मंगलवार, 1 जनवरी 2019

दिसंबर माह के श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु

तुम हो मेरे
रेत पे जैसे कोई
चित्र उकेरे
       -सुरंगमा यादव
सर्दी में गर्मी
बुनती सलाई पे
हमारी अम्मा
       -राजीव गोयल
घायल किया
और ज़िंदा भी रखा
उम्मीदों ने ही
        -राजीव गोयल
सत्य का पाँव
भटक गया आ के
झूठ के गाँव
        -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
ढील पे ढील
फँस गई पेंच में
कहीं पतंग
       -सुरंगमा यादव
सावन मन
शब्द हथेली पर
रचें हाइकु
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
काव्य के वन
महकते हाइकु
चन्दन बन
       -अभिषेक जैन
जागा संसार
गंध बाँट सो गया
हरसिंगार
      - डा. शिव जी श्रीवास्तव
उम्र पोनी से
बुने मृत्यु चादर
काल पुरुष
       - डा. शिव जी श्रीवास्तव
मिले सत्कार
जीवन में भर लो
ऐसे संस्कार
        बलजीत सिंह
पूरब दिशा
सुना रहा सूरज
भोर के गीत
      -राजीव गोयल
ठण्ड की रात
अंधेरी पगडंडी
सूर्य की खोज
     सुशील शर्मा
लंबा शैशव
छोड़ हाइकु हुआ
अब तो युवा
      -सुरंगमा यादव
लव्जों की नदी
रचती इतिहास
पढ़ती सदी
       -निगम 'राज़'
शीत कांटे-सी
मौसम गुलाब -सा
मन तितली
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
शब्द वीरान
खोखले से, खामोश
झरते पत्ते
      -सुशील शर्मा
स्वेद की स्याही
श्रम का महाकाव्य
रचे किसान
        -सुरंगमा यादव
ढूँढे शिकार
गरीबों की बस्ती में
सर्दी की रात
      -राजीव गोयल
अन्धेरा घोर
लाएंगे मिलकर
सुहानी भोर
      -सुरंगमा यादव
चैन से जिया?
या सुकून से मरा ?
बता तो सही ....
      -प्रियंका वाजपेयी
एकाकीपन
उद्वेलित रहता
सागर मन
      -सुरंगमा यादव
सन्नाटा बोला
शोर ने छुपाया जो
वही सच था
       -प्रियंका वाजपेयी
मन भारी था
बरस पड़ा वह
बादल जैसा
       -डा. सुरेन्द्र वर्मा
अकड़े तुम
हम भी रहे तने
बात क्या बने
      -सुरंगमा यादव
गृह कलह
बिखरे ब्लॉक्स को
जोड़े बालक
      -अभिषेक जैन
हंसी उड़ा लो
नहीं रहेंगे जब
तब पूछोगे
     -डा.सुरेन्द्र वर्मा
नोक न तीर
कलेजा देती चीर
चुभती शीत
       -सुरंगमा यादव
हवाएं सर्द
पेड़ों पर टंगे पत्ते
हो गए ज़र्द
      -राजीव गोयल
मिलिट्री स्कूल
छोटे का फ़ार्म भरे
शहीद की माँ
      -अभिषेक जैन
शीत ओढ़ के
फुटपाथ पे सोया
फिर न जागा
       -सुरंगमा यादव
जल से रिक्त
कटि पर गागर
लम्बी कतार
       -तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
वन ढूँढ़ते
मोर गाँव में आया
बिसरा नाच
       तुकाराम पुंडरिक खिल्लारे 
साल सरका
देता गया स्मृतियाँ
बांचते हम
       प्रियंका वाजपेयी
हुई अलग
जब पेड़ से पत्ती
कुचली गई
      -राजीव गोयल
कोरा कागज़
तनहा जीवन सा
अक्षर जोहे
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
राख में उगे
आशा के दूब हरे
श्रम का भाग्य
       -रमेश कुमार सोनी
देखो हाइकु
हथेली पर बैठा
बटरफ्लाय
      -तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
मोह की माया
अहसास प्यार का
उभर आया
      -निगम 'राज़'
पत्ता टूटता
आशा और निराशा
भूत भविष्य
       -शिव डोयले
धूल हटेगी
फिर से निखरेंगे
मलिन पात
     -सुंरंगमा यादव
उधड़ गई
सी लूंगा फिर से
नई  ज़िंदगी
      -राजीव गोयल
खिली सेवंती
लगन मंडल पे
आव्या की छाया
      विभारानी शीवास्तव
* 'आव्या' - सुबह की पहली किरण
भाव निश्छल
रख ह्रदय तल
मिलेगा फल
       -सुरंगमा यादव
ओढ़ रजाई
मीठे सपने देखे
निशा बावरी
        -शिव डोयले
है खिली हुई
सुख की भोर नई
जागो तो सही
       -सुरंगमा यादव
जीवन संध्या
एकाकीपन साथ
शिथिल गात
       -सुरंगमा यादव
सर्द आलम
हम हुए मुश्ताक
धूप बेज़ार
      डा. सुरेन्द्र वर्मा
गुज़रा साल
भर गया तिजोरी
यादों से फिर
       -राजीव गोयल
कहीं तो होगी
नैराश्य परिणति
योग या भोग
       -सुरंगमा यादव
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समाप्त 

