रविवार, 7 अगस्त 2016

श्रेष्ठ  हिन्दी हाइकु  -जुलाई १६

२ ७. १६
बंद किवाड़
शिव ने मंदिर में                                                                                                                                             खोले त्रिनेत्र
       -जितेन्द्र वर्मा
३.७.१६
उठ भागता
सुबह से मयूर
मन नाचता
     राजीव निगम राज़
४.७.१६
सूर्य ज्यों ढला
चौपड सजा बैठे
चाँद सितारे
      दिनेश चन्द्र पांडे
५.७.१६
पूरव  दिशा
मिले धरा आकाश
जन्मा सूरज
      -राजीव गोयल
६.७.१६
तुम हो गति
तुम नव-जीवन
हे चित्रभानु
       -डा. अम्बुजा मलखेडकर
फूलों ने रचा
हवा को सुगंध से
नशे में उडी
        -आर के भारद्वाज
दो सुखन

पौधे न  लगे
पत्र भी नहीं लिखे
कलम न थी

छाता टूटा था
संगीत भी रूठा था
तान न थी
     -आर के भारद्वाज
परिदा उड़ा
मुंह बाए घोंसला \                                      
ठगा सा खडा
        -राजीव निगम
७.७.१६
धान के जैसे
रोपी गईं बेटियाँ
नए खेत में
     -दिनेश चन्द्र पांडे
आई है ईद
वृद्धाश्रम  मे मैया
ढूँढे हामिद
      -अभिषेक जैन
 पीड़ा में मोर
जीवन संकट में
सौन्दर्य बला !
       -प्रियंका वाजपेयी
सोंधी महक
घटाएं रिमझिम
धरा हर्षित
        -प्रीति दक्ष
८.७.१६.
गिनती रहीं
दंभ की उंगलियाँ
औरों के ऐब
      -अभिषेक जैन
बारिश हुई                                  
सतरंगी फसल
नभ पे उगी
       -राजीव गोयल

१० .७.१६
धरा पे मेघ
हुए  नतमस्तक
भीगा आँचल
     -प्रियंका वाजपेयी
११.७.१६
मिले जो आप
दिल में खिल गए
कई गुलाब
     -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
१२. ७. १६
उसी ने मारा
पी के जिस हवा को
जिया था दीया
      -राजीव गोयल
१३.७ .१६
कल डूबा था
भूल गया सूरज
फिर उगा है
      -जितेन्द्र वर्मा
हुई बीमार
वर्षा में डूब कर
कच्ची दीवार
     -अभिषेक जैन

१५ ७ १६
बूंद के भाग
सीप में जाके गिरी
मानक बनी
     -राजीव गोयल
१६ ७ १६
उग हर्षाते
मशरूम से स्वप्न
ऋतु  सौगात
    -विभा श्रीवास्तव
टाँके हैं मोती
वृक्ष की पत्तियों पे
सावन दर्जी
     -राजीव गोयल
१७ ७ १६
जानता कौन
स्वाति  का नसीब
धूल या सीप
        -राजीव गोयल
छोड़ पिंजरा
स्त्री गगन में उड़े
तोड़े रूढ़ियाँ
     -विभा श्रीवास्तव
१९.७.१६
अंत नहीं है
सीमाओं के भी परे
नवल पंथ
        -प्रियंका श्रीवास्तव
धरा संवरी
मेघों की काली साड़ी
बूंदों के बूटे
     -विभा श्रीवास्तव
झटके केश
बदली ने जब भी
गिरी फुहार
       -राजीव गोयल

गुरु-पूर्णिमा -

करो स्वीकार
कोटि कोटि प्रणाम
तुम आचार्य
     -'सुवना'
गुरु कुम्हार
कच्ची मिट्टी को देता
रूप आकार
       -राजीव गोयल
२०.७.१६
सृष्टि नाशक
बारूद गंध फैली
श्याम घन से
       -विभा श्रीवास्तव
भू मनुहार
प्रवाह तो निर्वाह
घटा छकाए
      -विभा श्रीवास्तव

२१ ७ १६
मैं लेम्पपोस्ट
उजाला बिखेरता
नतमस्तक    
       -जितेन्द्र वर्मा
गाँव दौड़ते
शहरों की तरफ
खाली चौपालें
       - जितेन्द्र वर्मा
चाँद चकोर
खोए एक-दूजे में
करें किलोल
      (हाइगा ) -राजीव गोयल

२२ ७ १६
बुनती रही
ज़िंदगी  झीनी यादें
जुलाहे जैसी
     -प्रियंका वाजपेयी

२३ ७ १६
हाथ से छूटा
समय का गुब्बारा
फिर ना लौटा
     अभिषेक जैन

२४ ७ १६
मन उदास
दुश्मन से लगे हैं
सगे संबंधी
     -तुकाराम खिल्लारे
टूटा जो दिल
खामोशी से चटका
आवाज़ नहीं
      प्रियंका वाजपेयी
ये हेरा-फेरी
मेघ घुमड़ें यहाँ
बरसें वहां
       - आर के भारद्वाज

ऐक्रोस्टिक
हाइकु विशेष

१, यातना
याद जो आई                            
तकलीफ दे गई
नाहक मुझे
     - राजीव निगम
यादों के कांटे
तमाम रात चुभे
नागफनी से
      -राजीव गोयल
याचक द्वार
तकलीफ में सीता
ना करे कैसे
      -राजीव गोयल  
२, हाइकु
हारी अबला
इंसानी दरिंदों ने
कुचले खाब
       -राजीव गोयल
              

शनिवार, 2 जुलाई 2016

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - जून

१ .६.१६
रद्दी में बिकी
मोती सी हर्फों वाली
मासूम कॉपी
        -प्रियंका वाजपेयी
मन न शांत
कहाँ मिले एकांत
मैं आतंकित
        -'सुवना'
रूखे पहाड़
पांवों में प्यासी नदी
लिपटी  रही
       -दिनेश चंद पांडे
साँसों की तार
दिखाए करतब
ज़िंदगी नटी
     -राजीव गोयल
जद्दोजहद
दो जून ज़रूरत
दीन के जंग
       -विभा श्रीवास्तव

४.६.१६
खुशी के वास्ते
विचारें न शगुन-
अपशगुन
       -राजीव निगम राज़

५.६.१६
काट डालेगा
दरख्तों के संग तू
साँसों की डोर
         -राजीव गोयल
दो सुखन  ---
छत न डली
टूट गई पायल
कड़ी नहीं थी
       - आर के भारद्वाज
दर्द ज्यादा था
नर्स आज ही आई
कल नहीं थी
       -आर के भारद्वाज
६..६.१६
कैसे संभाला
निज अस्तित्व तूने
छोडी क्या छाप
     -प्रियंका वाजपेयी
सीमा नहीं है
आत्मा की उन्नति की
कीजे विस्तार
      -प्रियंका वाजपेयी

७.६.१६
कागजी नाव
बरसात का पानी
बच्चे मल्लाह
    अंकुर उगा
पा धरती का प्यार
दरख़्त बना
      -राजीव गोयल

८.६.१६
तुम्हारी स्मृति
है बन गई मेरी
अदभुत  शक्ति  
        -डा. मुडखेरकर
दिलों में डर
भेदियों ने बनाए
बस्ती में घर
        -संतोष कुमार सिंह

९.६.१६
वट वृक्ष है
बाहें पसारे खडा
पितृ स्वरूप
    जुड़ा रहता
वृद्ध,युवक जटाल
जैसे कुटुम्ब
     -प्रियंका वाजपेयी

१०.६.१६
फूल जो दिया
विदा लेते समय
गंध हरसूँ
     -तुकाराम खिल्लारे

हाइकु जुगलबंदी ---

       जितेन्द्र वर्मा --
मैं मना लूंगा
रूठने से पहले
रूठ के देखो

        आर के भारद्वाज --
वह रूठी है
आज तू मना  ही ले
बाजी पलट

१२.६.१६
लोहे से यारी
लकड़ी की गद्दारी
बनी कुल्हाड़ी
जन्मी जिस शाख से
वो शाख काट डाली
        (ताका रचना)
    - राजीव गोयल
स्वयं की दृष्टि
देखें वही तो दिखे
रस्सी या सांप
       -कैलाश कल्ला
झुर्री में दबी
पर फींकी न पड़ी
माँ की मुस्कान
       -राजीव गोयल

