शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मार्च २०१७ के श्रेष्ठ हाइकु

मार्च '१७ के श्रेष्ठ हाइकु

कलश यात्रा
मंदिर स्थापना की
बाज़ार नाचे
        -विभा श्रीवास्तव
नीड़ में बीते
चार दिन ज़िंदगी
बसे उजड़े
        -रमेश कुमार सोनी
गोधूल वेला
सागर तट पर
विहंग मेला
        -विष्णु प्रिय पाठक
चुरा लेती है
धूप मेरे हिस्से की
ऊंची हवेली
        -राजीव गोयल
उडाता रवि
बोरा-भर गुलाल
सांझ के द्वार
       -राजीव गोयल
फड़फड़ाती
पिजड़े में चिड़िया
बुर्क़े में नारी
        -विष्णु प्रिय पाठक
रंग में रंग
मेरे श्याम का रंग
चढे न दूजा
        -रमेश कुमार सोनी
सहता रहे
लहरों का आतंक
तपस्वी तट
        -राजीव गोयल
जुगलबंदी
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अबकी बार
पधारो म्हारे गाँव
होली खेलण
        -जितेन्द्र वर्मा
पधारो प्रिय
जब इस आँगन
दे जाना मन
        -रंजना वर्मा
---------------
बेला गोधूली
सूरज लेने चला
जल समाधि
     -राजीव गोयल
समत्व रंग
लहराए उमंग
होली तरंग
       -पीयूषा
बेटी बहन
प्रेयसी पत्नी माँ
रूप अनन्य
     -प्रदीप कुमार दाश
सूरज बाल
मल गया गुलाल
उषा के गाल
        -डा, रंजना वर्मा
फागुन मास
पलाश ने दिशाएं
रंग दीं लाल
       -राजीव गोयल
होली क्या खेलूँ
बलम घर आए
रंगे-रंगाए
      -दिनेश चन्द्र पांडेय
निकली भोर
लगाए माथे पर
सूर्य बिंदिया
      -राजीव गोयल
प्रभात बेला
सोंधी गंध रोटी की
हवा में उड़ी
       -राजीव गोयल
जुगलबंदी
-----------
विदाई वेला
कुंडी में फंस गया
पल्लू का छोर
      -सुनीता अग्रवाल
      (श्री जगदीश व्योम के सौजन्य से)
विदाई वेला
होंठ तो हंस रहे
आँखें हैं नम
         -राजीव गोयल
--------------
प्यारी सी बोली
दिल से निकलती
शुभ हो होली
      -पीयूषा
गरीब झुग्गी
ठंडी अंगीठी पर
पकता जुर्म
      राजीव गोयल
तितली व्यस्त
बदल नहीं पाई
होली के वस्त्र
       -संतोष कुमार सिंह
प्रेम करते
ज़माने में ताउम्र
फूल झरते
      -निगम 'राज़'
उसने छुआ
ह्रदय की झील में                  
स्पंदन हुआ
       -राजीव गोयल
ताकती आँखें
शून्य में निहारतीं
कोई आएगा
       -रमेश कुमार सोनी
अक्षर सत्य
बनते बिगड़ते
शब्द जीवन
     -विष्णु प्रिय पाठक
बरसी धूप
तान लिए धरा ने
पेड़ो के छाते
      -राजीव गोयल
भरे घर में
अंत समय देखा
शून्य ही खड़ा
      -तुकाराम खिल्लारे
झड़ते पत्ते
सोये सुख की नींद
धरा की गोद
      -राजीव गोयल
सत्य हो तुम
रचा जग असत्य
छाला गया मैं
      -जितेन्द्र वर्मा
आए न मेघ
किसान ने खेत में
उगाए कर्ज़
    -राजीव गोयल
दौड़ता रहा
मरीचिका के पीछे
छाँव भी नहीं
       - तुकाराम खिल्लारे
पाखराविण
झाड़ उदास झाले
अर्धे वाळले
        (मराठी) तुकाराम खिल्लारे
सूखा है वृक्ष
उदास और खिन्न
पखेरू बिन
        -(हिन्दी अनुवाद)
प्रवेश द्वार
पत्थर के पुतले
झुक के खड़े
       -विष्णु प्रिय पाठक
पत्थर जाने
टूट जाने का दर्द
रेत ही रेत
      -रमेश कुमार सोनी
आकाश मौन
खामोश है धरती
तूफां को सुन
       -प्रियंका वाजपेयी
कर्ण मधुर
झरने के गीत
सृष्टि संगीत
        डा. रंजना वर्मा
पेड़ों से गिरीं
सूख कर पत्तियाँ
फूटी कोंपलें
        -राजीव गोयल
शब्द कविता
लय ओढ़े कामिनी
नाम कविता
          (कविता-दिवस पर)
          -प्रियंका वाजपेयी
वेद पुराण
अधूरी चाहतों के
ये प्रेम पत्र
     -राजीव गोयल
झरता पत्ता
चिताओं के समक्ष
स्तब्ध खडी मैं
      -विभा श्रीवास्तव
सफ़र पर
मिलते कई साथी
तुम सा कौन !
       -मंजूषा मन
सन्नाटा फैला
चुप का बोलबाला
हमारे बीच
         -जितेन्द्र वर्मा
सुलझा चलो
मन की जिद्दी गांठें
चुभें दिल में
        -प्रियंका वाजपेयी
बन के खाद
फिर पहुंचे पत्ते
पेड़ के पास
       -राजीव गोयल
नन्ही सी जान
फंसाए मायाजाल
दुखी गौरैया
         -प्रियंका वाजपेयी
भागती ट्रेन
पकड़ने को चाँद
छूटते पेड़
        -राजीव गोयल
सरोवर पे
बगुलों का समूह
मंच पे नेता
       -विष्णु प्रिय पाठक      
संवारें आज
सुन्दर बने कल
युक्ति अचूक
       -जितेन्द्र वर्मा
उठी वादियाँ
ओढ़ रेशमी धुंध
मुंह अँधेरे
        (हाइगा)--राजीव गोयल
सूखा तालाब
पीटे जाल पे माथा
रोता मछेरा
      -विष्णु प्रिय पाठक
सर्द मौसम
चिता की गर्म राख
सो रहा कुत्ता
       -राजीव गोयल
कुँए तालाब
साझा संस्कृति पाले
तेरे न मेरे
       रमेश कुमार सोनी
झक मारने
तालाब तट बैठे
लोग, बगुले
       -रमेश कुमार सोनी
जुगलबंदी
-----------
नारी जीवन
परती परिकथा
केवल व्यथा
      -डा. रंजना वर्मा
नारी जीवन
रचना का संघर्ष
आशा न व्यथा
         - पीयूषा
-------------
अदाह्य दीप
फैलाए चिंगारियां -
अमा जुगुनू
       -विभा श्रीवास्तव
सूखी पत्तियाँ
कराहतीं दर्द से
कदमों तले
      -राजीव गोयल
साँसों की माला
गिनती के मनके
जपें सोच के
     -प्रियंका वाजपेयी
बूढा दरख़्त
चबूतरे पे खडा
गिने पीढियां
      -प्रियंका वाजपेयी
जो बीत गई
वो बात छूट गई
ना खोज उसे
       -प्रियंका वाजपेयी