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - नवम्बर माह

बांटता फिरे
ये बसंत डाकिया
सुगन्ध पत्र
       -राजीव गोयल
ओस की बूंद
पल में खुशियों ने
आँखें ली मूंद
        -सुरंगमा यादव
प्रीत के पाँव
बिन पायल बाजे
सुनता गाँव
        -सुरंगमा यादव
दीपकोत्सव
स्याह अन्धेरा फैले
साझे दर पे
      -विभा श्रीवास्तव
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगडाई
      -बलजीत सिंह
ज्यों तेल बाती
आलोकित जीवन
जीवन साथी
       -शिव डोयले
नोच के फेंकी
कैसा बाल दिवस
कोख की कली
        -राजीव गोयल
बालक मन
मजबूर हुआ है
बंधुआ तन
       -निगम राज़
उसी कक्षा में
दादी का नामांकन
बाल दिवस
      विभा श्रीवास्तव
जग कॉलेज
ज़िंदगी की किताब
बांटती ज्ञान
     -राजीव गोयल
चाँद न तारे
अभिलाषा के फूल
सबसे प्यारे
       -वलजीत सिंह
दूर सबसे
गर्व-गिरि पे तुम
चढ़े जब से
        -सुरंगमा यादव
प्रेम समीर
बहती आसपास
तेरी खुशबू
      -नरेन्द्र श्रीवास्तव
साईं की कृपा
कांटे स्वयं दे रहे
फूलों का पता
     -सुरंगमा यादव
कैसा समाज
शरीफों को ठोकर
चोरों को ताज
       -बलजीत सिंह
 शब्दों की फाँस
वर्षों तक देती है
मन को त्रास
       सुरंगमा यादव
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        बलजीत सिंह
आंसू न कहो
पीड़ा के सागर से
छलकी बूँदें
      - सुरंगमा यादव
एक पर का
पंछी फड़फड़ाए
बहते आंसू
     तुकाराम खिल्लारे
वृद्धा आश्रम
माँ बाप खाते जहां
बेटे का गम
     -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
खुद को पाया
जग भर को पाया
पल में मैंने
     -सुरंगमा यादव
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - अक्टूबर माह