१३.६.१६
जुगलबंदी -
      प्रियंका वाजपेयी -
हाथों में रुके
भीगी, नम हो जब
रेत  ज़िंदगी

      राजीव गोयल -
रिश्तों की रेत
पाके प्यार की नमी
चिपकी रहे
       
खर्च के उम्र
कमा लिया तजुर्बा
नहीं है गम
        -राजीव निगम राज़

१५. ६.१६
जत्न से पढो
ज़िंदगी शब्द नहीं
शब्द-कोश  है
     -आर के भारद्वाज
गीता कुरान
प्रेस में संग छपीं
कभी न लड़ीं
      -आर के भारद्वाज
रोज़ बदलें
हो गए आजकल
लिबास रिश्ते
       -राजीव गोयल

१८.६.१६
ढूँढ़ती फिरूं
आकाश का विस्तार
ओर न छोर
         -प्रियंका वाजपेयी
यादों की शाखें
लचकाए हवाएं
झरें स्मृतियाँ
       -प्रियंका वाजपेयी
छोटे कदम
बड़ी उम्मीद लिए
फासला कम
        -जितेन्द्र वर्मा
नवजाताक्षि
(बच्चे की आँखें)
खोलना व् मूँदना
मेघ में तारे
       -विभा श्रीवास्तव

१९ .६,१६
पितृ दिवस -

पिता का साया
तपते सहरों में
वट की छाया
       -प्रियंका वाजपेयी
घर से दूर
बढ़ा रहे हिम्मत
पिता के ख़त
       -अभिषेक जैन
बालक पंख
पिता देते आकाश
उड़ान भर
      -प्रीति दक्ष
पिता के जूते
पहने जो सुपुत्र
बड़ा हो गया
     -जितेन्द्र वर्मा

२०.६.१६
हाथ उठाए
बेटा जब माँ पर
दूध लजाए
      -राजीव गोयल

२१.६.१६
खुशी की बाढ़
बरसाती पानी में
कागजी नाव
      -राजीव गोयल
बचपन में
हमारे भी चले थे
पोत जल में
      -दिनेश चन्द्र पांडे

२४ . ६ १६
संभाल रखा
सुख दुख का धन
खजांची मन
     -अभिषेक जैन
रहस्य रही
जीवन की परिधि
क्या उस पार
        -प्रियंका वाजपेयी

२६ ६. १६
दौड़ लगाता
धावक नन्हा क्षेत्र
रक्तिम लिली
      -विभाश्रीवास्तव
सूरज डूबा
देह पर ओढ़ ली
रात की शाल
       -तुकाराम बिल्लारे
खूँटी टंगे हैं
मेरे प्यारे उसूल
भूला ओढ़ना
         -जितेन्द्र वर्मा

२९.६.१६    
खिली सांवली
रिमझिम मौसम
तृप्त नयन
       पीयूषा
बूंदों ने रचे
धरा के पृष्ठ पर
हर्ष के गीत
     -अभिषेक जैन
खो गया कुछ
शायद वो वजूद
जो कभी मैं था
      -जितेन्द्र वर्मा

३०.६.१६
ह्रदय के द्वार
स्मृतियों की कोठरी
आशा के दीप
        -प्रियंका वाजपेयी
गीत होठों पे
संगीत आसपास
आपका साथ
        -तुकाराम खिल्लारे
उजाड़ दुर्ग
मकडी के जालों ने
सम्भाला राज
         -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
भीगी चिड़िया
स्थगित है उड़ान
कांपती रही
        -प्रीति दक्ष

मंगलवार, 31 मई 2016

मई माह के हाइकु

०१.०५.१६
श्रम अर्जित
स्वेद से सनी हुई
उसकी रोटी
---
ताके महल
यही मेरा था कल
अर्जन स्थल
        -महिमा वर्मा
मुस्कराहटें
बाँट कर देखिए
लुत्फे-ज़िंदगी
----
आज़माइशें
निभा कर देखिए
नूरे-बंदगी
       -प्रियंका वाजपेयी

२.५.१६
बुन रही माँ
सरदी में गरमी
सलाइयों पे
    ---
एक शाख पे
रहते हैं प्यार से
फूल व शूल
       -राजीव गोयल
पवित्रों को भी
अपवित्रों को भी है
तभी गंगा माँ
       -प्रीति दक्ष

३.५.१६
ज्योति की संगी
लम्बी कभी वो छोटी
तम में गुम
       (हाइकु पहेली)
      -विभा श्रीवास्तव्
सांझ सवेरे
लोहित नभ धरा
उबाल  मारे
      -विभा श्रीवास्तव
पी रही रात
चाँद के सकोरे में
चांदनी जाम
       -राजीव गोयल
स्मृति विशेष
प्यार की हलचल
ताज महल
       -राजीव निगम 'राज़'

४.५.१६
ज़िंदगी दे दी
छोडी नहीं कसर
तो भी शिकवा
       -प्रियंका वाजपेयी
दी है सुपारी
अँधेरे ने आंधी को
लू बुझाने की
       -राजीव गोयल
अविकसित
नि:सहाय शरीर
कामुक हावी
       - डा. अम्बुजा
चाँद को देख
उछलती लहरें
अमा को शांत
       कैलाश कल्ला

५.५.१६
बना देते हैं
ये जादूगर पत्ते
धूप को छाँव
       -संतोष कुमार सिंह
जो फूल हँसे
बनकर हार वे
प्रभु को चढ़े
        -आर के भारद्वाज
कुतर देते
जात पांत के चूहे
दिलों के तार
       -अभिषेक जैन
ओलों की गोली
बादलों ने चलाई
फसलें ढेर
        -राजीव गोयल

८.५. १६
मात-दिवस

माँ अनमोल
साथी जीवन भर
माता के बोल
       -ममता वर्मा
कर लो शोध
स्वर्ग से भी सुन्दर
है माँ की गोद
       -संतोष कुमार सिंह
उजियारा था
दीपक बनकर
थी जलती  माँ
       -प्रियंका वाजपेयी
जा नहीं सका
खुदा हर घर में
तो माँ भेज दी
       -राजीव गोयल
माँ का आशीष
मंगल का प्रतीक
ओम, स्वस्तिक
        -अभिषेक जैन
अम्मा आकर
सपने में हमारे
हँसे दुलारे
        -राजीव निगम 'राज़'
एक ख्याल-सा
माँ का अहसास
भूलता नहीं
       -जितेन्द्र वर्मा
अंजुरी भर
प्रेम के बराबर
नहीं सागर
        तुकाराम खिल्लोरे

९.५.१६
महाराणा प्रताप जयंती

अन्याय हटे
भले कष्ट में खाएं
घास की रोटी
        -पीयूषा
रण किससे ?
सब अपने ही हैं
भलाई करें
      -पीयूषा

१०.५.१६
पिता का खेत
माँ के लुटे गहने
शिक्षा डकैत
        -अभिषेक जैन
अब भी दम
अन्धेरा करे ख़त्म
बूढा सूरज
        -राजीव गोयल

१२.५.१६
सागर तत्व
लहरों में निहित
अतुल्य बल
       प्रियंका वाजपेयी
मनुष्य तेरी
मूलभूत क्षमता
अनंत खोज
        -प्रियंका वाजपेयी
पलाश झड़ा
धरती के पांवों में
रचा आलता
       -राजीव गोयल
बढ़ती गई
हर पल ये उम्र
घटती गई
      -राजीव गोयल
सोचता रहा
किया तो कुछ नहीं
अकर्मण्यता
       -जितेन्द्र वर्मा

१३.५.१६
सींचती रही
यादों का उपवन
नैनों की गंगा
         -संतोष कुमार सिंह
नभ से झांका
खोल मेघ कपाट
चाँद सलोना
       -राजीव गोयल
भरे पड़े हैं
सेठ के गोदाम में
अहं के बोरे
        -अभिषेक जैन

१४ ५. १६
ताप व् शीत
जीवन संतुलित
सूरज चाँद
      (हाइगा)- विभा श्रीवास्तव
वक्त के साथ
ढल रहा है भानु
हंसता चाँद
       -कैलाश कल्ला

१५.५.१६
झाडू से डर
घुस गई कोने में
निर्बल धूप
        -अभिषेक जैन
आंधी से डर
छुपे अनाथ पत्ते
मेरे आँगन
       -राजीव गोयल
moon walks
in the mids of clouds
appears disappears
          -Jitendra Varma