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--------------समाप्त ---

शनिवार, 18 मार्च 2017

डा. सुरेन्द्र वर्मा : हाइकु ग्रीष्म ऋतू


ऋतुचक्र  (२)ग्रीष्म
 डा. सुरेन्द्र वर्मा

बढ़ता गुस्सा
पुष्प भी लाल-पीले
गर्मी सी गर्मी

नल / चिड़िया
दोनों ही सूखे कंठ
प्यासे आकंठ

चिड़िया प्यासी
नल के मुंहपर
चोंच मारती

तपे आग में
अमलतास टेसू
उतरे खरे

बेला का फूल
डाली पे हरा-भरा
छूटे ही झरा

मीठे-कड़वे
जीवन अनुभव
पकी निबौली

रजनी गंधा
रात भर महकी
धन्य जीवन

लता बेला की
गोद में फूल लिए
आनंदमयी

पोखर सूखा
आब ही नहीं रही
तला चटका  

सूखी पत्तियाँ
आश्रय तलाशतीं
बुहारी गई

सो गई वो
कब तक जागती
पंखा झलते

छन के आए
चितकबरी धूप
पेड़ छननी

पानी के बिना
तन तरबतर
हलक सूखा

गर्म हवाएं
धरती पे निढाल
हांपता कुत्ता

गुलमोहर
गर्मी में लाल-पीले
अमलतास

भरे चिलम
सूर्य लगाए दम
उगले आग

गर्मी के दिन
तन पे अलाइयां
बो गई धूप

मारे गरमी
नींद न आई रात
तारों के साथ

पेड़ पत्तियाँ
छान रही हैं धूप
थोड़ी राहत

बदलते हैं
कर्बट पे कर्बट
अकुलाहट    

होने को भूरी
वृक्ष तले पसरी
गोरांगी धूप

सूखने न दें
नदी जो भिगोती है
हमारा मन

उठी लपटें
आग लगी वन में
पलाश फूला

कहाँ मिलेगा
घाट घाट है प्यासा
तोड़ प्यास का

लुटा के पानी
प्यास बुझाए  -घट
प्यासा का प्यासा

देखे ऊपर
दरकती धरती
नभ बेदर्दी

पुरवइया
राहत तपन से
तेरा पैगाम !