खो गई मस्ती 
वक्त ने दे दी मुझे 
दर्द की बस्ती 
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य' 
थामी उसने 
सत्य अहिंसा लाठी 
नाम था गांधी 
      -राजीव गोयल 
पुतला जला 
दशानन अनेक 
अभी हैं ज़िंदा 
       सुरंगमा यादव
कितनी बार
समस्या सुलझाती
चाय की मेज़
       -डा. रंजना वर्मा
लूट ले गया
दरख्तों का वैभव
ये पतझड़
       -राजीव गोयल
पिरोती रही
तन्हाई की डोर में
आंसू के मोती
       राजीव गोयल
नित सुकर्मी
नवीन स्वप्न देखे
प्रयोगधर्मी
      निगम 'राज़'
मृत्यु खिलाड़ी
लपकने को खड़ी
जीवन गेंद
       सुरंगमा यादव
बाबा उदास
चंचल नदी दौड़ी
सिन्धु के  पास
      -पुष्पा सिन्धी
तितली देख
पकड़ने को बढे
हाथ अनेक
        सुरंगमा यादव
झड़ा पलाश
सजी पेड़ों के नीचे
फूलों की सेज
       -राजीव गोयल
अच्छा है धंदा
किराए पे दें कंधा
यही विकास
      -निगम 'राज़'
दादी की याद
बरामदे में धूप
सुखद लगे
       शिव डोयले
प्रभु की माया
राम हो गए बौने
रावण छाया
       -निगम 'राज़'
लुटेरी आँखें
दिल का त़ाला टूटा
भरे बाज़ार
      -रमेश कुमार सोनी
हो गए रिश्ते
अब तो गुणा-भाग
 किससे कहूँ ?
       सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
शरद पूनो
मन आँगन फैली
प्रीत चांदनी
       -सुरंगमा यादव
दोनों शर्माते
चाँद ने देखा चाँद
प्यार छलके
    -रमेश कुमार सोनी
पैरों के नीचे
दर्द से कराहती
सूखी पत्तियां
       -राजीव गोयल
चौथ का चाँद
उठी नव तरंग
प्रेम सिन्धु में
       -सुरंगमा यादव
मीटू है आई
जाग गए हैं भूत
ले अंगड़ाई
      भीम प्रजापति
इच्छाएं लादे
थक गए हैं काँधे
निभे न वादे
      -निगम 'राज़' 
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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकू - सितम्बर माह

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु , माह सितम्बर

चाँद न तारे
अभिलाषा के पुष्प
सबसे प्यारे
      -बलजीत सिंह
कंस जो फूले
शरद दौड़े आता
वर्षा का गौना
      -रमेश कुमार सोनी
करूं प्रतीक्षा
ये मन महाकाव्य
बाँचे तो कोई
       -सुरंगमा यादव
यमुना तीर
हरी हरी ने चीर
रार मचाई
      -(जन्माष्टमी) सुरंगमा यादव
हे राधे कृष्ण
तुम जैसे दूध में
मिला माखन
       -राम कुमार माथुर
श्रमिक मुख
लिख रही झुर्रियां
संघर्ष गाथा
      -सुरंगमा यादव
पथ में गड्ढा
तम में बाँह खींचे
गुरु ज्ञानेश्वर
       -विभा श्रीवास्तव
ये रनिवास
सजी-धजी रानियाँ
प्रतीक्षालय
      -सुरंगमा यादव
खाली है कुर्सी
अब पापा की फोटो
दीवार पर
      -राजीव गोयल
बारिश आई
सोंधी खुश्बू लाई
हवा नहाई
      निगम 'राज़'
घुप्प अधेरा
साफ़ सुथरी स्लेट
बच्चे के हाथ
      अभिषेक जैन
छंटा अन्धेरा