16.5.16
सन्नाटा फैला
क्या मौत के डर से
ज़िंदगी बाक़ी
         -पीयूषा

१७.५.१६
ज़िंदगी मेरी
हँसाए व् रुलाए
शरीर ऐसी
       -राजीव निगम राज़
रिश्ता जलाता
धूम्रपान करता
शक का कीड़ा
         -विभा श्रीवास्तव
बरसी नहीं
इस साल बदरी
कुंठित नदी
         -राजीव गोयल

१८.५.१६
है सच्चा मित्र
सीप में बंद मोती
रखो सम्हाल
       -पुष्प लता शर्मा
डर लगता
सांप का फन, और
विष रहित !
       -जितेन्द्र वर्मा
फूलों को घेर
नाच रहीं पत्तियाँ
दूल्हे के मित्र
        -कैलाश कल्ला

१९,५.१६
पैसे की भूख
चखने नहीं देती
रिश्तों का स्वाद
        -राजीव गोयल
जीवन नाव
चलती उधर ही
सोच की पाल
       -कैलाश कल्ला


२०.५.१६
छनती धूप
नदिया झिलमिल
बिखरे मोती
       -प्रियंका वाज्पेशी
ले रही रात
भोर के उजाले में
आखिरी सांस
        -राजीव गोयल
सिर पटक
साहिल पे लहरें
देती जान
         -राजीव गोयल

२१.५.१६
उजालों भरी
रहती अमावस
संग बिटिया
       -प्रियंका वाजपेयी

२२.५.१६
उबल रहा
लोहित नभ धरा
सांझ सवेरे
    विभा श्रीवास्तव
शान से खिला
सूरज को चिढाता
अमलतास
        -दिनेश चन्द्र पांडेय
रवि बंजारा
धर ताप टोकरी
फिरे घूमता
        -महिमा वर्मा
पियारा गए
गरमी के ताप से
अमलतास
        -राजीव निगम राज़
धर्म की हानि
भयभीत जगत
आओ माधव
        -प्रियंका वाजपेयी

२३.५.१६
विषैले बोल
धन्वा से छूटा बाण
कभी न लौटे
     
प्रीत की डोरी
यहाँ बंधी, वहां भी
छूटती नहीं
        -प्रियंका वाजपेयी

२४.५.१६
अन्धेरा घना
खूब दिए जलाओ
नहीं है मना
        -आरके भारद्वाज
कभी था हुस्न
झुर्रियां हुईं तो क्या
उम्र का जश्न
      -आर के भारद्वाज

२५ ५ १६
ज़मीन से उठा
झोंके आँखों में धूल
शैतान हवा
      -अभिषेक जैन
हवा विमान
बैठ गए पल्लव
भरें उड़ान
       अभिषेक जैन
बिखेर गए
धरा पे काली स्याही
रात के साए
        -राजीव गोयल

२६.५.१
मकड़ जाल
ख्यालों की दीवार पे
बुने है कवि
         -अभिषेक जैन
वक्त उदास
गर्मी प्रचंड हुई
प्यास भी प्यासी
           -आर के भारद्वाज

(हाइकु-जुगलबंदी)
     कैलाश कल्ला ---
ताज को देख
करते सब वाह
है दरगाह !
     प्रियंका वाजपेयी ---
कब्र ही सही
प्यार की दास्तान को
संजोये ताज !

२७.५.१६
(हाइकु जुबलबंदी)
      जितेन्द्र वर्मा ---
भारी हो मन
बोझिल हो जीवन
निकले आंसू
      प्रियंका वाजपेयी ----
कह न  सके
कसक पले अंत:
ढुलके आंसू

(हाइकु जुगलबंदी)
       राजीव गोयल ---
पिघला दिन
ग़मों की गरमी से
बहते आंसू
        आर के भारद्वाज ---
तुम्हारी कथा
लिए मन में व्यथा
आंसू ने सुनी

तन तम्बूरा
साँसों की सरगम
बजाए आत्मा
       -प्रीती दक्ष

२८.५.१६
फींके हैं साज़
पहली किलकारी
झूमता मन
       -कैलाश कल्ला
फिसल गए
उम्र की सीढियों से
साँसों के पैर
      -अभिषेक जैन
थका पथिक
ठंडी छाँव सोया
वृक्ष हर्षाया
        -आर के भारद्वाज
फंसी मछली
तालाब भरे आह
मछेरा वाह
        -संतोष कुमार सिंह
स्त्री का नर्तन
देख व्यस्त जीवन
जी भर आए
        -राजीव निगम राज़

२९.५.१६
दिए  खदेड़
रंगदार धूप को
जांबाज़ पेड़
    अभिषेक जैन

(हाइकु जुगलबंदी)
      राजीव गोयल ----
घोल चाय में
सुबह का पेपर
पीता हूँ रोज़
       रालीव निगम राज़ ---
खबरें पीना
चाय की चुस्की संग
जीवन रंग

३०.५.१६
सांवली हवा
झुलसी जूही बेला
जेठ महीना
       -विभा श्रीवास्तव
दीमक बसे
किताबों के घर में
शब्द बेघर
        -राजीव गोयल
leading me
your foot print
even today
         Rajiv Goyal








शनिवार, 30 अप्रैल 2016

(4) अप्रैल माह के हाइकु

हँसा के हँस
मूर्ख बन के रह
मज़े में बस
       -राजीव निगम राज
पत्थर दिल
संकीर्ण हुई सोच
बढ़ा विज्ञान
        -कैलाश कल्ला
जल में ज़िंदा
बाहर मरे  मीन
पर्दानशीन
       -आरके भारद्वाज

२.४.१६
चढ़ न सका
सफलता की सीढी
लंगडा धैर्य
    -अभिषेक जैन
मापें सुकून
बीते द्वंद्व  से नहीं
मन तृप्ति से
       -प्रियंका वाजपेयी
पारदर्शी हों
शीशे सा साफ़ दिखें
कहे आईना
       -आर के भारद्वाज
बोलता फूल
प्रभु मैं हूँ आपकी
चरण-धूल
        आर के भारद्वाज

३.४.१६

गिरी बरखा
बजा जलतरंग
मेरे आँगन
       -राजीव गोयल
बुने जो गीत
दर्द की सलाई से
गाता ही रहा
       -जितेन्द्र वर्मा
जीवन यात्रा
थक कर मनुज
सोए कब्र में
       -अमन चाँदपुरी

४.४.१६
आँखों में तेरे
लुका छिपी खेलती
मानस मीणा
        -प्रियंका वाजपेयी
खो गई आत्मा
रह गया शरीर
बिके बाज़ार
      -जितेन्द्र वर्मा
खींची दीवारें
बंटता गया घर
बची दीवारें
     -कैलाश कल्ला
गंगाजल सी
बेटी मोक्ष-दायिनी
शक्ति स्वरूपा
       -प्रीति दक्ष
काली रात है
सूरज सो गया है
चाँद डटा है
      -अमन चांदपुरी

५.४.१६
पूनो का चाँद
उतरती नभ से
चांदनी रात
       -राजीव गोयल
दर्द है बना
मलहम दर्द का
दर्द है दवा
      -जितेन्द्र वर्मा

६.४.१६
दिया तो जला
अन्धकार न मिटा
मन था बुझा
        -प्रियंका वाजपेयी
हरा न पाईं
सांसारिक इच्छाएं
सन्यासी मन
       -राजीव गोयल
देह का अंत
ख़त्म हुए अध्याय
पुस्तक बंद
       -अभिषेक जैन
फटी बिवाई
लगाओ वर्षा लेप
धरा के पैर
       -राजीव गोयल

७.४.१६
जी ले ज़िंदगी
नहीं मिले दोबारा
खुशी ज़िंदगी
        -जितेन्द्र वर्मा
पलटा नहीं
पुकारती रही माँ
कैसा चिराग ?
       -प्रियंका वाजपेयी
चाँद कलश
छलकती चांदनी
नहाती रात
      -राजीव गोयल
पूनों को देख
लहरों में खो गया
प्रेमी समुद्र
      -कैलाश कल्ला

