भारद्वाज
खुशी के साज
बजें जिन घरों में
स्वर्ग वहीं है    
      -आर के भारद्वाज
बंद किताबें
मज़बून सीने में
दबा के रोईं
     -आर के भारद्वाज
फूल उगते
महकते, टूटते
देते सन्देश
      --मुकेश शर्मा

२१ १२ १६
तापते रहे
प्रपौत्रों के अलाव
बूढ़े नयन
      -प्रियंका वाजपेयी
काश ये मन
न होता नाग जैसा
विश्वासघाती
     -डा. रंजना वर्मा
मन पटल
तन्हाइयों का ब्रश
उकेरे यादें
      -राजीव गोयल
फूल न हुआ
इसी सोच में,,रहा
सूखता काँटा
       आर के भारद्वाज

२२ १२ १६
स्वर्णिम रेखा
सिन्धु उर्मियों पर
स्वप्न सरीखी
       -डा. रंजना वर्मा
तोड़ तपाई
लाल कली लौंग की
फैली सुगंध
     दिनेश चन्द्र पाण्डेय
तुम्हारे लिए
कायनात है पूरी
सोच के भोगो
       -जितेन्द्र वर्मा

२३ १२ १६
खोजे चिड़िया
कटे वन में ठौर
हत्यारा कौन ?
        -रमेश कुमार सोनी बसना
फूलों का दर्द
खुश्बू से भरे , पर
काँटों से घिरे
      -आर के भारद्वाज
बांटता फिरे
चिट्ठियाँ सुगंध की
पवन अश्व
      -राजीव गोयल
हार पे हार
निर्लज्ज है बहुत
फिर तैयार
     -अमन चांदपुरी
गिरा कहर
बनकर कोहरा
थमा शहर
      -राजीव गोयल
सच दीखता
झूठ के बीच जैसे
श्याम में श्वेत
      -जीतेन्द्र वर्मा

२४ १२ १६
नैनों के घन
बरसों हैं बरसे
मन तरसे
      -डा. रंजना वर्मा
पपीहा प्यास
पुकारे दिन रात
पीया न आए
      -विष्णु प्रिय पाठक
जुगल बंदी --

बचा न पाए
आँगन की तुलसी
संध्या दीपक
        -प्रियंका वाजपेयी
जलें न दिए
आजकल घरों में
तुलसी तले
        -राजीव गोयल
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२५ १२ १६
ठण्ड की रातें
अनकही सी बातें
कितनी लम्बी
      -डा. रंजना वर्मा
खेलते रहे
लुका-छिपी का खेल
कोहरा धूप
      -वी पी पाठक
कंडे की आंच
सुलगती रहती
अम्मा तापती
       -जितेन्द्र वर्मा
लता का स्वर
लवंग लतिका की
घुली मिठास
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय

२६ १२ १६
खो गई धूप
ढूँढ़ती रही शीत
हाथ मलती
       -वी पी पाठक
परिंदे लौटे
जी उठा फिर से
सूखा दरख़्त
      -राजीव गोयल

२७ १२ १६
याद आगया
वृद्धाश्रम में माँ को
बेटे का ज़ख्म
     -अभिषेक जैन
रेल खिड़की
मंज़र नजारों का
खुली किताब
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सत्ता चरित्र
हिमपात के वक्त
सूर्य लापता
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मैं और तुम
नदी किनारे खड़े
फिर भी प्यासे
       -आर के भारद्वाज
दो सुखन
(१)   आतंकी मरा
चुभा काँटा निकला
कंटक कटा
       -आर के भारद्वाज
(२)   आंधी में पेड़
मुठभेड़ में गुंडा
ढेर हो गया
        -आर के भारद्वाज
जुगलबंदी -

हिमपात से
प्रसन्न पर्यटक
नव उमंग
       -डा. रंजना वर्मा
आए सैलानी
पहाड़ों ने पहनी
बर्फ़ीली टोपी
      -राजीव गोयल
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आया न चाँद
रोता रहा चकोर
ओस गवाह
       -राजीव गोयल

२८ १२ १६
जोश ढो लाता
भोर रश्मि सारंगा
धुंध मिटाता
       -विभा श्रीवास्तव
गरीब झुग्गी
पक रही है भूख
ठन्डे चूल्हे पे
        -राजीव गोयल
दुःख में सुख
ढूँढ़ता रहता हूँ
ऐसे जीता हूँ
       जितेंद्र वर्मा