बच्चे की स्लेट पर
बारहखड़ी
     -अभिषेक जैन
दुनिया सारी
पलाश के खून से
खेलती होली
      -राजीव गोयल
देह से परे
कभी मन को मेरे
छूकर देखो
       -सुरंगमा यादव
एक बादल
धरती का आँचल
करता गीला
        -शिव डोयले
जल अमृत
बनता हलाहल
डूबते लोग
       मुकेश शर्मा
संध्या शर्माई
रात को बुला लाई
छुपी छुपाई
      -निगम 'राज़'
मन का सूप
फटके जीवन भर
छाँव व् धूप
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
रवि ने बुनी
किरणों की चुनरी
भोर ने ओढी
     -राजीव गोयल
हर सिगार
करता दिलों पर
गहरी मार
        -बी पी प्रजापति
पग को धोता
एक महासागर
नाम है हिन्द
      -अमन चाँदपुरी
मेघों की धूप
घूँघट से झलके
गोरी का रूप
       -सुरंगमा यादव
जन्म लेता है
आंसुओं की कोख से
विरह काव्य
      अमन चांदपुरी
वर्षा की बूंदें
शांत वातावरण
पत्तों पे बैठीं
      -अमन चांदपुरी
हंसता कांस
बरसात चल दी
घर अपने
      -शिव डोयले
नभ में छाए
इंद्रधनुषी रंग
बादल संग
      -अमन चाँदपुरी
सभी गर्दने
फुर्ती से मुड़ गईं
मैडम आयी
     हास्य हाइकु /- तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे
अहं को ढोया
जीवन की किताब
पढ़ न सका
       -शिव डोयले
उड़ती रही
वाष्प की तरह ही
धरा की आह
       -प्रियंका वाजपेयी
ईद का चाँद
साल में एक दिन
हिन्दी आबाद
      -पुष्पा सिन्धी
दबी आवाज़
नारों जयकारों में
बेबस हिन्दी
      -पुष्पा सिन्धी
ओ रे बदरा
इतना न इतरा
अति न भली
      -सुरंगमा यादव
हिन्दी खज़ाना
अंग्रेज़ी डाले डाका
हस्ती है ज़िंदा
        -रमेश कुमार सोनी
कृष्ण की प्रिया
हुई अवतरित
राधिका रानी
       (राधा अष्टमी)- रंजना वर्मा
मैं ही मय हूँ
पक्का खुदगर्जी हूँ
पर फर्जी हूँ
       -निगम 'राज़'
पिघला रहीं
समय की किरणें
उम्र की बर्फ
      -राजीव गोयल
बंद घड़ी सी
ठहरी लगती है
जीवन संध्या
     -सुरंगमा  यादव 
मीठे पानी के
काले बादल बने
सागर खारे   
       -रमेश कुमार सोनी
धिया दिवस
पंख फड़फाड़ाई
चिडी मुक्त हो
       -विभा श्रीवास्तव
कभी न कहा
नैनों में भेद छिपा
क्या क्या न सहा
      प्रिंका वाजपेयी
सूर्य किरण
लिखती नभ पर
भोर के गीत
      -राजीव गोयल
खूब छकाते
जीवन के मसले
उम्र पकाते
     -निगम 'राज़ '
कीकर कैर
धोरों का सौन्दर्य
बबूल बेर
     -सूर्य किरण सोनी 'सरोज'
मेरे समीप
दूर तक फैले हैं
पीड़ा के द्वीप
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
सूना मकान
बुनता रहा जाला
एक मकड़ा
      -शिव डोयले
सत्य की सांस
आज भी गतिमान
ज़िंदा है गांधी
      -निगम 'राज़'
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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु अगस्त माह