चैत में जेठ
तपती दोपहरी
सुचेतावनी

कोयल रट
चुप हो गई कुहू
उत्तर न आया

वृक्ष विशाखा
हुआ छाया विहीन
ठूँठ सा खड़ा

चिड़िया प्यासी
कुत्ता पी गया पानी
दर्द कहानी

उफ़! गरमी
संतरे तरबूज
वाह! गरमी !

सूर्य धरा पे
रसातल में पानी
दोनों अतृप्त
   
ताना मारते
खिलखिलाते फूल
गर्मी बेशर्म

सह न पाई
बरसाती नदियाँ
श्राप गरमी का

सूर्य का ताप
सह न पाई धरा
दरक गई

चिड़िया प्यासी
हुआ न गुस्सा शांत
पिपासा मन

आँखों में फांस
तालाब में दरारें
प्यास ही प्यास

पानी गायब
कुँए का तालाब का
सूनी आँख का

कमरे बंद
दोपहर खामोश
सर्वत्र मौन

अतृप्त मन
प्यासा ही लौट गया
गागर खाली

कोई बताए
कहाँ छिपा है जल ?
प्राण पिपासे

शिखर पर
सूरज के तेवर
धरा लाचार
 
कोई भी जल
बुझा नही पाया,ये
अबूझ प्यास

सर पे सूर्य
सिमटी, पैरों  पड़ी
बेचारी छाँव

प्रतीक्षा वर्षा
तपती दोपहर
विरह-अग्नि  

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

फरवरी, २०१७ के श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु

आम्र मंजरी
पीहू पीहू गायन
वसंत दूत
     प्रीति दक्ष
ऋतु वसंत
जीवन का स्पंदन
अभिनन्दन
       डा, रंजना वर्मा
सौंपता नहीं
ऋतुराज को राज
अड़ा शिशिर
       दिनेश चन्द्र पाण्डे
करो इतना
वीना से प्रेम धुन
बरसे हे माँ
       प्रियंका वाजपेयी
ऋतु वसंत
लाया नवजीवन
शरद अंत
      मुकेश वर्मा
वासन्ती  ताव
बढाने को आतुर
प्रेम का भाव
       निगम 'राज़'
रुग्ण तरु का
कर रहे इलाज
वैद्य बसंत
     अभिषेक जैन
वृक्षों को देता
नई नई पोशाक
दानी बसंत
      राजीव गोयल
बसंत जोर
दिग दिगंत शोर
ओर न छोर
       रमेश कुमार सोनी
काफी मनाया
खुली छूट मिली थी
मना नहीं था
      (दो सुखन )-आर के भारद्वाज
टेसू में छिप
चलाए कामदेव
शिव पे तीर
       -राजीव गोयल
मीत के गाँव
इमली मीठी लगे
प्रीत का स्वाद
      रमेश कुमार सोनी
कडुवाहट
जैसे ही मैंने पी ली
ज़िंदगी जी ली
        तुकाराम खिल्लारे
रिश्तों की नाव
विश्वास पतवार
लगाती पार
       राजीव गोयल
पल में टूटी
ये नाज़ुक बड़ी थी
विश्वास डोर
     मंजूषा मन
लड़खड़ाती
गिरती पड़ती है
बेचारी मौत
       जितेन्द्र वर्मा
कितनी पीड़ा
फूटा जैसे ही घड़ा
भूकंप आया
        विष्णु प्रिय पाठक
अच्छी लगे है
तुरशी दोपहर की
बैठते साथ
       जितेन्द्र वर्मा
गलन बढी
कम्बल रजाई से
लगन बढी
     डा. रंजना वर्मा
थू थू कड़वा
मीठा तो लप लप
स्वार्थी मनवा
        विष्णुप्रिय पाठ
प्रेम दिखावा
तोड़े गए गुलाब
बिना सबब
        डा. रंजना वर्मा
जीत का स्वाद
संघर्षों की हांडी में
पके तो मीठा
       रमेश कुमार सोनी
लड़कपन
खट्टा मीठा सरीखा
पागलपन
       विष्णु प्रिय पाठक
फूले गुलाब
हुई नवल भोर
हों पूरे ख़्वाब
        मंजूषा  मन
शहर बसे
तू से आप हो गए
यार पुराने
      दिनेश चन्द्र पाण्डेय
पेट में आग
चूल्हे में तिरता है
आँखों का नीर
       प्रीति दक्ष
मने रोटी डे
बाँटें सब रोटियाँ
बुभुक्षकों को
       डा. रंजना वर्मा
जुगलबंदी (१)
-------------
कागज़ नाव
लिखा एक हाइकु
तैरने लगा
       डा.सुरेन्द्र वर्मा
होती कामना
कागज़ की नाव सी
डूब ही जाती
         डा. रंजना वर्मा
जुगलबंदी (२)
--------------
निराश मन
नमी अभी बाक़ी है
आशा किरण
      डा. सुरेन्द्र वर्मा
आशा निराशा
तैरे कभी डूबती