३० १२ १६
स्वप्न धवल
ख्यालों-मुंडेरों सजे
वर्ष नवल
     -विभा श्रीवास्तव
धूप-कोहरा
खेलें आंखमिचौली
सखी-सहेली
      -रमेश कुमार सोनी
ठंडी हवाएं
जिस्म में समाकर
रूह जमाएं
       -निगम 'राज़'
बर्फ के फोए
उड़ते हवाओं में
बांधते समां
       -जितेन्द्र वर्मा
मेरे जो लम्हे
बहका लिए तूने
उन्हें लौटा दो
      -आर के भारद्वाज

३१ १२ १६
हटीला बड़ा
प्रकाघ की राह में
कुहासा खडा
     -संतोष कुमार सिंह
बहती जाएं
भावों की नदिया में
शब्दों की नौका
     -राजीव गोयल
झरती रही
रात भर कामिनी
फूलों की सेज
      -डा. रंजना वर्मा
बारह माह
खट्टा मीठा सा स्वाद
गुज़रा साल
     वी. पी .पाठक
राम राम जी
साल का आख़िरी है
दिनमान जी
      -निगम 'राज़'
 सूर्य ने भेजा
किरणों भरा जाल
कोहरा फंसा
       -आर के भारद्वाज

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बुधवार, 30 नवंबर 2016

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - नवंबर माह के हाइकु-

२  ११ १६ 
हद हो गई 
कानून के ऊपर 
उनका कद 
       -संतोष कुमार सिंह 
हुआ न यकीं           
गरीबी की तस्वीर 
लाखों में बिकी 
         -राजीव गोयल (हाइगा)
देह की पीड़ा
सही, सह न सके 
मन की पीड़ा 
         -प्रियंका वाजपेयी 
गहरी होतीं 
उम्र के साथ साथ 
बुज़ुर्ग आखें 
       -प्रियंका वाजपेयी 

३ ११ १६
अमीर बन
पर दिल में ज़िंदा
फ़कीर रख
      -राजीव गोयल
मन बांसुरी
जीवन है बजाती
राग करुण
       -वी पी पाठक
रुक जा वक्त
मिला है यार मेरा
बाद मुद्दत
       - राजीव गोयल

४ ११ १६
माटी की गंध
कलम की सुगंध
रचाते छंद
      -प्रदीप कुमार दाश
दिल की खुशी
माँगते फकीर से
दौलतमंद
       -राजीव गोयल
मन के रिश्ते
मन में ही बसते
हुए न सस्ते
        -डा रंजना वर्मा

५ ११ १६
ओढ़ के हिम
मना रहे पहाड़
शरदोत्सव
       -राजीव गोयल
नयन उगा
आंसू बन टपका
एक सपना
      -डा. रंजना वर्मा
धीरे धीरे से
गुज़रती जाती है
वाह ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा

६ ११ १६
निकली भोर
सजाए माथे पर
सूर्य बिंदिया
      -राजीव गोयल (हाइगा)
बेला गोधूलि
सूरज लेने चला
जल समाधि
       राजीव गोयल (हाइगा)

७ ११ १६
चटकी कली
लूटने को आतुर
चले भंवरे
       -डा. रंजना वर्मा
छुपाए दर्द
जीता रहता हूँ मैं
दर्द ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा
गिरफ्तार है
सुमन की जेल में
पराग चोर
      -वी पी पाठक
सर्द मौसम
सौउं मैं सुकून से
ओढ़ के धूप
      -राजीव गोयल
zoom your happiness
in the canvas of life.
happiness is life .
      - जितेन्द्र वर्मा

८ ११ १६
वृक्ष अकेला
फल अनगिनत
दे निरंतर
      -डा. रंजना वर्मा
मन भावन
कभी जो रोकडा था
जंजाल हुआ
       -दिनेश चन्द्र पाण्डे

९ ११ १६
जली पराली
प्रदूषित है हवा
घुटती साँसें
      डा. रंजना वर्मा
कल से आशा
कल का पछतावा
ज़िंदगी यही
       -राजीव गोयल
धागे दूब के
पिरो जाती सुबह
मोती ओस के
      -राजीव गोयल
उपेक्षा तूने
दी झोली भर मुझे
कैसी ये भीख
      आर के भारद्वाज
नामुमकिन
पाना निजातेदर्द
दर्द ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा

१० ११ १६
सूरज पंख
फड़फड़ाए अब
लो भोर हुई
       -मंजूषा मन
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जुगलबंदी  -