 श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - अगस्त माह


घायल पड़ा
शब्दों के बाणों पर
रिश्तों का भीम
      -रालीव गोयल
कहाँ खो गया
आपस का लगाव
वो सांझा चूल्हा
       -राजीव गोयल
गुरु की डांट
जैसे कड़वी नीम
सुख असीम
      -डा. रंजना वर्मा
प्रेम का रंग
देह से अंतर्मन
चढ़ता गया
      -शिव डोयले
सजाया घर
तराश के पत्थर
हुए चोटिल
      -सुरंगमा यादव
पंख भी दिए
परवाज भी दिया
मुक्ति ही न दी
        -प्रियंका वाजपेशी
चंचल हवा
बना फूल हिंडोला
झूले तितली
        -राजीव गोयल
झूला झुलाएं
मृदुल कल्पनाएँ
मोलित मन
       -डा. रंजना वर्मा
झूले ललना
सपनों का पालना
पीया के संग
       -सुरंगमा यादव
तैर रही है
कागजी नाव पर
बच्चों की खुशी
      राजीव गोयल
धरा बुलाती
मेघ पाहुन आए
सुस्वागतम
        शिव डोयले
शब्दित हुईं
खामोशियाँ सहसा
जादू ये कैसा
       -सुरंगमा यादव
सूना मंदिर
बज उठी घंटियाँ
तुम जो आए
       -सुरंगमा यादव
पर्वत पार
घटाओं का संगीत
मेघ मल्हार         
      निगम 'राज़'
भूख की आग
ठंडी अंगीठी पर
पकाती जुर्म
     राजीव गोयल
चाँद लेखनी
लहरों पर लिखूँ
प्रेम रागिनी
       -सुरंगमा यादव
हाथी पे चीटी
पहाड़ पे आदमी
औकात शून्य
       -रमेश कुमार सोनी
यौवनी उम्र
संबोधन मेघ से
मंडरा रहे
        -शिव डोयले
आजादी पर्व
पिजरे में फैलाए
तोते ने पंख
       -अभिशेख जैन
ओ मनमीत
बिना कहे कहानी
तुमने जानी
       -सुरंगमा यादव
ठहरा नहीं
कारवां कभी कहीं
ठहरे हम
       -सुरंगमा यादव
जलती चिता
देखता मैं इसमें
अपना कल
       राजीव गोयल
मेघ लौटाते
पानी माँगते पत्र
कंक्रीट तपे
       -रमेश कुमार सोनी
हारा है मन
प्राणों का भोझ अब
ढोता है तन
      सुरंगमा याद
ज़रा मरण
महाकाल का चक्र
कोई न बचा
        -सुशील शर्मा
कम्बल नहीं
ओढ़ के सर्द रातें
सोई गरीबी
       -राजीव गोयल
लापरवाही
कागज़ न कलम
खरीदी स्याही
      -बलजीत सिंह
वर्षा उदास
बच्चे घरों में कैद
कश्तियाँ रोतीं
     -रमेश कुमार सोनी
खींच लकीरें
बाँट दी सरहद
गहरी पीरें
       -निगम 'राज़'
घर से दूर
गाँव का समाचार
अखबार में
       -शिव डोयले
आवारा पत्ते
छोड़ गए अकेला
बूढा दरख़्त
     -राजीव गोयल
राह दुरूह
कितने चक्रव्यूह
भेदती नारी
      -सुरंगमा यादव
काले बादल
धरा पर तांडव
कुटिल काल
       -राम कुमार माथुर
अपनी ढापें
अपनो के मन की
पीडाएं बांचें
       -सुरंगमा यादव
आया सावन
मन उपवन पे
छाया सावन
    -राम कुमार माथुर
दादी खांसी
टूट न जाए स्वप्न
बच्चे की नींद
      -शिव डोयले
कैलाशवासी
उज्जैन हो या काशी
सर्वत्र व्याप्त
       -शिव डोयले
आई बरखा
नहीं बही बहार
जल सैलाब
       -राम कुमार माथुर
घिरे बादल
सांवला हुआ नभ
जैसे मोहन
      (हाइगा) -डा, रंजना वर्मा
सफ़र ख़त्म
हुई जीवन संध्या
छुपा दिगंत
     -अमन चांदपुरी
बुज़ुर्ग हँसा
मुंह से गिर गए
नकली दांत
      -राजीव गोयल
रक्षा बंधन
गर्भनाल से जुड़ा
अटूट रिश्ता
      -सुशील शर्मा
पड़ा अचेत
शब्द बाण शैया पे
रिश्तों का भीम
      राजीव गोयल
बातें बनाती
सारी बिगड़ी बातें
बातों से हल
      -रमेश कुमार सोनी
मुख में राम
हाथ में कमंडल
चित्त उद्विग्न
      -राम कुमार माथुर
भादों का आना
सावन की बिदाई
नई उम्मीद
     -शिव डोयले
सत्य का पाँव
भटक गया आ के
झूठ के गाँव
       सूर्य नारायण गुप्त
तम सघन
हौसला आज़मा के
देख ले मन
      -सुरंगमा यादव
मौन हो गए
ये विहग वाचाल
निशीथ काल
      -सुरंगमा यादव
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगड़ाई
        - बलजीत सिंह
कोई न सगा
सुख के साथी बन
सब ने ठगा
       -सूर्य नारायण  गुप्त 'सूर्य'







   