८.४.१६
भुगते सज़ा
दूसरों के पापों की
मासूम धरा
      -राजीव गोयल

९.४.१६
दिखती साफ़
बुज़ुर्ग चेहरों पे
वक्त की छाप
        (हाइगा)-राजीव गोयल
कई नाटक
एक साथ देखिए
मंच ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा
लू के हंटर
रवि ने बरसाए
तड़पी धरा
       -राजीव गोयल
नयनों में आस
अन्तरंग में पीर
बूढा शरीर
         -अभिषेक जैन
जाल में फंस
लूटा छटपटाए
जिना कब्ज़े स्त्री
          -विभा श्रीवास्तव
स्याही के संग
भीग गए मधुर
प्रेम के रंग
         -डा, अम्बुजा मलखेडकर

१०.४.१६
छोड़ घोंसला
किधर गया पंछी
पूंछती पत्ती
       -राजीव गोयल
in the name of God
roaming godman
delivering sermons of lust
        -Jitendra Varma

11.4.16
क्यों न पाया
सब पा के सुकून
कुछ तो खोया
        -प्रियंका वाजपेयी
काम गलत
पत्र नहीं पहुंचा
पता नहीं था
        --
मन दुखी है
साईकिल न चली
चैन नहीं है
       -दो-सुखन
       -आर के भारद्वाज

१२'४.१६
कटते पेड़
बनी बहुमंजिले
पंछी बेघर
      कैलाश कल्ला
काटता हूँ मैं
हाइकु की फसल
उगा के शब्द
       -राजीव गोयल

१३.४.१६
उच्च संस्कार
किसने पाया आज
जो हो उद्धार
     -अम्बुजा 'सुवना''
भीषण गर्मी
पेड़ सहते रहे
देने को छाँव  
       -जितेंद्र वर्मा
भोर होते ही
हथगोला उठाए
सूर्य घूमता
      -आर के भारद्वाज
पानी न खिंचा
पतंग भी न उडी
डोर नहीं थी
        (दो सुखन) आरके भारद्वाज
सूर्य शीश पे
छाया भी मांगे छाया
उफ़ ये घाम !
      -प्रियंका वाजपेयी
लिखे सूरज
किरण कलम से
भोर के गान
      -राजीव गोयल

१४.४.२०१६
टंगे ज्यूं तारे
महमहाता बेला
गुंथे त्यूं वेणी
      -विभा श्रीवास्तव
निर्जन वन
भटकते जुगुनू
शापित यक्ष
       -प्रीति दक्ष

१५ ४. १६
बना है वृक्ष
छाँव की धर्मशाला
रुका पथिक
     -अभिषेक जैन `````````````
झील दिखाए
चमकते चाँद  को
पानी हिलाए
      -राजीव निगम 'राज़'
स्मार्ट शहर
बहु स्मार्ट  मकान
घर हैं कहाँ ?
      -जितेन्द्र वर्मा

१६.४.१६
बुनता रहा
साँसों का ताना बाना
झीना अस्तित्व
        -प्रियंका वाजपेयी
इंसा डंसता
इकदूजे को अब
सांप हंसता
         -राजीव निगम 'राज़'
रो भी न सका
देख पंछी का दर्द
ये सूखा नल
      (हाईका) -राजीव गोयल
स्वयं ही प्यासा
तुम्हें कैसे पिलाऊँ
मैं घनरस
       -डा. अम्बुजा  'सुवना'
चुल्बुलों को
बैठाकर पढ़ाती
हमारी शिक्षा
      -पीयूषा

१७.४.१६
सरसों फूली
नशे में धुत झूली
पेर दी गई
       -आर के भारद्वाज
सोना न चाहूँ
सब कुछ ले लो
बस सोने दो
      कैलाश कल्ला
प्यासा बहुत
तालों कुओं का जल
पी गया सूर्य
       -संतोष कुमार सिंह
काम मशीनी
क्यों करता आदमी
होता बेमानी
        -पीयूषा
भीतर आओ
अलख जगाकर
झांको खुद में
       -प्रियंका वाजपेयी

 १८.४.१६
आया चुगने
सूरज राजहंस
ओस के मोती
        -राजीव गोयल
फर्श पे लेटे
वे सुन रहे गीता
गौ-धूली वेला
      -कैलाश कल्ला
चिड़िया प्यासी
मुंडेर पर जल
मांगे तुमसे
      (हाइगा)-प्रीति दक्ष
बिना तपे ही
बारिश व् बहारें
मिलती नहीं
       -पीयूषा

१९.४.१६
दर्द का दर्द
जब देखा न गया
लगाया गले
     -राजीव गोयल
पिघल जाती
समय की धूप से
दुखों की बर्फ
      -संतोष कुमार सिंह
तपे  धूप में
यह दरख्त घने
छातों से तने
       -राजीव गोयल
अलगाव से
बदरंग जीवन
तुम अंजान
      -अम्बूजा "सुवना"
त्रास मिटाए
रेत से स्व झुलसे
मीठा लालमी
       -विभा श्रीवास्तव
समुद्र तपे
बरसात के लिए
आंसू टपकें
       -पीयूषा

२०.४.१६
ढूँढ़ते ठाँव
झुरमुटी डगर
छिलते पाँव
    -विभा श्रीवास्तव
धूप में तेज़ी
पेड़ पसारे हाथ
करने छाँव
      -कैलाश कल्ला
बुद्ध शरण
समंदर सुख का
प्रश्न त्याग का
      -तुकाराम खिल्लारे
कंक्रीट वन
बिजली के तार ही
पंछी के घर
      -राजीव गोयल (हाइगा)
listen carefully
your soul whispers
body doesn't
       -jitendra varma

२१.४ १६
मन अंगना
वक्त की खूँटी पर
टंगी हैं यादें
      -राजीव गोयल
स्वार्थ रचित
हर दृष्टि बाधित
सृष्टि कुंठित
       -राजीव "राज़"
कोने में बस्ता
खिलौने आसपास
ग्रीष्मावकाश
      -अभिषेक जैन

२२. ४. १६
हे बलशाली
कमज़ोर को देना
तुम पौरुष
      -अम्बूजा
कूदी लहर
गिरी मुंह के बल
मिला न चाँद
       -राजीव गोयल

२३.४.१६
सड़कें चौड़ी
दिल हुए तंग
ईश्वर दंग
     -संतोष कुमार सिंह
कोई तो रोता
मेरी बर्बादी पर
मेरा होकर
      -राजीव निगम 'राज'
बाजे पायल
रोता हुआ नैपत्थ्य
हाय ज़िंदगी
      -जितेन्द्र वर्मा
माँल में जूते
सड़क पर किताबें
संस्कृति बिकी
      - आर के भारद्वाज
हाँक ले गया
पवन चरवाह
मेघ रेवड़
      -राजीव गोयल
मिट्टी जमाने
नेता पानी छिड़के
जन तो प्यासा
      कैलाश कल्ला

२४.४.१६
भू पे दरारें
पके चूहे की गंध
फिजा में फैली
   
भू पे दरारें
बिवाई सहलाते
स्व हाथ काँपे

भू पे दरारें
बयाँ न कर पाऊँ
तन तपन
      -विभा श्रीवास्तव

पढो किताब
मर रहे हैं शब्द
लेने दो सांस
      - राजीव गोयल
कई सवाल
उत्तर बस  एक
मानव धर्म
     -जितेन्द्र वर्मा

२५. ४. १६
कभी सुनिए
झकझोरे अंत: को
मौन की गूँज
     -प्रियंका वाजपेयी
धार्मिक स्थल
या पिकनिक स्पाट
भेद मुश्किल
      कैलाश  कल्ला
माँ आँखें लाल
स्नेही कान पकडे
धमाल लाल
       -विभा श्रीवास्तव
अजन्मे भ्रूण
सूखे ने मार दिए
धरा गर्भ में
      -राजीव गोयल

२६.४.१६
रहे हैं झेल
सश्रम कारावास
खेतों में बैल
       -अभिषेक जैन
शादी अधूरी
भोज भी अधूरा ही
भात नहीं था
     -आर की भारद्वाज (दो सुखन)
मृत्यु के बाद
साया, न रहे पास
बहा दे राख
      कैलाश कल्ला

२७.४.१६
तुलसी पौधा
कद-काठी में छोटा
ऊंचा ओहदा
      -अभिषेक जैन
हुई बावरी
सागर की बाहों में
सिमटी गंगा
       -प्रीती दक्ष
दूजी दुनिया
अनजाना पथ है
धुंध के पार
       -प्रियंका वाजपेयी