मन चकरी
घुमाती रही प्रश्न
मैं स्वयं कौन ?
      -वी पी पाठक
सदा से रही
आत्म तत्व की खोज
नहीं मिलता
      -डा. रंजना वर्मा  
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११ ११ १६
घर में आई
चुगलियों की भेंट
ईर्ष्या की जीभ
      -अभिषेक जैन
माथे पे बल
चिंताओं की लकीरें
ओ! काला धन !
      -प्रियंका वाजपेयी
मिट्टी की नाव
कैसे पहुंचे पार
पानी सवार
       -वी पी पाठक
गिरि कोख से
झरता झर झर
वह निर्झर
      -प्रदीप कुमार दाश
लिखता रवि
किरण कलम से
भोर के गीत
       -राजीव गोयल

१२ ११ १६
ऊंचे दरख़्त
नभ तक ले जाते
हमारी बात
       -प्रियंका वाजपेयी
पहाडी नदी
जैसे बहती सदी
अनवरत
         -डा. रंजना वर्मा
बादल गरजे
लडे  एक दूजे से
बरसे नहीं
        -जितेन्द्र वर्मा
घुन करता
उसी अन्न में छेद
ज़िंदा जिस पे
        -राजीव गोयल
प्रदूषण से
हवा का दम घुटा
सांस ले या दे
         -आर के भारद्वाज

१३ ११ १६
काली रात है
सूरज सो गया है
चाँद डटा है
        -अमन चाँदपुरी
बहती नदी
देख सूरज जला
नदी झुलसी
       -अमन चाँदपुरी      
सूरजमुखी
उजाला पक्ष देखे
रहता सुखी
        -मुकेश शर्मा
वाह रे साधू
भोगी के धन पर
योगी का ठाठ
       -वी पी पाठक

१४ ११ १६
बैठी जाकर
मंदिर के अन्दर
काली दौलत
     - वी पी पाठक
बाल दिवस
कितना उपेक्षित
बाल जीवन
        -डा. रंजना वर्मा
याद पुरानी
टूटते अनुबंध
मेरी कहानी
       -निगम 'राज'
विद्द्युत तार
कतारबन्द खग
बिल्ली ताक में
      -तुकाराम खिल्लारे
पतझर में
बन तितली उड़ें
पीली पत्तियां
       -राजीव गोयल
दबे थे नोट
मोहनजोदड़ो से
निकले आज
        -कैलाश कल्ला
बच्चे हंसते
झर झर हंसते
हरसिंगार
      - वी पी पाठक

१५ ११ १६
सिन्धु न बढ़ा
नदी पीछे न मुड़ी
हो गए एक
        -कैलाश कल्ला
आंधी दौड़ी है
पत्ते बने तितली
भू बनी गुल
        -विभा श्रीवास्तव (हाइगा)
हुआ फरार
भगाकर रात को
आशिक चाँद
         -अभिषेक जैन
हांपता  रोड
सुबह टहलने
निकला तोंद
     -वी पी पाठक
बूंद से सिन्धु
बदले कई रूप
वस्तु तो एक
       -कैलाश कल्ला
मन सलाई
लेके यादों के धागे
बुने अतीत
      -राजीव गोयल

१६ ११ १६
ख़्वाब ने देखी
हकीक़त पहले
दंग हुआ मैं
      -जितेन्द्र वर्मा
करे खोखली
संदेह की दीमक
रिश्तों की नींव
       -राजीव गोयल
जुगुनू लिए
ढूँढ़ रही है चाँद
मावसी रात
         -राजीव गोयल
थका कार्मिक
बोतल का सहारा
सोता टुन्न
      -जितेन्द्र वर्मा
प्यारी गुड़िया
मेड इन इंडिया
विदेशी बोल
       -वी पी पाठक

जुगल बंदी --

मन मंजूषा
रखी सहेजकर
आंसू की बूंद
     डा. रंजना वर्मा

१७ .११.१६
रूमाल नहीं
दो मीठे बोल चाहें
भीगी पलकें
        -मंजूषा मन (हाइगा)
------------

जुगलबंदी --

सिन्धु चूमने
नीचे उतारा भानु
डूब ही गया
       -कैलाश कल्ला
जलते बदन
नहाने आया सूर्य
लगाया गोता
       -मुकेश शर्मा (हाइगा)
---------
बहती हवा
बहका ले जाती
मन को मेरे
      -अमन चांदपुरी
बैठी चिड़िया
देख हाथ पसारे
छोटी बिटिया
        -कैलाश कल्ला