मन की नाव
       राजीव गोयल
------------------
कंदुक बना
हर ठौर ठोकर
लुढ़के सच
       विष्णु प्रिय पाठक
आँखों की भाषा
मौन से मौन तक
प्यार ही प्यार
       रमेश कुमार सोनी
समय चांटा
चमकता सितारा
धूल में पड़ा
        विभा श्रीवास्तव
रंगीन मंच
सफ़ेद लिबास में
भौंकता कुत्ता
        विष्णु प्रिय पाठक
दबा गुलाब
डायरी के पन्नों में
अब भी ताज़ा
        जितेंद्र वर्मा
अम्मा और बाबा
घर में हैं सबके
काशी और काबा
         अमन चांदपुरी
मौत के साए
भागती है ज़िंदगी
जिए ज़िंदगी
       जितेन्द्र वर्मा
न शोरगुल
न पसरा सन्नाटा
चहकी भोर
       प्रियंका वाजपेयी
आकाश सुर्ख
आदित्य की आहट
लजाती भोर
        प्रियंका वाजपेयी
कर्तव्य किया
क्यूँ अपेक्षा करूं मैं
मुक्त पखेरू
       -तुकाराम खिल्लारे
महकी सासें
तुझे छूकर आया
मंद पवन
       डा. रंजना वर्मा
पत्थर दिल
रहता है शीतल
स्पर्श तो कर
       विष्णु प्रिय पाठक
जुगलबंदी
-----------
संधु  में डूब
करती आत्मह्त्या
थकी नदियाँ
      डा. रंजना वर्मा
पाती सकून
आ सागर बाहों में
थकी नदियाँ
      -राजीव गोयल
-------------
मधुबन हूँ
ज़िंदगी के रंगों से
गुलज़ार हूँ
       -प्रियंका वाजपेयी
नन्ही सी बूंद
हथेली पर गिरी
स्वप्न सी उड़ी
       - कैलाश कल्ला
खुश थी रात
सब उसके पास
चाँद सितारे
         -राजीव गोयल
केलि करतीं
कलियाँ हवा संग
सरसों डोली
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
भौंरों ने छुआ
कली से फूल हुई
स्पर्श का जादू
       -रमेश कुमार सोनी
काट के पेड़
थके लकड़हारे
ढूँढ़ते छाँव
      -राजीव गोयल
होते ही भोर
रसोई में बर्तन
मचाते शोर
       -राजीव गोयल
वर्षा की झड़ी
पत्तों पे सजा गई
मोती की लढी
       -राजीव गोयल
धरा के पैर
दरारें जब पडीं
वर्षा ने भरीं
       -राजीव गोयल
फकीर द्वार
लिए आशा हज़ार
खड़ी कतार
        -राजीव गोयल
वर्षा की बूँदें
करें धरा स्पर्श
सोंधी खुश्बू
      -कैलाश कल्ला
नभ को छोड़
रवि खम्बों पे चढ़ा
गोधूलि बेला
       - राजीव गोयल
वो बाँझ सीपी
एक बूंद स्वाति की
आस में जिए
        -राजीव गोयल
कर न सका
माली ही हिफाज़त
कलियाँ बिकीं
        -राजीव गोयल
हाथ न आता
वक्त बिना पंख के
उड़ता जाता
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
आंधी तू ज़रा
फूल से तितली को
छुडा के दिखा
         -राजीव गोयल
एक उत्सव
रोज़ होता है जैसे
जिओ ज़िंदगी
        -जितेन्द्र वर्मा
छुपाए दर्द
जीता रहता हूँ मैं
दर्द ज़िंदगी
        जितेन्द्र वर्मा
आती बहार
खोल वक्त के द्वार
यादें हज़ार
      -राजीव गोयल
बजाए सीटी
गुज़रे जब हवा
आवारा बांस
       -राजीव गोयल
त्रिदल-बंदी
-----------
मातुल छोड़
उड़ निकली चिड़ी
पराए नीड़
      -विष्णु प्रिय पाठक
भीगा आँचल
वीरान है घोंसला
आँखों में जल
       -डा. रंजना वर्मा
आते ही पंख
उड़ जातेहैं चूजे
यादें रुलाए
       -राजीव गोयल
--------------
जो न मिला
पाया उसे स्वप्न में
स्वप्न का खेल
      -जितेन्द्र वर्मा
मारे कंकर
नदिया की धार में
मुड़ी न रुकी
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
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----------------------------------
समाप्त 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