२८.४.१६
नहीं हो सके
बिना मनुष्य देह
देव भी मुक्त
       -प्रियंका वाजपेयी
प्रभात वेला
सूरज चरवाहा
काम पे चला
       -हाइगा, राजीव गोयल
गो-धूलि  काल
साया से बौना  इंसा
वक्त की बात
       -कैलाश कल्ला

२९.४.१६
तपता सूर्य
सोखता पृथ्वी जल
मनु विकल
      -राजीव निगम 'राज़'
बिछड़ गया
कोई बहुत ख़ास
मन उदास
       -अमन चाँदपुरी
चूनर ओढ़े
दुल्हन का चेहरा
साए में धूप
      -अमन चाँदपुरी
शब्द अर्पण
मन हुआ दर्पण
नया सृजन
       -अमन चांदपुरी
जीने की आस
जबतक है श्वास
मिटे न प्यास
        -कैलाश कल्ला

३०.४.१६
कहीं दूर से
आती है आहट
उम्मीद लिए
      -प्रियंका वाजपेयी
उठा के लाई
ढेर सारे विवाद
खर्चीली जुबां
      -अभिषेक जैन

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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

ऋतु चक्र  (१)वसंत और पतझड़
डा. सुरेन्द्र वर्मा

फूलों से ढंके
कुछ हुए निर्वस्त्र
वृक्ष वासंती

जगाए दर्द
करे कनबतियां
हवा फागुनी

वासंती हंसी
दिन कमल और                                                                                                                                           रात वेला सी

टूटे बंधन
टूटी नहीं प्रतीक्षा
माह फागुन

तुम्हारा आना
दो पल रुक जाना
दो दो वसंत

ढोल मंजीरे
कोयल बुलबुल
स्वागत फाग

हंसती रही
माधवी दिन-रात
माधो वसंत

फगुनहट
दखिनैया बयार
अकुलाहट

फूले पलाश
कोयल बोले बैन          
चैत उत्पाती

अंग प्रत्यंग
मची झुरझुरी सी
कोयल बोली

खेत गेंदे का
उठाता है लहरें
पीली सुगंध

पहने साड़ी
सरसों खेत खडी
ऋतु वासंती

आम्र-मंजरी                            
आमोदित  वसंत
प्रतीक्षारत

रंगबिरंगा
बिछा हुआ कालीन
हरित धरती

अकथनीय
अक्षर हलंत सी
कथा वसंत
  
झड़  रहे हैं
पत्र पतझड़ में
टिक सकोगे ?

जीर्ण पत्र था
हलके से झोंके में
टूटा  बेबस

वृक्ष पे बचा
एक ही पत्र शेष
एकांत भोग

वसंतोत्सव
लहराते दुपट्टे
पीली सरसों

डीठ कामना
क्षण भर बहकी
तितली उडी

पीयरे खेत
ज़र्द पड़ गया सूर्य
आभा वसंत

झरते पत्र
करता अगवानी
फूल केक्टस

पतझर है
आहट वसंत की
क्यों उदास हो ?

पर्व मिलन
प्रिया लगाए आस
फागुन मास

चुप थी घाटी
जाग गई सहसा
चिड़िया बोली

सूखी पत्तियाँ
आश्रय तलाशतीं
बुहारी गईं

अपशगुनी
बैठा है सूखी डाल
काक अकेला

गिरते पत्र
निरुपाय सा वृक्ष
खड़ा देखता

जीर्ण पत्र को                                                            
बन जाने दो खाद
मूल्यवान वो  

डालियों पर
झांकते पत्ते नए
टूटते  सूखे

फूल से तोते
बाहों पर झूलते
शाख सेंमल

उड़ी लपटें
आग लगी जंगल
पलाश फूला

हर्षा अशोक
करती जो नर्तकी
पद प्रहार

ऋतु राजन
स्वागत है आपका
आएं पधारें

अनंग राज
नए पात पुष्पों से
राज तिलक

वसंत वात
रंग स्पर्श मधुर
आनंद राग

उम्र दराज़
एक एक पत्ते को
झड़ते देखा

 फूला पलाश
अम्बवा बौरा गया
फैली सुवास

सकल वन
फूल रही सरसों
सघन वन

अकेला पत्र
अटका है डाल पे
राह देखता

जलाते नहीं
दहकते पलाश
रंग भरते

फूली सरसों
रंग गई नारंगी
गेंदा बौराया

फूलों की सेज
पक्षियों का संगीत
रीझा वसंत

आया वसंत
चाँद हंसा,सूरज
मुसकराया

गूँजा आँगन
बड़े दिनों के बाद
बोली गौरैया  

सोया था सूर्य
उठा इठलाता सा
प्रात वसंत

तुम क्या आए
मिटे मैल मन के
गायब शिकवे

झड़ते देखा
एक एक पत्ते को
तो फूल खिले

डाली पलाश
रक्ताभ हुई, आया
वसंत राज

रुठी थी कली
वासंती सुगंध से
भरी तो खिली

वसंत आया
कोई न जान पाया
देखा सबने

चोरी से छुआ
आया वो दबे पाँव
पाजी वसंत

कोयल बोली
मौन हो गईं मानो
सभी दिशाएं

मुनि संतों का
मौन हुआ वाचाल
कोयल बोली

कोयल बोली
कनुप्रिया की भरी
रीती सी झोली

सन्नाटा कुछ                                    
और हुआ गहरा
कोयल बोली

साजन मेरा
कहाँ ढूँढूँ गुलाब
गेंदा ही सही

मारो ना, करे
करेजवा  पे चोट
रसिक गेंदा

चटक पीला
गेंदा फूल साजन
महके मन

न कोई नाज़
न ही कोई नखरा
गेंदा सबका

गेंदा सा गेंदा
लदा पडा खेत में
पी रंग पीला

गेदे की माल
गेंदा बंदनवार
सर्व-स्वीकार

रंग ही रंग
मेरे चारों तरफ
होली के रंग

तन भिगोते
सराबोर करते
मन के रंग

उसके रंग
न छूटे न छुटाए
चटक रंग

गोरी के गाल
गोरा हुआ गुलाल
डोरा आँखों का

अमृत जल
सदा रहे बहता
बहाओ मत

दिन होली का
बंधी तन-मन की
गाँठ खोल दो

त्याग अहं को
होली के दिन चार
खेलो, हँस लो

सूखने न दें
नदी जो भिगोती है
हमारा मन

कुछ तरल
सरिता की भाँति है
मन भीतर

मूर्ख बुलाता
मुझे मार, आ बैल
एक अप्रैल

तर्क वक्रता
तर्क करती रिश्ते
भली मूर्खता

मैं चौंक गया
खटका दरवाज़ा
वासंती हवा

खड़ी सामने
होली तेरे द्वार पे
सामने तो आ

एक चुम्बन
बसंत के गालों पे
गुल-मुहर

झूमने लगीं
गेहूँ की बालियाँ
हवा निहाल

पकी फसल
बालियों से झांकते
रोशन दाने

झूम के आया
आँगन में बसंत
राहग गुलाल

झांझ मंजीरे
होली का हुड़दंग
मन मलंग

तीन सखियाँ
जूही चम्पा चमेली
तनहा गुलाब

घुली जो श्वास
कान्हा की मुरली में
फूटा संगीत

राधा रानी ने
मारी जो पिचकारी
रूठे कन्हाई

रंग बरसे
ज्यों पलाश दहके
दिन फागुन

गीतों में बसा
बस, प्यार ही प्यार
मीठी बयार

तन मन से
आरोह अवरोह
स्वास फागुनी

प्रसन्न मन
तोड़े रति-बंधन सब
कान्हा की वंशी

फूलों के द्वारे
मंडराते भंवरे सब
कली शरमाई

होली में झूमें
महुआ कचनार
बौरी बयार

धरे न धीर
कूक कोयलिया की
जगाती पीर

रंगों रे रंग
केसरिया सुगंध
कहाँ हो कन्त

महका बौर
चू पड़ा महुआ
रंग गुलाल

नूतन हेतु
टहनी से उतरे
बुज़ुर्ग पात

कोई न रोया
आंसुओं से टपके
निराश पत्ते

पवन संग
झर झर नाचते
गिरते पत्ते












 