१८ ११ १६
मेरा वतन
खुशियों का चमन
अभिनन्दन
     -डा. रंजना वर्मा
खोल ही दी
आफत की चाबी ने
बंद दिमाग
        -अभिषेक जैन
काली कमाई
गौरैया के पेट में
हाथी का बच्चा
        -वी पी पाठक
सर्द मौसम
सो रहा सूरज
ओढ़ के धुंद
      -राजीव गोयल

१९ ११ १६
अंजान स्वयं
केवल आडम्बर
धोखा खुद से
        -प्रियंका वाजपेयी
जगते बच्चे
सुबह हो गई क्या
कहते बच्चे
      -प्रियंका वाजपेयी
भोर ज़िंदगी
बदलती शाम में
डूबी रात में
       -जितेन्द्र वर्मा
छपे सतत
मन टकसाल में
इच्छा के सिक्के
     अभिषेक जैन
बेच ईमान
कमाए जो नोट
कागज हुए
       -राजीव गोयल

२० ११ १६
गंदगी में भी
है फूल महकता
उन्नत माथा
        -तुकाराम खिल्लारे
छुए पवन
सिहर उठता है
झील का तन
     -राजीव गोयल
पूनों]की रात
लहरें बन नाचे
सिन्धु अपार
      कैलाश कल्ला
बाहर बिल्ली
चूहेदानी में चूहा
दोनों बेचैन
       -राजीव गोयल

२१ ११ १६
प्याली में सुख
प्रेम की एक चुस्की
मिटेंगे दुःख
       -मंजूषा मन
मांगे थे पैसे
दे गई प्रवचन
पिता की जेब
       -अभिषेक जैन
हांक ले गया
पवन गड़रिया
मेघ रेवड़
      -राजीव गोयल  
   
२२ ११ १६
मन बागीचा
उगे यादों के फूल
टपके आंसू
       कलाश कल्ला
लगता रहा
पहरे पे पहरा
चोर आज़ाद
        -वी पी पाठक
मिलें बिछड़े
जैसे क़त्ल मुझको
किश्तों में करें
      -राजीव गोयल

23 11 16
जुगलबंदी

झील जल में
खेल रहा चन्द्रमा
लहरों संग
     -डा. रंजना वर्मा
स्तब्ध चन्द्रमा
झील में देखकर
जुड़वां भाई
      -राजीव गोयल
---------------
चुरा के भागी
बगिया से सुगंध
चोरनी हवा
       -राजीव गोयल
दोस्तों का जाल
पैगाम पे पैगाम
फिर अकेला
      -वी पी पाठक

२४ ११ १६
अबला नहीं
सरहद पे लड़ी
सबल खड़ी
       -वी पी पाठक
प्यार की बाढ
सहजते न बने
माँ का प्यार
        -जितेन्द्र वर्मा
भोर का तारा
अम्बर में टहले
मुंह अँधेरे
       राजीव गोयल
चाँद तनहा
झील की पगडंडी
चला अकेला
       - प्रदीप कुमार डास (हाइगा)

२५ ११ १६
कामनाएं हैं
हिरन के छौनों सी
भागती जाएं
       -डा. रंजना वर्मा
दिल्ली से आई
पोटली विकास की
हवा हवाई
       -वी पी पाठक
पल रहे हैं
जाने कितने गम
चुप्पी के नीचे
        -राजीव गोयल (हाइगा)
चाँद उतरा
नदिया में नहाने
लहरें खुश
      -जितेन्द्र वर्मा

२६ ११ १६
टूटती आस
बिखर जाते  ख़्वाब
उठती टीस
       राजीव गोयल
मूँगफलियाँ
झोला भर के लाए
बाबूजी आए
        -मंजूषा मन
नहा ओस में
हो गई तरोताजा
भोर की धूप
       +राजीव गोयल

२७ ११ १६
सर्द मौसम
कुछ धूप बचा लें
रात के लिए
       -राजीव गोयल
धान बालियाँ
महकती कुटिया
कृषक खुश
        -प्रदीप कुमार दाश
kindle the lamp
darkness all around
something burning?
         -Tukaram Khillare

28 11 16
मिथ्या उर्मियाँ
मरुजल छलका
मोह फंसाया
     -विभा श्रीवास्तव
किरणांगुली
विद्रोहणी फोड़ती
ओस गुब्बारे
     -विभा श्रीवास्तव
मटर खिली
नीलम की सी डली
खेत अंगूठी
       -डा. रंजना वर्मा