ऋतु चक्र ४ -सर्दियों के हाइकु : डा सुरेन्द्र वर्मा


शरद-काल
उतारे श्वेत वस्त्र
धारे, चांदनी

हंसता चाँद
शारदीय पूर्णिमा
करे ठिठोली

माह कार्तिक
शीत-उष्ण पवन
सुखद स्पर्श

पुलक उठीं
जूही मधुमालती
स्वागत क्वांर

शरद ऋतु
मल्लिका इतराई
झूमी डगालें

शरद आया
इठलाई शेफाली
मिलनातुर

क्वार-कार्तिक
हंस पडा शरद
चाँद बौराया

नभ निर्मल
झिलमिल चांदनी
शरदोत्सव

शरादोल्लास
हास और परिहास
यौवनाभास

कांसे का गुच्छा
हरसिंगार की माल
शरद दूल्हा

शेफाली वन
पगलाई पवन
मन सुमन

शरद रात
इठलाई चांदनी
करती बात

शरदागम
खिल खिल उठते
वक्ष सुमन

शरदागम
दिन हो गए छोटे
धूप लजाई

हंसता चाँद
शारदीय पूर्णिमा
करे ठिठोली

सर्द रात में
मन में मैदान में
श्वान भूँकते

शिशिरागम
कचनार सुगंध
मंद पवन

हलकी सर्दी
कचनार ने  बाहें
फूलों से ढँकीं

ओस  से भीगा
शिशिर शरारती
भरे बाहों में

गुलदाउदी  
और अमलतास
हेमंत लास्य

टोपी धवल
श्वेत बर्फ की धारे
सजे हेमंत

सर्द रात में
एक अकेली हवा
बजाती सीटी    

शीत नायिका
धूप में खिली खिली
करे श्रृंगार

खामोश रात
झींगुर की आवाज़
मौन तोड़ती

जाड़ों की वर्षा
पूंछ बरसात की
चूहे से बडी

लपेटे रही
कोहरे की चादर
बेचारी धूप

ठंडी हवाएं
वृक्ष के पत्र दल
थरथराए

धता बताता
सर्दी को, रुका नहीं
कुसुमायन

धूप बेचारी
कराहती ही रही
घना कोहरा

कोहरा डरी
धूप अगहन की
लुप्त हो गयी

सर्द आलम
हम हुए मुश्ताक
धूप बेज़ार

सूर्य निस्तेज
सर्द सर्द हवाएं
आतंक राज

आएगी धूप
कबतक टिकेगा
यह कोहरा

कोई बताए
कैसे लाएं सम पे
सर्दी विषम

सर्द हवाएं
फिरें हैं इठलाती
सत्ता बेकाबू

सुर  न सधा
ठण्ड बजती रही
साज बेसुरा

सर्द हवाएं
आसमाँ लगा रोने
आंसू बहाए

सर्दी का रंग
हेमंत अवाक् खड़ा
फींका क्यों पड़ा

डालियाँ काँपीं
असहाय शजर
शीत लहर

धुंध को चीर
जो आर पार देखे
प्रकाश वीर

कोहरा ओढ़े
गले पड़ गई वो
शाल लपेटे

गंगा ने ओढ़ा
कोहरे का कवच
धार रक्षित

धुंध विचित्र
धुंधली कर गई
उजले चित्र

ठण्ड की मारी
धरती ने ओढ़ ली
कमली काली

समर संधि
सर्द,तो कभी गर्म
संक्रांति काल

देख सरदी
नई रजाई ओढ़
मिन्नी दुबकी

कोहरा ओढ़े
सर्दी में जनवरी
सांवरी भई

सरदी मुन्नी
सड़क पे निकली
कोहरा चुन्नी

शरद श्वेत
उरई के पात पे
बूँदें सफ़ेद

कोहरा ढंका
कभी तो बीतेगा ही
उदास दिन

चम्पई भोर
फुनगी पर काग
करता शोर

ओस से भीगा
शिशिर शरारती
भरे बाहों में

सूर्य निस्तेज
सर्द सर्द हवाएं
आतंक राज

आएगी धूप
कबतक टिकेगा
कोहरा रूप ?