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - (३) मार्च माह के हाइकु

१ '३.१६
गुस्सा लहर
घाट  से टकराए
शांत हो जाए
      -कैलाश कल्ला
प्यार के पंछी
तू- तू मैं-मैं करते
एक ही हुए
     -तुकाराम खिल्लारे
कल थे चूजे
आज पंख क्या आए
उड़ ही गए
     कैलाश कल्ला
संजो रखे  हैं
इंच इंच सपने
आस मंजूषा
     -विभा रानी श्रीवास्तव

२.३.१६
खोती  जा रही
कागज़ व् स्याही
सोंधी महक
      -प्रियंका वाजपेयी
सत्य का सूर्य
छुपा नहीं सकते
झूठ का (के) घन
     -संतोष कुमार सिंह
(पिछले माह 'झूठ का घन' की जगह
'झूठ का सूर्य' प्रकाशित हो गया था
जो त्रुटि पूर्ण था|)

दादी के संग
लिपट रहे बच्चे
बेल पे फूल
     -आर के भारद्वाज
तितली बोली
लौटी हूँ खेल कर
रंगों की होली
     -संतोष कुमार सिंह
आत्म मिलन
बूंद हुई सागर
अस्तित्व खोयी (खोया?)
      -कन्हैया
सांप सच्चाई
सीढी चापलूसी   की
कैसा ये खेल
      -जितेन्द्र वर्मा

३.१.१६
क्रोधित रवि
बरसाए धरा पे
धूप के कोड़े
      -राजीव गोयल
झूमें कलियाँ
सुन भौंरा गुंजन
राग बसंत
     -कैलाश कल्ला
कल थे चूजे
आज पंख लग गए
उड़ ही चले
     -कैलाश कल्ला

४.३.१६
चाक मैके की
ससुराल के ढाँचे
ढल जाती स्त्री
      -विभा श्रीवास्तव
सीखने वाली
बात है विनम्रता
ज्ञान है भारी
      -प्रियंका वाजपेयी
सीता लंका में
हुई न विचलित
स्वयं सोना थी
     -आर के भारद्वाज
करती बातें
चिरागों से रोशनी
घंटों रातों में
     राजीव गोयल
सुबह हुई
रात भर जागी
रजनी सोयी
      -राजीव गोयल

५.३.१६
सौन्दर्य दिखे
अंतर की छबि जो
सरल सजी
       प्रियंका वाजपेयी
गृह हमारे                                                                                                                                                     नियम से विचरें
संयमी संत
      -आर के भारद्वाज
बेंच दी रूह
आवाज़ भी उसकी
देह की खातिर
       जितेन्द्र वर्मा
बहू विधवा
भटके गली गली
भिखारिन सी
     -जितेन्द्र वर्मा
ज़ख्म नहीं हैं
मेरे ज़िंदा  होने का
सबूत हैं ये
      -आर के भारद्वाज

६.३.१६
सूर्य देवता
झांकते बादलं से
ताप रहित
      -प्रियंका वाजपेयी
कभी न चुकें
इतिहास के पन्ने
सदा चौकन्ने
      -अभिषेक जैन
ऐंठने पड़े
सुर मिलाने वास्ते
वीणा के तार
     -कैलाश कल्ला

७.३.१६
भक्त कतार
दुग्ध-स्नान शिव का
नाली में दूध
       -जितेन्द्र वर्मा
लगी कंकर
सतह पर उभरा
पानी का दर्द
      -राजीव गोयल

८.३.१६
नमन नारी
सर्व गुण सम्पन्ना
ह्रदय-ग्राही
      -कन्हैया
मैं नारी मैं माँ
मैं संगिनि मैं दीक्षा
अन्नपूर्णा मैं
      -प्रियंका वाजपेयी
बिखेर गई
बोरा भर गुलाल
ढलती सांझ
       -राजीव गोयल
जल के वक्ष
दल रहीं हैं दाल
जलकुम्भियाँ
       -संतोष कुमार सिंह
स्वर्ण सी नार
चाहे हीरे का श्रंगार
कोमल ठोस
      -कैलाश कल्ला

९.३.१६
पत्ते क्या उड़े
पंछी भी उड़ गए
छाव न ठांव
      -आर के भारद्वाज
घनचक्करी
होती गृह की धुरी
बांधे घड़ी स्त्री
      -विभा श्रीवास्तव
रंग कलश
लिए सर पे खड़े
वन पलाश
      -राजीव गोयत

10.3.16
अप्रयास से
अप्राप्त होता प्राप्त
रास संयोग
      -कन्हैया
पंछी की छाया
पाँव तले क्या आई
उड़ ही गई
     -तुकाराम खिल्लारे
नाचें घटाएं
आकाश नृत्यालय
घुमड़ नाद
      -आर के भारद्वाज
 हैं कराहते
बिछुड़ कर पत्ते
कुचले जाते
      -राजीव गोयल

११.३.१६
उतर आए
नभ से कुछ तारे
जुगनू बने

उड़े जुगुनू
जा बैठे नभ पर
बन के तारे
      -राजीव गोयल

१२. ३.१६
जीत ली जंग
फतह की दुनिया
हारा क्या? प्रेम
     -प्रियंका वाजपेयी
अमा की रात                                  
हिल्र रहे दो बल्ब
म्याऊँ का स्वर
     कैलाश कल्ला
चिट्ठियाँ लाएं
समय के डाकिए
बासी यादों की
       -प्रीति दक्ष
धूप ने खेली
इंद्रधनुषी  होली
मेघों के संग
     -राजीव गोयल

१३.३.१६
शुरू हो गई
दिनभर की चक्की
भोर के साथ
        -प्रियंका वाजपेयी
पाया न नाप
बुद्धू थर्मामीटर
मन का  नाप
      -अभिषेक जैन
प्यासे हैं घट
बेबस पनघट
जल संकट
     -अभिषेक जैन
उगलें झाग
आ तट  पर लहरें
तोड़ती दम
     -राजीव गोयल

१४.३.१६
दुष्ट इरादे
कभी न हों विजयी
कैसी भी जंग
      -प्रियंका वाजपेयी
दिल में रखो
महफूस प्यार को
एक कोने में
       जितेन्द्र वर्मा
रात आते ही
ख़्वाब लगे तैरने
आँखों में मेरी
        अमन चाँदपुरी

१५ ३. १६
बना घोंसला
वक्त कतरनों से
पालता यादें
        -राजीव गोयल
क्षण कौंध में
साये लिपटे खड़े
ड्योढ़ी  पे वृक्ष
     -विभा श्रीवास्तव
दशरथ वो
साधे दसों इन्द्रियाँ
जीवन रथ
     -प्रियंका वाजपेयी
ये होली ख़ास
दरस का आभास
रचे उल्लास
     -राजीव निगम 'राज़'
होली के रंग
उड़े बादलों संग
पिया मलंग
      जितेन्द्र वर्मा
पलाश फूल
लगे हैं थरथराने
-होली आ गई !
     -तुकाराम खिल्लारे

 १६ ३. १६
सर्पीली राहें
रंग रोशन छटा
इन्द्रधनुषी
     -विभा श्रीवास्तव
रहस्यमयी
आकाश का विस्तार
मौन की गूँज
      -प्रियंका वाजपेयी
     
नींद - दो हाइकु -

नींद को मैंने
सजा  दी टूटने की
दूर भगा दी

मैं नहीं सोया
नींद लड़ने लगी
जीत भी गई
     आर के भारद्वाज
बांधे पायल
सुख और दुःख की
नाचे ज़िंदगी
     -जितेन्द्र वर्मा
चढें उतरें
पहाडी ढलानों पे
पगडंडियाँ
      -राजीव गोयल

१७. ३. १६
जो काबू खोया
नित नए तमाशे
अब चखिए
      -प्रियंका वाजपेयी
राधा अनंग
रंगी कृष्ण के रंग
गोपियाँ दंग
     --राजीव निगम 'राज़'
बड़े होकर
क्यों हो जाते हैं लोग
अक्सर छोटे ?
      -राजीव गोयल
दूध रखा था
दुल्हन उदास थी
पिया नहीं था    (दो-सुखन)
        -आर के भारद्वाज
ट्रेन का डिब्बा
हर यात्री विद्वान
मुफ्त दे ज्ञान !
       -अमन चाद्पुरी