मंगलवार, 31 जुलाई 2018

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु माह जुलाई

पुरुवा आई
चन्दन वन से
खुशबू लाई
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
आँखें पावस
बिखरी फुलवारी
टूटा साहस
         सूर्य किरण 'सरोज'
कौमार्य भंग
उड़ने से पहले
कटी पतंग
        -सूर्य किरण 'सरोज'
क्वाँरे ख़्वाब
लूट कर ले गया
नर पिशाच
        -राजीव गोयल
काले बादल
जंगलों में छिड़कें
जीवन जल
       -सूर्य नारायण 'गुप्त'
लगे बजाने
झींगुर शहनाई
बरखा-काले
       -डा. रंजना वर्मा
दृष्टि पिया की
झील मेरा बदन
उठी तरंग
       -निगम 'राज़
बूँदें ओस की
घास ग़लीचे पर
जड़तीं मोती
      -डा. राजीव गोयल
शांत नदी में
हिलोरें सी उठना
आपका आना
      -सुरंगमा यादव
पावस आया
बादल घिर आए
आप न आए
       -इंद्र कुमार दीक्षित
प्रसन्न नारी
भोर के उजास में
पुष्प क्यारी
       -इंद्र कुमार दीक्षित
नन्हा सा आंसू
सागर भर दर्द
कैसे समेटे ?
      -सुशील शर्मा
नभ सागर
बादलों की किश्तियाँ
हवाएं चप्पू
      -राजीव गोयल
कहाँ जइब
चारु ओर घूमि के
एंहीं अइब
       -इंद्र कुमा र दीक्षित
आंसू पी जाऊं
जग रीत निभाऊँ
मैं मुस्काऊँ
       -सुरंगमा यादव
पावस माह
विरहिन ह्रदय
निकले आह
      -भीम प्रजापति
उमड़े घन
सावन भर नाचे
मयूरी मन
      -निगम 'राज़'
तोहफा कहीं
तो कहीं है प्रलय
वर्षा की बूँदें
      -राजीव गोयल
लेना मुझको
चाँद का ही खिलौना
बच्चे की जिद
      -राजीव गोयल
छद्म उत्साह
देकर कुछ वाह
देता है आह
       निगम 'राज़'
धरा दोहन
बढ़ता प्रलोभन
महाविनाश
      -सुरंगमा यादव
बांसुरी बाजे
कालीदह में कान्हा
श्री राधे राधे
       -भीम प्रजापति
लो लौट आया
दादी का बचपन
बच्चों के संग
       -शिव डोयले
बारिश शुरू
लिए मुंह में अंडे
भागी चीटियाँ
      -राजिव गोयल
करे उजाड़
अहंकार की बाड़
रिश्तों का गाँव
      सुरंगमा यादव
अहं का भार
तिनके से लटका
कोई पहाड़
      -सुशील शर्मा
कोई न सगा
सुख के साथी बन
सबने ठगा
      -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
पीर सघन
नयन कमल से
बरसे घन
       डा. रंजना वर्मा
उठी हिलोर
मन उड़ना चाहे
नभ की ओर
      -सोनी जी
कभी जीवित
कभी मृत सा लगा
संसार बोध ---
       -प्रियंका वाजपेयी
ढूँढ़ रहा है
कागज़ की वो नाव
वर्षा का जल
       -सुरंगमा यादव
तोड़ पहाड़
बहती जल-धारा
पर्वत पुत्री
        -डा रंजना वर्मा