सिकुड़ा पडा
मौसम मनहूस
धूप ले डूबा

सर्दी सताए
आसमां लगा रोने
पत्र गवाह

सर्दी न भाई
छिप गई ठण्ड में
बूढी रजाई

डालियाँ कांपी
असहाय शजर
शीत लहर

सर्दी का रंग
हेमंत खडा अवाक   (क हलंत)
फींका क्यों पडा

कैसा मज़ाक
शिशिर तो मुश्ताक
शीत गायब

मक्की के खेत
हरयाली मायावी
कोहरा ढंकी

ऋतु तो वही
मौसम की जुबान
नेता सी पल्टी

सर्द मौसम
ऋतु से छेड़छाड़
मिज़ाज गर्म

हवा बेकाबू
डगमग पतंग
पता न पंथ

शातिर जुबां
तेज़ कातिल हवा
रोके न रुके

है बड़ा दिन
धरती हो कुटुम्भ
बड़ा हो दिल

व्यतीत वर्ष
पुराना, स्वागत हो
नवल वर्ष

वर्ष पुराना
उसी की राख से
नया जनमा

नए वर्ष में
रचें कुछ मौलिक
बड़ा / सार्थक

सर्दी कम हो
तो खुलें हाथ पैर
कुछ काम हो

नया सोच हो
ढर्रा पुराना छूटे
नई दृष्टि हो

खेले सूरज
लुका-छिपी का खेल
असमंजस

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-------------------------------------------------
समाप्त 

सोमवार, 2 जनवरी 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - दिसंबर माह २०१६

१.१२. १६
रात अंधेरी
शिकार पे निकली
डायन सर्दी
      -राजीव गोयल

२ १२ १६
होठों में दबा
वो हंसी का टुकड़ा
ढाए गज़ब
      -राजीव गोयल

३.१२ १६
रात की रानी
महकी रात भर
बनी कहानी
        -राजीव निगम राज
जो काली बिल्ली
काट रही थी रास्ता
दब के मरी
         -राजीव गोयल

४ १२ १६
पथिक संग
चलता रहा रात
चाँद अकेला
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
श्रमिक कथा
आखों से छलकती
उर की व्यथा
       प्रदीप कुमार दाश
तेज़ हवाएं
समुद्र से आ गातीं
विप्लव गीत
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
खेत में गिर
कृषक का पसीना
उगाए सोना
       -राजीव गोयल

५ १२ १६
उम्र पर्यंत
तलाशता ही रहा
बाहर खुदा
      -प्रियंका वाजपेयी
कुचल गए
मोटी किताबों तले
मासूम फूल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
जलता दीप
तन्हाई में गूँजता
खामोश गीत
      -राजीव गोयल
राहें कोहरा
एक एक कदम
खुलती जातीं
         -प्रियंका वाजपेयी

६ १२ १६
चन्दा उड़ेले
मरमरी चांदनी
रात नहाए
        -राजीव गोयल
माँ का आँचल
रजाई से भी भारी
मिटाए सर्दी
         -कैलाश कल्ला
जला अलाव
सभी मिल,बातों का
करें हवन
         -वी पी पाठक

७ १२ १६
फूलों से लदा
बिन पत्तों का पेड़
टेसू का दर्द
      -राजीव गोयल
ये जिंदगानी
अनकही कहानी
नई पुरानी
      -डा. रंजना वर्मा
बातूनी पेड़
बिछड़ी जो पत्तियाँ
हुआ खामोश
      -राजीव गोयल
पहचानिए
रचयिता भीतर
जग रचना
       -जितेन्द्र वर्मा

८ १२ १६
आया शिशिर
हुआ टेसू खामोश
बुझे अंगार
       -राजीव गोयल
हरा के धूप,
आ ही गया कोहरा
कोहराम सा
        -आर के भारद्वाल
षोडशी संध्या
अन्धकार से डरी
सिन्धु में गिरी
         -डा. रंजना वर्मा

९ १२ १६
सूखे गुलाब
गुम हो गई महक
स्मृतियाँ ताज़ी
         -प्रदीप कुमार दाश
अनुभूतियाँ
मन का रत्न कोष
भरती रहीं
        -डा. रंजना वर्मा
बो गए ओले
किसान के खेत में
क़र्ज़ के पौधे
        -राजीव गोयल
ये चदरिया
बुनी नेह धागों से
ओढ़ो सप्रेम
     -मंजूषा मन