२९ ११ १६
बुलबुलों से
ये तुम्हारे वायदे
उभरें टूटें
        -राजीव गोयल
पन सउआ
बंद ऐसा हुआ
चिढाए मुआ
       राजीव निगम 'राज'
रस्सी को सांप
कहकर डराया
खूब सताया
       -मंजूषा मन

३० ११ १६
आई धरा पे
ओढ़ धूप का शौल
उजली भोर
       -राजीव गोयल
नाचती धूल
झरोंखों से झांकती
जब भी धूप
      -दिनेशचन्द्र पाण्डेय

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समाप्त


















सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु अक्टूबर , २०१६

०१  .१० .१६
समुद्र खेत
लहरों की फसलें
उपजे रेत
     -राजीव गोयल
जुगलबंदी
-----------
खर्च करूं मैं
चलाने को ज़िंदगी
साँसों के सिक्के
        राजीव गोयल
तन गुल्लक
गिनी साँसों के सिक्के
बजें बहुत
       -डा. रंजना वर्मा
--------------
मातु चरण
चारों धामों का पुण्य
मिला शरण
      -प्रदीप कुमार दाश
ज़िंदगी भर
रह गया तनहा
मन बावरा
      -प्रियंका वाजपेयी

०२. १०. १६
बहा ले गई
ख्वाहिशों की बारिश
दिल का चैन
     -अभिषेक जैन
जुगल-बंदी
-------------
माँ का आँचल
रखे सदा बेख़ौफ़
है अविचल
      -मुकेश
गर्मी में छाँव
सर्दियों में अलाव
माँ का आँचल
        -राजीव गोयल
--------------

३ १० १६
गिरी डायरी
हौले से झाँक उठी
एक पंखुरी
      -डा. रंजना वर्मा
खुली डायरी
बाहर कूद आईं
यादें पुरानी
      -राजीव गोयल
सरसराए
खेतों में ज्यूँ सरसों
बातें मन में
      -प्रियंका वाजपेयी
छली गई वो
कभी बनीं दामिनी
कभी निर्भया
       -प्रदीप कुमार दाश

४ १० १६
स्वाद बढाती
चुटकी नमक की
अति वर्जित
     -डा. रंजना वर्मा
दब के मरे
फूल से रिश्ते
जुबां के मलवे में
        -अभिषेक जैन
पडा घायल
शब्द तीर शैया पे
रिश्तों का भीम
      -राजीव गोयल

जुगलबंदी

सर्दी की रात
ठिठुरती कोने में
ढूँढे अलाव
     राजीव गोयल
 खूब ठिठुरी
अलाव ढूँढ़ती रात
कहीं न मिला
      -आर के भारद्वाज
------------
दादी से सुनी
कथा सुनाए बिट्टो
गुडिया सोए
      -जितेन्द्र वर्मा

५ १० १६
घर से मेरे
उड़ गई गौरैया
अंगना सूना
      राजीव गोयल
पाखराविण
झाड उदास झाले
अर्धे वाळले
       (मराठी )-तुकाराम खिल्लारे

६ १० १६
पंकिल जल
नित रहे नहाता
दाग न छूटे
      -रंजना वर्मा
जुगल बंदी

पूछे आइना
किसका मुखौटा है
मुख पे तेरे
      -राजीव गोयल
रहा ढूँढ़ता
सबसे बड़ा मूर्ख
दर्पण मिला
      -वी वी पाठक

७ १० १६
कहाँ से आई
झींगुर की झंकार
निशा ढूँढ़ती
       - वी पी पाठक
दिल न मिले
बीच में आया पैसा
रहे फासले
      -अभिषेक जैन
रहता ज़िंदा
बेंच अपनी साँसें
गुब्बारे वाला
       -राजीव गोयल (हाइगा)
खूब सेंक ली
अब ढलने को है
धूप उम्र की
     -राजीव गोयल (हाइगा)

८ १० १६
जुगलबंदी

कहीं गूँजता
ऊंचा उठ सुनिए
नाद ब्रह्म का
       -प्रियंका वाजपेयी
गूँजा करता
चहुँ ओर व्योम में
ओ३म  का नाद
     -जितेन्द्र वर्मा
   -------------
चुरा लिए हैं
तुमने मेरे लम्हे
मैं रीत गया
     -आर के भारद्वाज
ढला सूरज
पहाड़ों से उतरे
रात के साए
       - राजीव गोयल