 १८.३.१६
अग्नि परीक्षा
माता पिता घर में
पुत्र विदेश
     -कन्हैया
रंग में रंगी
बनी हूँ छाया तेरी
छूटे न कभी
     
रंग बहका
छूकर जो बिखरा
तन से तेरे
       -महिमा वर्मा
ठूँठ शाखाएं
पतझड़ में रोईं
श्रृंगार बिना
       -आर के भारद्वाज
पी रही रात
चन्दा की सुराही से
चांदनी जाम
       -राजीव गोयल

१९ .३.१६
प्रीति सागर
सींचे सूखा अंतस
पुष्पित सत्व
       -प्रियंका वाजपेयी
अतीत राख
सुलगते अब भी
याद अंगार
     -राजीव गोयल
चढता गया
लोभ का तापमान
आया न नीचे
       -अभिषेक जैन
टेसू की होली
चहकी फागुन में
होली है होली
      -राजीव निगम राज

२०.३.१६
सूखे हैं कूप
तड़पता पथिक
हंसती धूप
     -अभिषेक जैन
बांस में जान
हवा फूंक जाएं
बंसी बजाएँ
     -राजीव गोयल
अश्रु भिगोते
मन के सूखे कोने
करें पवित्र
      -प्रियंका वाजपेयी
होली के रंग
राधा कृष्ण के संग
रुक्मणि दंग
       -जितेन्द्र वर्मा
हँसे कन्हैया
बिसातिन बनके
घाघरा चोली
      -कन्हैया

२१.३.१६
मन मुटाव
झलकते तेवर
अदृश्य घाव
      -अभिषेक जैन
उगाए आम
फिर क्यों मैंने पाए
पेड़ बबूल
      -राजीव गोयल
होवें जितेन्द्र
रोकें भागता मन
खींचें कमान
       -जितेन्द्र वर्मा
मन बौराए
साजन नहीं आए
फाग न भाए
      -राजीव निगम 'राज़'  

२२.३,१६
रंग बौछार
भीग धरा बनती
इंद्र का चाप
     -विभा श्रीवास्तव
होंठ कमान
छोड़ें शब्दों के बाण
बिंधते प्राण
      -राजीव गोयल
खरीदा मैंने
तजुर्बा ज़िंदगी का
खर्च के उम्र
       -राजीव गोयल
मेरी औकात
ये तो न थी ऐ खुदा
क्या क्या दे दिया !
      -जितेन्द्र वर्मा

२३.३.१६
गाल रंगाए
रोज़ होली मनाए
पार्लर जाए
       -राजीव गोयल
जीवन नाव
कुतर के डुबोते
चूहे इच्छा के
       -कैलाश कल्ला

२४.३.१६.
कान्हा के संग
खेलीं गोपियाँ होली
कान्हा की हो ली
      -आर के भारद्वाज
कुछ सूक्ष्म है
गूढ़ बसा भीतर
बाह्य न खोज
      -प्रियंका वाजपेयी

२५.३. १६
जाने क्यूँ मन
आवाज़ देता रहा
जाने वाले को
       -प्रियंका वाजपेयी
आस बाक़ी है
तुमसे मिलने की
तिश्नगी बाक़ी

खफा मुझसे
ज़माने भर से क्या
नाराज़ी  बाक़ी
       -प्रीति दक्ष
ओलों की मार
बिछ गए खेतों में
गेहूँ और ज्वार

तनहा रात
चीख रहे सन्नाटे
तेरी है कमी
       -राजीव गोयल
झिरीं से झांके
उजाले की किरण
कनखियों से

पेड़ का तना
पत्ते न फल फूल
तना ही रहा
      आर के भारद्वाज

२६. ३. १६
गुंजन करे
सूर्य का ऊर्जादल
ओंकार शब्द
        -प्रियंका वाजपेयी
दीवारें उठें
घरों में या मनों में
बढ़ें दूरियाँ
      -राजीव गोयल
यादों के फूल
झर गए आँखों से
मिट्टी भी नम
        -तुकाराम खिल्लारे
सीप चाहती
स्वाति की एक बूंद
सागर नहीं
      -राजीव गोयल

२७.३.१६
भानु को देख
हिम में आए स्वेद
नदी में बहे
     कैलाश कल्ला

२८.३.१६
गले लगेंगे
परमात्मा की दुआ
दिल दरिया
       -कन्हैया
ऋतु सुन्दर
बाजुओं के हार सी
हसीं मंज़र
      -राजीव निगम 'राज़'
ना रूठी ही हो
न मनाए मनती
पहेली तुम
      -आर के भारद्वाज
करते खेत
मेघों से अरदास
बुझा दो प्यास
       -राजीव गोयल

२९.३. १६
बढे जितनी
घट जाती उतनी
वाह, ज़िंदगी

खुला पिजरा
हुआ आज़ाद पंछी
खोया नभ में
       -राजीव गोयल
चाहा बहुत
छू ही लूँ एक बार
तू  आकृति सी

मन में बसी
तेरी सूरत ऐसी
कलाकृति सी
      -आर के भारद्वाज

३०.३.१६
कितनी प्यारी
तेरे प्रेम की रीत
तेरी ही जीत
       -आर के भारद्वाज
काल्पनिक हैं
फिर भी टूट जाते
बुने सपने
      -कैलाश कल्ला
निगल गई
जलता हुआ गोला
रात डायन
      -राजीव गोयल
पूर्व दिशा
लिए गोद में खडी
बालक रवि
      -राजीव गोयल
चुटकी भर
गुलाल मस्तक पे
होली - आशीष
      -विभा रश्मि

३१ .३.१६
लौटी स्वदेश
सांझ बस में बैठ
सैलानी धूप
      -अभिषेक जैन
मन मन के
बोझ बने मन के
बोल उनके

गुज़रे पल
मचायें  हलचल
मन विकल
       -महिमा  वर्मा
गया भी नहीं
पहचाना भी नहीं
जाना नहीं था
      (दो सुखन हाइकु)
      -आर के भाद्वाज
आम्र मंजरी
मधु सिक्त टहनी
होठ रसीले
       -कन्हैया
बाती ने छोड़े
उजाले के नश्तर
अन्धेरा ढेर
      -राजीव गोयल

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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

फरवरी माह के हाइकु

फरवरी माह के हाइकु
१.,२.१६

आंसू के कंधे
उठा कर ले गए
मन का बोझ
     अभिषेक जैन
बाहें फैलाए
बरगद दादाजी
देते आसरा
      प्रीती दक्ष
शक का बिंदु
खिचा बन लकीर
हमारे बीच
    राजीव गोयल
२.२.१६

नव पल्लव
देख, बुज़ुर्ग पत्ते
वन को चले
    कैलाश कल्ला
भीतर योग
बाहर कामनाएं
यही है सत्य
    प्रियंका वाजपेयी
फैलाए डैने
फैंसी  ड्रेस पहने  
मयूर नाचे
    आर के भारद्वाज
३.२.१६

बड़े बंगले
हरे-भरे गमले
मुरझाई माँ
   अभिषेक जैन
सत्य का सूर्य
छुपा नहीं सकते
झूठ का सूर्य
     संतोष कुमार सिंह
सफेद् हाथी
छीन कर खा जाते
भूखे की रोटी
     कैलाश कल्ला
4.2.16
ऊंचे मकान
रहते हैं उसमें
बौने इंसान
    राजीव गोयल
५.२.१६

मारा दे धक्का
असंतुलित जिह्वा
कोमा में रिश्ते
     अभिषेक जैन
ज़िंदगी मानो
दरिया दाहक का
सुख  न खोजो
      शान्ति पुरोहित
ज़िंदगी स्वप्न
मौत एक सच्चाई
झूठ में जिए
   -आर के भारद्वाज
रुका हुआ ये
क्षण, भागने लगा
दौड़ी ज़िंदगी
   - जितेन्द्र वर्मा
हो गई हद
कानून से ऊपर
उनका कद
     -संतोष कुमार  सिंह
उघडा तन
मजबूरी किसी की
किसी का शौक
    राजीव गोयल
 ७.२.१६
चढ़ी लहर
सागर के काँधे पे
छूने को चाँद
       -राजीव गोयल
जन्म में जन्म
बार बार् मर के
लेता मनुज
     -शान्ति पुरोहित
८.२. १६