१० १२ १६
दो सुखन

जागता रहा
सब जगह खोदा
सोना न मिला
      -आर के भारद्वाज
अनाथ बच्ची
मेरे लिए दौलत
पा-ली है मैंने
      आर के भारद्वाज
सूखे से फटे
बिवाइयों से दुखे
खेतों के पाँव
      -प्रीती दक्ष
गुज़री रात
आया न कोई ख़्वाब
आँखें उदास
     -अमन चांदपुरी
शब्द कटार
करती खामोशी पे
अचूक वार
       -राजीव गोयल

११ १२ १६
ओस के चाटे
नहीं बुझती प्यास
चाहिए जल
       -अमन चाँदपुरी
अंजाना कौन
एक बेमानी प्रश्न
अपना कौन
       -जितेन्द्र वर्मा

१२ १२ १६
प्रात की वेला
करते हरि वंदन
शुक के स्वर
       -डा, रंजना वर्मा
बौराए दिन
सन्न सन्न बहतीं
सर्द हवाएं
      -वी पी पाठक

१३ १२ १६
तूफां के पैर
जम गए धरा पे
उखड़े पैर
       -अभिषेक जैन
उम्र  ने बोई
तजुर्बों की फसल
सहेजूँ कैसे
     -प्रीति दक्ष
वीर पहाड़
पहन हिम वर्दी
अटल खडा
       -राजीव गोयल

१४ १२ १६
गो वत्स स्वर
बाबा की पुकार
माता के लिए
      -डा. रंजना वर्मा
मन बावरा
खंगाले उम्र भर
खोखले रिश्ते
       -प्रियंका वाजपेयी
उग न सका
दगा के कोहरे में
वफ़ा का सूर्य
      -अभिषेक जैन

१५ १२ १६
आसमां चुप
सरसराता  धुंआ
चाँद तनहा
       -प्रियंका वाजपेयी
पत्ते की नाव
हवा खेवनहार
चींटी सवार
      -वी पी पाठक
 
१६ १२ १६
बुढापा बैठा
बाहर धूप सकने
ठंडा जीवन
       -जितेन्द्र वर्मा
कांपते होठ
अनकही कहते
मौन की भाषा
        -डा. रंजना वर्मा
प्रिय की यादें
वर्षा के बुलबुले
फूटे बतासे
       -वी पी पाठक

१७ १२ १६
डूबती नदी
किनारों की चाह में
खूब तड़पी
       -आर के भारद्वाज
डूबा है चाँद
मिलने तेरी याद
चली आई है
       -जितेन्द्र वर्मा

१८ १२ १६
भागी निंदिया
तिजोरी के सोने ने
सोने न दिया
         -अभिषेक जैन
पंख पसार
उड़ते पक्षी संग
मैं उड़ जाऊं
      -अमन चांदपुरी (हाइगा)
हंसता नाती
नानाजी ढूँढ़ रहे
अपनी लाठी
        - दिनेश चन्द्र पांडे

१९ १२ १६
जिया जो कल
बनगया है भूत
आज डराता
     ---जितेन्द्र वर्मा
गज़र गया
छोड़ याद केंचुली
पिछला वर्ष
       -राजीव गोयल

२० १२ १६
सच का सीना
दूभर कर देता
झूठ का जीना
       -आर के भारद्वाज
खुशी के साज
बजें जिन घरों में
स्वर्ग वहीं है    
      -आर के भारद्वाज
बंद किताबें
मज़बून सीने में
दबा के रोईं
     -आर के भारद्वाज
फूल उगते
महकते, टूटते
देते सन्देश
      --मुकेश शर्मा

२१ १२ १६
तापते रहे
प्रपौत्रों के अलाव
बूढ़े नयन
      -प्रियंका वाजपेयी
काश ये मन
न होता नाग जैसा
विश्वासघाती
     -डा. रंजना वर्मा
मन पटल
तन्हाइयों का ब्रश
उकेरे यादें
      -राजीव गोयल
फूल न हुआ
इसी सोच में,,रहा
सूखता काँटा
       आर के भारद्वाज

२२ १२ १६
स्वर्णिम रेखा
सिन्धु उर्मियों पर
स्वप्न सरीखी
       -डा. रंजना वर्मा
तोड़ तपाई
लाल कली लौंग की
फैली सुगंध
     दिनेश चन्द्र पाण्डेय
तुम्हारे लिए
कायनात है पूरी
सोच के भोगो
       -जितेन्द्र वर्मा