९ १० १६
आहट  नहीं
छूजाती है खुशबू
तू यहीं कहीं
       -प्रियंका वाजपेयी
जुबां नहीं है
आँखों से बयाँ होती
दास्ताने इश्क
        -प्रियंका वाजपेयी
अमा के घर
रमा की पहुनाई
द्युति दमके
        -विभा श्रीवास्तव
टिकता कहाँ
कलई चढा झूठ
सच के ताप
      -विभा श्रीवास्तव
पीला गुलाब
रजनी गाल पर
मले चन्द्रमा
      -डा. रंजना वर्मा
ले आए अश्क
अतीत के हाट से
यादों के धनी
      -अभिषेक जैन
चाँद से कहा
बापू से जब मिलो
बताना मुझे
       -प्रदीप कुमार दाश
घंटा देखता
मंदिर में केवल
पैसा बजता
       -वी पी पाठक
सूरज ढला
करने को उजाला
दीपक जला
     -राजीव गोयल
सूरज उगा
कर सूर्य नमन \                        
दीपक बुझा
      -राजीव गोयल
बैठी खामोश
शाखाओं की गोद में
नन्हीं कोपलें
     -राजीव गोयल

१० .१० .१६
ले आया घर
ग़ुरूर कमाकर
साहब बेटा
       -अभिषेक जैन
पुतला जला
भीतर का रावण
मुस्करा रहा
       -प्रदीप कुमार दाश

११ १० १६
हार ही गया
लंकापति रावण
नारी तेज से
     -डा. रंजना वर्मा
दसों गुणों को
गुना करें मन में
तो दशहरा
      -प्रियंका वाजपेयी

१२ १० १६
गटक गई
बोतल शराब की
अम्मा की दवा
    -अभिषेक जैन
नई दीवाली
गरीबों के घर हो
रोशनी वाली
       -राजीव निगम राज
दादा के किस्से
नानी की कहानियां
स्वप्न सरीखे
      -डा. रंजना वर्मा
वो बासी फेंके
यह बासी पे जीता
भाग्य का खेल
      -राजीव गोयल

१३ १० १६
श्याम सघन
मेघों में डोल रही
चन्द्र किरण
     -डा. रंजना वर्मा
सोचे चकोर
कभी तो पिघलेगा
निर्मोही चाँद
     -राजीव गोयल
झूलती रही
समीर की बाहों में
रात की रानी
         -जितेन्द्र वर्मा
अकेला नहीं
तुम्हारी यादें संग
या खुद तुम
      - आर के भारद्वाज
      (जितेन्द्र वर्मा के एक अंग्रेज़ी हाइकु का अनुवाद )

१४ १० १६
मैं हिम खंड
तुम गर्म हवा सी
छू पिघला दो
        -डा. रंजना वर्मा  
        (जितेन्द्र वर्मा के एक अंग्रेज़ी हाइकु का अनुवाद)
मासूम नदी
वर्षा ने बना डाली
आतंकवादी
      राजीव गोयल

जुगलबंदी

कितनी बार
टहनी तोड़ डाली
फिर से आई
      -तुकाराम खिल्लारे
तोड़ेंगे सब
जुड़ना होगा खुद
यही दस्तूर
       -मुकेश वर्मा
-------------

१६ १० १६
कर्म की शाख
हिलाने से गिरते
फूल झोली में
        - प्रदीप कुमार दाश
किताबें नहीं
वक्त देगा तुझे
जीवन ज्ञान
      -राजीव गोयल
तेरी यादों का
विस्तार ही यह है
रोज़ तड़पूँ
       - आर के भारद्वाज

१७ १० १६
पड़ी दरार
उठ गई दीवार
रिश्तों के बीच
      -राजीव गोयल
डंसता रहा
स्मृतियों का नाग
मन के द्वार
       -डा. रंजना वर्मा
नोट खाए हैं
कुर्सी बीच पड़े हैं
अफसर हैं
        वी पी पाठक
रंग बिरंगी
मानस की क्यारियाँ
स्मृतियाँ फूलें
      -प्रियंका वाजपेयी
प्यार का मोती
निखरता ही जाए
बन के ताज
        -मुकेश