पर्वत मन
जब होता उन्मन
बने तरल
      -डा, रंजना वर्मा
बंद किवाड़े
आ जाती फिर भी
पीड़ाएं द्वारे
      -सुरंगमा यादव
बाँध आया मैं
पीर की मज़ार पे
धागों में पीर
       -राजीव गोयल
दैविक सेतु
धरा से नभ तक
इन्द्रधनुष
       -राजीव गोयल
होती गर्जन
बढाती धड़कन
गोरी का मन
      -निगम 'राज़'
झटके केश
बदली ने अपना
गिरी फुहार
      -राजीव गोयल
कारवाँ छोड़
जग से मुंह मोड़
चला अकेला
        सुरंगमा यादव
धीरे बोलिए
है फूल अभी सोया
उतरी धूप
      -तुकाराम खिल्लारे
इश्क फसल
बोई जो दिल पर
उपजे आंसू
       -राजीव गोयल
होती ही नहीं
मोहताज पैसों की
बादशाहत
     -निगम 'राज़'
जुगलबंदी
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वर्षा की बूँदें
धान की फसल पे
टपके मोती
      विष्णु प्रिय पाठक
मोती समझ
पत्तों ने थाम रख़ी
बरखा बूँदें
      -शिव डोयले
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साँसों की नदी
गाए उम्मीद गीत
नाव ज़िंदगी
      -रमेश कुमार सोनी
खेत उदास
विष के प्रभाव से
आतंकी उगे
       -रमेश कुमार सोनी
क्या होगा वहां
जहां जाते अकेले
छोड़ के मेले
      -सुरंगमा यादव
बोया जो प्यार
दिलों में उग आया
अपनापन
      -राजीव गोयल
गर्द फांकता
अप्रवासी जीवन
दर्द टाँकता
      -निगम 'राज़'
व्याकुल नैना
बदरा से बरसे
फिर भी प्यासे
       -सुरंगमा यादव
पुन:रोधक
मेरे उनके बीच
चन्द्रग्रहण
       -विष्णु प्रिय पाठक
नदी की शैया
लगा के तकिया
सोया कमल
      -राजीव गोयल
वृद्धा आश्रम
माँ बाप खाते जहां
बेटे का गम
     -सूर्यनारायण गुप्त 'सूर्य'
बरसा आई
अलसाई छातरी
ले अंगडाई
    -सुरंगमा यादव
धरा जलती
बूँदें शान्ति पढती
हरा लिखती
       -रमेश कुमार सोनी
स्थिति विषम
माँ ने हमें सिखाया
रहना सम
         -सूर्य किरण सोनी 'सरोज'
सफ़ेद वस्त्र
बेवा के अंग पर -
केक्टस शूल
     -विष्णु प्रिय पाठक
मरी नदी
पी वर्षा संजीवनी
फिर जी उठी
     राजीव गोयल
चन्द्र ग्रहण
पूनम की रात में
रूप क्षरण
      -सूर्य कारन 'सरोज'
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगडाई
      बलजीत सिंह
मेघा बरसे
मिलन को तरसे
उषा सूर्य से
       -सुरंगमा यादव
लिए बूंदों की
रिमझिम पायल
नाचा सावन
      -राजीव गोयल
वृक्षों को वस्त्र
बसंत पहनाए
बरखा धोवे
      सुरंगमा यादव
रेत के धोरे
तेज़ पवन संग
उड़ने दौड़े
    सूर्य करण 'सरोज'

