२३ १२ १६
खोजे चिड़िया
कटे वन में ठौर
हत्यारा कौन ?
        -रमेश कुमार सोनी बसना
फूलों का दर्द
खुश्बू से भरे , पर
काँटों से घिरे
      -आर के भारद्वाज
बांटता फिरे
चिट्ठियाँ सुगंध की
पवन अश्व
      -राजीव गोयल
हार पे हार
निर्लज्ज है बहुत
फिर तैयार
     -अमन चांदपुरी
गिरा कहर
बनकर कोहरा
थमा शहर
      -राजीव गोयल
सच दीखता
झूठ के बीच जैसे
श्याम में श्वेत
      -जीतेन्द्र वर्मा

२४ १२ १६
नैनों के घन
बरसों हैं बरसे
मन तरसे
      -डा. रंजना वर्मा
पपीहा प्यास
पुकारे दिन रात
पीया न आए
      -विष्णु प्रिय पाठक
जुगल बंदी --

बचा न पाए
आँगन की तुलसी
संध्या दीपक
        -प्रियंका वाजपेयी
जलें न दिए
आजकल घरों में
तुलसी तले
        -राजीव गोयल
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२५ १२ १६
ठण्ड की रातें
अनकही सी बातें
कितनी लम्बी
      -डा. रंजना वर्मा
खेलते रहे
लुका-छिपी का खेल
कोहरा धूप
      -वी पी पाठक
कंडे की आंच
सुलगती रहती
अम्मा तापती
       -जितेन्द्र वर्मा
लता का स्वर
लवंग लतिका की
घुली मिठास
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय

२६ १२ १६
खो गई धूप
ढूँढ़ती रही शीत
हाथ मलती
       -वी पी पाठक
परिंदे लौटे
जी उठा फिर से
सूखा दरख़्त
      -राजीव गोयल

२७ १२ १६
याद आगया
वृद्धाश्रम में माँ को
बेटे का ज़ख्म
     -अभिषेक जैन
रेल खिड़की
मंज़र नजारों का
खुली किताब
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सत्ता चरित्र
हिमपात के वक्त
सूर्य लापता
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मैं और तुम
नदी किनारे खड़े
फिर भी प्यासे
       -आर के भारद्वाज
दो सुखन
(१)   आतंकी मरा
चुभा काँटा निकला
कंटक कटा
       -आर के भारद्वाज
(२)   आंधी में पेड़
मुठभेड़ में गुंडा
ढेर हो गया
        -आर के भारद्वाज
जुगलबंदी -

हिमपात से
प्रसन्न पर्यटक
नव उमंग
       -डा. रंजना वर्मा
आए सैलानी
पहाड़ों ने पहनी
बर्फ़ीली टोपी
      -राजीव गोयल
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आया न चाँद
रोता रहा चकोर
ओस गवाह
       -राजीव गोयल

२८ १२ १६
जोश ढो लाता
भोर रश्मि सारंगा
धुंध मिटाता
       -विभा श्रीवास्तव
गरीब झुग्गी
पक रही है भूख
ठन्डे चूल्हे पे
        -राजीव गोयल
दुःख में सुख
ढूँढ़ता रहता हूँ
ऐसे जीता हूँ
       जितेंद्र वर्मा

३० १२ १६
स्वप्न धवल
ख्यालों-मुंडेरों सजे
वर्ष नवल
     -विभा श्रीवास्तव
धूप-कोहरा
खेलें आंखमिचौली
सखी-सहेली
      -रमेश कुमार सोनी
ठंडी हवाएं
जिस्म में समाकर
रूह जमाएं
       -निगम 'राज़'
बर्फ के फोए
उड़ते हवाओं में
बांधते समां
       -जितेन्द्र वर्मा
मेरे जो लम्हे
बहका लिए तूने
उन्हें लौटा दो
      -आर के भारद्वाज

३१ १२ १६
हटीला बड़ा
प्रकाघ की राह में
कुहासा खडा
     -संतोष कुमार सिंह
बहती जाएं
भावों की नदिया में
शब्दों की नौका
     -राजीव गोयल
झरती रही
रात भर कामिनी
फूलों की सेज
      -डा. रंजना वर्मा
बारह माह
खट्टा मीठा सा स्वाद
गुज़रा साल
     वी. पी .पाठक
राम राम जी
साल का आख़िरी है
दिनमान जी
      -निगम 'राज़'
 सूर्य ने भेजा
किरणों भरा जाल
कोहरा फंसा
       -आर के भारद्वाज

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