बसंत राज
अपदस्थ हो गए
पुराने ट्रस्टी
     -अभिषेक जैन
बात बेबात
निकल आती बात
तुम्हारी याद
     -शान्ति पुरोहित
छुएँ गगन
रहें ज़मीं से जुड़े
गिरी महान
     -राजीव गोयल
ओस के दाने
धूप चिरैया खाए
बीन बीन के
    -आर के भारद्वाज
९.२.१६

दिखे वो नहीं
जो महसूस होवे
वही है सच
     -जितेन्द्र  वर्मा
ठूँठ शाखाएं
उजड़ गया नीड
चिंतित पक्षी
    -शान्ति पुरोहित
दीप जो जला
जान बचाने तम
पैरों में गिरा
    -राजीव गोयल
बजा के भागी
खुराफाती पवन
घर का द्वार
     -अभिषेक जैन
१०.२.१६

मुंह फाडतीं
कामनाएं सदा ही
जैसे सुरसा
    -प्रियंका वाजपेयी
बनाए बैठे
ज़हन में घोंसला
याद परिंदे
     -राजीव गोयल
वस्त्र फटा क्यों
प्रभु राम दुखी क्यों
सिया नहीं यूं
    -आर के भारद्वाज

११.२.१६
थके न कभी
लिए यादों की डोली
मन कहार
     -राजीव गोयल
तानती सुर
बेख़ौफ़ हवा तुन्डी
बजाती कुंडी
     -विभा श्रीवास्तव
 १२'२'१६
सड़क टूटी
गुमसुम  सी गली
फिर जी उठी
     -अभिषेक जैन
१३.२.१६
निराश्रय है
खोई बना बुज़ुर्ग
पूत निर्मोही
     -विभा श्रीवास्तव
जीत (प्यार) का जश्न
मने इस तरह
दोनों ही हारें
     -आर के भारद्वाज
तजता प्राण
कर सूर्य नमन
हरसिंगार
     -राजीव गोयल
पीले वस्त्रों में
ड्रिल करते बच्चे
बसंत आया
     -जितेन्द्र वर्मा
१४.२,१६
बिंधे सौ तीर
बिन पी, मीन साध्वी
फागुनी पीर
     -विभा श्रीवास्तव
१५ .२. १६
मन चेतक
नाप लेता गगन
छूता पाताल
     -विभा श्रीवास्तव
जूझती रही
तूफ़ान की लहरों से
विजयी नाव
     -प्रियंका वाजपेयी
नदिया जैसा
हो सतत सफ़र
क्या धूप छाँव
    - प्रियंका वाजपेयी
जर्जर नौका
घाट घाट  भटके
मिले न ठांव
     -कैलाश कल्ला
१६.२.१६
खड़ा पलाश
लिए सर अंगार
झुलसे पात
    -राजीव गोयल
हैं अहिंसक
देखा मैंने उन्हें भी
मन मारते
    -संतोष कुमार सिंह
क्या होता रिश्ता
चाची बुआ मौसी
पूछते बच्चे
     - कैलाश कल्ला
प्राण का पंछी
फुर्र से उड़ गया
निर्मोही सुग्गा
     -आर के भारद्वाज
१७.२.१६
जीवों से घृणा
पत्थर को पूजते
पत्थर दिल
    -आर के भाद्वाज
कागज़ नाव
घूम आया बबुआ
देश विदेश
     -अभिषेक जैन
लब खामोश
पर कहती आँखें
दिल की बात
      -राजीव गोयल
१८.२.१६

दर्द लहरें
भरता न सूखता
ह्रदय सिन्धु
      -विभा श्रीवास्तव
हे प्रियतम
केवल तुम छाए
मेरी आँखों में
      -संतोष कुमार सिंह
दाग न लगा
चरित्र अनमोल
जीवन जोश
     -कैलाश कल्ला
१९.२.१६
पवन गुरु
सिखा रहा बांसों को
बंसी बजाना
     -राजीव गोयल
दर्द लहरें
भरता न सूखता
ह्रदय सिन्धु
       -बिभा श्रीवास्तव
दोनों एक सी
गौरैया और बेटी
उड़ जावेंगी
    -राजीव गोयल
बेटी पराई
उड़ गई गौरैया
सूनी मुंडेर
    -राजीव गोयल (हाइगा से )
प्रसाद न लूँ
प्रभु रुष्ट, ज़्यादा लूँ
पुजारी रुष्ट
      -आर के भारद्वाज  
धन्धा मंदा है
प्यार के ढेर लगे
घृणा ही बिके
      -आर के भारद्वाज
 २०.२.१६
सुनती तो हैं
 जो बोलती दीवारें
 सोचो क्या होता !
       -राजीव गोयल (हाईगा से)
लक्ष्मण चले
विरह में उर्मिला
चौदह वर्ष
      -प्रियंका वाजपेयी  
फट जाता है
मन की खटास से
रिश्तों का दूध
     -राजीव गोयल
गर्मी लगती
भाड़ भी नहीं चढ़ा
झोंका न था
       -आर के भाद्वाज (दो-सुखना)

२१.२.१६
शैतान पोती
छुपा दादी का चश्मा
मांगे फिरौती
    -अभिषेक जैन
काट ले गया
लकडहारा वक्त
उम्र दरख़्त
    -महिमा वर्मा
२२. २. १६
शाम का बाज़
दबोच के ले गया
धूप चिरैया
     -राजीव गोयल
घंटियाँ बाजें
मंदिर में आरती
देवता मौन
      -जितेन्द्र वर्माँ
चनिया चोली
भू धारे सतरंगी
रचे रंगोली
    -विभा रानी श्रीवास्तव

२३..२.१६
तरु तन से
प्रेयसी सी लिपटी
कोमल लता
     -संतोष कुमार
उतार फेंके
पत्तों के आवरण
गईं सर्दियाँ
    -प्रियंका वाजपेयी
प्रकृति सजे
ऋतुराज आकर
श्रृंगार करे
    -राजीव निगम राज
छोटे कदम
पहुंचाएंगे हमें
बड़ी मंजिल
     जितेन्द्र वर्मा
मन उदास
मरीचिका जीवन
सुख की आस
     -तुकाराम खिल्लारे
आया बसंत
हुआ फिर आबाद
हर दरख़्त
     -राजीव गोयल
अग्नि अग्नि है
काम, प्यार , जठर
तांडवकारी
    -कैलाश कल्ला

२४.२.१६
धूप में छाँव
सर्दियों में अलाव
है माँ का नाम
     -राजीव गोयल
पकता प्यार
समय अलाव में
सोंधी महक
      -जितेन्द्र वर्मा
कहीं है कोई
आशाओं की किरण
दुःख के बीच
     -प्रियंका वाजपेयी

२५ .२.१६
भौंरे बावरे
प्रणय रस डूबे
फागुन आ रे
     -राजीव निगम 'राज'
बावन हफ्ते
हैं ताश के पत्ते
हरेक जुदा
      -राजीव गोयल
दूरियाँ मिटीं
सिकुड़ गए हम
खुशियाँ बंटी
      -अभिषेक जैन

२६. २.१६
हया फरार
गुमशुदा संस्कार
रोये संस्कृति
     -अभिषेक जैन
मोती हैं हम
शब्दों की माला
भावना डोरी
     -प्रियंका वाजपेयी
खोली डायरी
वक्त भागने लगा
उलटे पाँव
     -राजीव गोयल

२७.२.१६
बच्चों का खाया
बिखरा पडा ज़र्दा
गेंदे की क्यारी
      -विभा श्रीवास्तव
सो गई रात
देख भोर का तारा
जागी सुबह
      -राजीव गोयल
डूब रहा मैं
जग के समुद्र में
ढूँढू तिनका
      -राजीव गोयल

२८.२,१६
 लौट के आए
दिगंबर तरु के
प्रवासी पूत
     -विभा रानी श्रीवास्तव
बेटियाँ लूटीं
बेदर्दी उपद्रवी
कौन बचाए
      -प्रीती दक्ष
स्नेह का घृत
रूह की भीगी बाती
पर्यंत चले
      -प्रियंका वाजपेयी

२९.२.१६
भोर की बेला
ठंडी पवन छुए
अंतरमन
     -प्रियंका वाजपेयी
जीवन नाव
प्रेम की पतवार
उतारे पार
      -कैलाश कल्ला
मयूर पंख
मन चढा अटारी
पड़े फुहार
     - कन्हैया