१८ १० १६
जुगल बंदी

रिश्तों में रहे
माधुर रस टिका
गन्ने की गाँठ
       विभा रानी श्रीवास्तव
मिठास भरा
मीठे रिश्तों के जैसा
गन्ने का रस
      - डा. रंजना वर्मा
ऐसा मीठा हो
रिश्तों का ताना बाना
रस छलके
        -आर के भारद्वाज
 -----------
स्वयं को देखें
निकट दृष्टि दोषी
नीति नियंता
       -वी पी पाठक
ठिठकी फिजा
पूछे खामोशियों से
तेरा ही पता
        -राजीव गोयल
संग सखी के
फुगड़ी खेलें हम
बेफ़िक्र मन
        -पीयूषा (हाइगा)
झूमें व गाएं
जीवन उत्सव है
आनंदित हों
      - मुकेश (हाइगा)
नाचते गाते
ज़िंदगी जो बिताते
धूम मचाते
       - राजीव निगम राज़ (हाइगा)
आज का चाँद
दिखाता है नखरे
आए देर से
       (करबाचौथ पर -) राजीव गोयल

२१ १० १६
तैर पानी में
उतारती है पार
नाव उदार
      -राजीव गोयल

२२  १० १६
निकल पड़ी
ले ख़्वाबों की गागर
राहें अंजान
       -राजीव गोयल (हाइगा)
पूनों की रात
महकती मालती
डोरे डालती
       -(गंध बिम्ब) राजीव गोयल
रात उदास
आएगा कोई नहीं
इस तमस
       -तुकाराम खिल्लारे

२३ १० १६
रूठ गया है
क्यूँ गाँव से त्योहार
पूंछो न यार
        - अमन चाँदपुरी
शरद काल
थरथराने लगे
मौन अधर
       - डा. रंजना वर्मा
तन्हा थे भाव
शब्दों से मुलाक़ात
मैत्री प्रस्ताव
        -अभिषेक जैन
दिए के नीचे
गुमसुम बैठा है
घुप्प अन्धेरा
        - जितेन्द्र वर्मा
तम मिटाने
जलता है दीपक
हवा क्यों खफा
        -राजीव गोयल

२४ १० १६
राह दिखाता
हथेली में सूरज
बन के दिया
       -प्रदीप कुमार दाश
कभी ख़्वाब हो
कभी हकीकत हो
ज़िंदगी तुम
     - प्रियंका वाजपेयी
कहीं गूँजतीं
अनाहद आवाजें
रहस्य नाद
       - प्रियंका वाजपेयी
लौट के आए
अच्छे वक्त के साथी
प्रवासी पंछी
        -दिनेश चन्द्र पांडे

२५ १० १६
दीपक राग
पिघलादे अन्धेरा
बहे प्रकाश
        -राजीव गोयल
लड़ रहे हैं
माँ रहे सलामत
देश के दीपक
       -वी पी पाठक
आहें निकली
हिचकियाँ साथ थीं
रात यों रोई
       -जितेन्द्र वर्मा

२६ १० १६
भीगी जो धूप
रंग इन्द्रधनुषी
बह निकले
       -राजीव गोयल

२७ १० १६
ढूँढ़ता रहा
उम्र भर चैन
तड़प मिली
       -जितेन्द्र वर्मा
नहीं निकला
देख दीप मालाएं
चाँद शर्मीला
     -वी पी पाठक

२८ १० १६
रक्त की बूँदें
बन जाती प्रदीप
गिर सीमा पे
     -डा. रंजना वर्मा
ज़िंदगी बाकी
गिरी नहीं है अभी
आख़िरी पत्ती
       -राजीव गोयल
लाएं दियाली
मिट्टी के दिए वाली
हो खुशहाली
      -राजीव निगम राज़

२९ १० १६
प्रतीक्षारत
नयन प्रदीपों में
उम्मीद की लौ
      डा. रंजना वर्मा
एक दीपक
मन का भी जलाया
किया उजेला
      -दिनेश चन्द्र पांडे
दीपक जला
बन प्रकाशपुंज
तम पिघला
      - राजीव गोयल
सहस्त्र नाव
अमा श्यामली
जुगुनू लादे
     -विभा श्रीवास्तव

३० १० १६
जीर्ण वृक्ष को
आए कोमल पत्ते
जीना फिर से
       -तुकाराम खिल्लारे
हर मन में
प्रेम का दिया जले
यों प्यार पले
      -जीतेन्द्र वर्मा
दीप जलाएं
तम को पी जाने का
हुनर सीखें
     -प्रदीप कुमार दाश
मोमबत्तियां
उजाले की चिंता में
भस्म हो गईं
       - आर के भारद्वाज
३१ १० १६
तम संहार
दीपक छोड़ रहा
प्रकाश बाण
       -राजीव गोयल
पकती भूख
ठंडी अंगीठी पर
गरीब झुग्गी
      -राजीव गोयल
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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