शनिवार, 30 जून 2018

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु : जून माह

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - जून माह

रात अंधेरी
अँधेरे में रोशनी
करे तलाश
       शिव डोयले
वश न चला '
विवशता बरसी  .
नैनों की राह
        -सुरंगमा यादव
पडी फुहार
धरा पर बिखरा
नभ का प्यार
        -सुरंगमा यादव
पुष्प कमल
नारी का अंतर्मन
शीश महल
        सूर्य करण 'सरोज'
कैसा दस्तूर
बेगाने नज़दीक
अपने दूर
        -बलजीत सिंह
खुद कमाना
बस दो जून रोटी
रिश्ता पुराना
       -इंद्र कुमार दीक्षित
पानी है खून
जंग का जुनून
भूखी बंदूक
     -सुशील शर्मा
रंक की भूख
आंसू सहेज कर
पी गई दुख
    -सूर्य किरण 'सरोज'
कच्चा मकान
पसर गई नींद
मूंज की खाट
       -पुष्पा सिन्धी
प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा
        -बलजीत सिंह
पुरवा आई
चन्दन बन से वो
खुशबू लाई
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
लाचार बूढा
भर के गुब्बारों में
बेचता साँसें
        -राजीव गोयल
मन की पूंजी
प्रसन्नता की कुंजी
प्रेम सर्वस्व
       -सुरंगमा यादव
धूप मार्ग में
तपन का जुलूस
छाँव रक्षक
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
वृक्षारोपण
नव वस्त्रों से खुश
पर्यावरण
       सूर्य कारन 'सरोज'
प्रकृति रोती
धूल धुआं कचरा
जलती छाती
       -रमेश कुमार सोनी
धरा विन्यास
हरित आवरण
जग उल्लास
       सुरंगमा यादव
एक जंगल
मुट्ठीभर पादप
असंख्य साँसें
       सुशील शर्मा
पिघली बर्फ
झुकता हिमालय
जल संकट
      -डा. रंजना वर्मा
झील में चाँद
नहाया रातभर
तर-ओ-ताज़ा
      -भीम प्रसाद प्रजापतिं
डाली का फूल
नाजुक सी ज़िंदगी
करे कबूल
      -बलजीत सिंह
बोई जो नींद
अंखियों के गमले
उगे सपने
      -राजीव गोयल
अनाथ बच्ची
लावारिस घूमती
कटी पतंग
       -विष्णु प्रिय पाठक
बांह पसार
मेघों की मनुहार
करते वृक्ष
      -सुरंगमा यादव
बंजारा मन
जाएगा किस ओर
कोई न जाने
       -सुरंगमा यादव
मंद हवा सी
छू लूं चुपचाप
रूप तुम्हारा
       -सुरंगमा यादव
रात ने फोडी
सियाही की मटकी
धरा बेरंग
      -राजीव गोयल
लापरवाही
कागज़ न कलम
खरीदी स्याही
       बलजीत सिंह
झूमते वृक्ष
इठलाती बारिश
नहाता पानी
       सुशील शर्मा
आषाढी आस
कृषक स्वप्न बोता
बेटी का गौना
        पुष्पा सिन्धी
सघन वन
डोल रही पवन
बजे झांझर
      डा. रंजना वर्मा
जुगल बंदी
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हवा का झूला
झूल रही ज़िंदगी
पतली डोर
   डा. रंजना वर्मा
साँसों की लय
चलती रहे यूँ ही
कहे पवन
       सुरंगमा यादव
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सूखी खेतियाँ
बह चला आँखों से
एक दरिया
       -राजीव गोयल
प्राथमिक हो
दायित्व का निर्वाह
वास्तविक हो
        -निगम 'राज़'
तोड़ता बाँध
लहरों का उछाल
पूरा है चाँद
        -राजीव गोयल
पिता का नाम
आता ताउम्र काम
उसे सलाम
      -निगम 'राज़'
नि:शब्द हूँ मैं
पितृ दिवस आज
पापा कहाँ हैं ?
       -पुष्पा सिन्धी
पिता का होना
सूरज का उजाला
चाँदनीं रातें
       नरेन्द्र श्रीवास्तव
लड़ाई में भी
अपनी औलाद से
हारते पिता
      -शिव डोयले
हर सांस पे
पिता का हस्ताक्षर
भूलें तो कैसे ?
       -सुरंगमा यादव
सुमन खिला
उपवन महका
छू गई हवा
       -डा. रंजना वर्मा
आवागमन
श्वास-प्रियतमा का
यही जीवन
      निगम 'राज़'
मन बैसाख
सावन सी बरसी
प्रेम फुहार
      -सुरंगमा यादव
चाँद बुनता
चांदनी की चूनर
ओढ़ती धरा
      -राजीव गोयल
बरसो मेघ
फट रही बिवाई
धरा के पैर
       -राजीव गोयल
निशा विहंसी
गगन पर बिखरे
रजत पुष्प
       सुरंगमा यादव
भागते रहे
अपने परायों से
कभी खुद से
      सुरंगमा यादव
अतिविस्तृत
खगों का कर्म क्षेत्र
नभ असीम
       -डा. रंजना श्रीवास्तव
चन्द्र प्रकाश
देती रही मन को
ठण्ड मिठास
       -बी पी प्रजापति
पहली वर्षा
चीटीं बनाने लगीं
अपना घर
      विष्णु प्रिय पाठक
तुम्हारे बिन
पतझड़ का वृक्ष
मेरा जीवन
      -सुरंगमा यादव
धर दबोचें
भागते सपनों को
जिद के हाथ
       -अभिषेक जैन
ईंगुर गोली
वर्षा की हमजोली
बीरबहूटी
       -डा. रंजना वर्मा
बीमार दादा
मरम्मत न हुआ
जर्जर छाता
        -पुष्पा सिन्धी
बरखा रानी
पात पात बिखरीं
हीरे की कनीं
       -सुरंगमा यादव
कबीर मन
कभी बाहर खड़ा
कभी अंतस
       -सुशील शर्मा
वक्त की गर्द
आँगन में पसरी
बंद मकान
       -डा. राजीव गोयल
ढलता रवि
उफ़क पे बिखेरे
अनूठे रंग
       (हाइगा) -डा. राजीव गोयल
जुगलबंदी
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प्यासी नदिया
समंदर किनारे
भाग्य कोसती
       शिव डोयले
प्यासी नदिया
मेघ बरसने की
बात जोहती
      डा. राजीव गोयल
-------------
यादों का देश
भटकता फिरता
एकाकी मन
      -सुरंगमा यादव
मुग्ध वल्लरी
सावन की डोकरी
जादूगरनी
      -पुष्पा सिंघी
आँखों ने देखे
बारिश के सपने
फिसले पैर
        डा. राजीव गोयल