डा. सुरेन्द्र वर्मा : हाइकु वर्षा ऋतु

डा. सुरेन्द्र वर्मा - हाइकु, वर्षा ऋतु

हम संतप्त
मेघ तुम रक्षक
बरस पड़ो

मातृत्व हेतु
तैयार है धरती
बूँदें तो पड़ें

वर्षा की गंध
सुप्त पडी धरती
महक उठी

मेघा बरसे
फिर से उम्मीद से
हुई धरती

धरा आकाश
हवा पानी रोशनी
रचते काव्य

कदम्ब तले
श्वेत किंजल गेंद
पावस सोंदर्य

वर्षा पवन
अट्टहास बादल
डर भी डरे

दिखा अंगूठा
अल्मस्त चल  दिए
मेघ सैलानी

ताल तलैया
बूंद बूंद रचना
नाले नदियाँ

बूंदों की झड़ी
लगी बरसात में
यादों की लड़ी

अमृत जल
सदा रहे बहता
बहाओ मत

हैं इस पार
बेमौसम मल्हार
आर्त पुकार

घन गरजे
चमकी तलवारें
बरस पड़े

वर्षा उदंड
भिगो कर ही माने
उड़ा दे छाता

प्रकृति बूटी
वर्षा के रंग देखे
वीर बहूटी

सारी प्रकृति
स्वर ताल में नाचे
साधे संगीत

वर्षा की झड़ी
रोने पे जो आ जाए
रोके न रुके

पेड़ों ने पाया
वर्षा का उपहार
वस्त्र नए

पानी पीकर
पहली बरसात
जिए पोखर

सूखे हैं पड़े
थोड़ा पानी प्यार दो
पुन: जी उठें

रोके है वर्षा
कहाँ जाओगे बाहर
रुक जाओ ना !

धरा की साड़ी
भीगी व भिगो गई
अन्दर तक

उमस भरी
वर्षा की दोपहरी
घबराहट

धरती गाए
काले मेघा पानी दे
गुड़धानी दे

गाता आकाश
स्वागत में वर्षा के
बादल राग

धरा आकाश
बादलों का विस्तृत
खेल मैदान

वर्षागमन
तप्त देह धरा की
कसमसाई

झूले श्रावाणी
सखियाँ बादरियाँ
पेंग लगातीं

बाद मौसम
शान से तना खड़ा
कुकुरमुत्ता

कुछ कड़वी
निबौली सी ज़िंदगी
कुछ मीठी सी

धूसर पौधे
वर्षा जल में धुले
नए हो गए

बहता पानी
ठौर नहीं ठहरे
गढ़े कहानी

मिट्टी की गंध
वर्षा से मुक्त हुई
फैली स्वच्छंद

हरी घास पे
बारिश बूँदें, आँखें
झिलमिलाईं

कुएं बावडी
इन्हें बचाओ भैया
ताल तलैया

कमल गान
पोखर के बाहर
व भीतर भी !

खिलखिलाती
सद्य-स्नाता प्रकृति
बाद बारिश

थम गई है
वर्षा, टपकती है
छत फिर भी

सुप्त धरा की
जाग उठी है गंध
स्वागत वर्षा

मेघ चिरैयाँ
फैलातीं  जब पंख
हंसता ताल

पहने कोट
लाल मखमल का
वीर बहूटी

बरखा झूमें
तूम तनन तूम
गाए तराने

बाद बारिश
पौधों की हरी ताज़ी
हंसी, बच्चों सी

बिखरे मेघ
आकृतियाँ गढ़ते
बुनते स्वप्न

मेघ बरसे
सितार पर झाला
सुने धरती

मेघ रीतते
इसीलिए भरते
वे फिर फिर

रचाते चित्र
कलाकार बादल
बुनते स्वप्न

रात वर्षा की
अंधेरी, घोंसलों में
ज्योति जुगनू

लहरें पानी
नावें व मछलियाँ
खुश है वर्षा

वर्षा का स्पर्श
धरती अंगड़ाई
हरी हो गई

वर्षा में भीगे
धुले उजाले पौधे
हँसे विहँसे        

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समाप्त