बुधवार, 30 नवंबर 2016

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - नवंबर माह के हाइकु-

२  ११ १६ 
हद हो गई 
कानून के ऊपर 
उनका कद 
       -संतोष कुमार सिंह 
हुआ न यकीं           
गरीबी की तस्वीर 
लाखों में बिकी 
         -राजीव गोयल (हाइगा)
देह की पीड़ा
सही, सह न सके 
मन की पीड़ा 
         -प्रियंका वाजपेयी 
गहरी होतीं 
उम्र के साथ साथ 
बुज़ुर्ग आखें 
       -प्रियंका वाजपेयी 

३ ११ १६
अमीर बन
पर दिल में ज़िंदा
फ़कीर रख
      -राजीव गोयल
मन बांसुरी
जीवन है बजाती
राग करुण
       -वी पी पाठक
रुक जा वक्त
मिला है यार मेरा
बाद मुद्दत
       - राजीव गोयल

४ ११ १६
माटी की गंध
कलम की सुगंध
रचाते छंद
      -प्रदीप कुमार दाश
दिल की खुशी
माँगते फकीर से
दौलतमंद
       -राजीव गोयल
मन के रिश्ते
मन में ही बसते
हुए न सस्ते
        -डा रंजना वर्मा

५ ११ १६
ओढ़ के हिम
मना रहे पहाड़
शरदोत्सव
       -राजीव गोयल
नयन उगा
आंसू बन टपका
एक सपना
      -डा. रंजना वर्मा
धीरे धीरे से
गुज़रती जाती है
वाह ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा

६ ११ १६
निकली भोर
सजाए माथे पर
सूर्य बिंदिया
      -राजीव गोयल (हाइगा)
बेला गोधूलि
सूरज लेने चला
जल समाधि
       राजीव गोयल (हाइगा)

७ ११ १६
चटकी कली
लूटने को आतुर
चले भंवरे
       -डा. रंजना वर्मा
छुपाए दर्द
जीता रहता हूँ मैं
दर्द ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा
गिरफ्तार है
सुमन की जेल में
पराग चोर
      -वी पी पाठक
सर्द मौसम
सौउं मैं सुकून से
ओढ़ के धूप
      -राजीव गोयल
zoom your happiness
in the canvas of life.
happiness is life .
      - जितेन्द्र वर्मा

८ ११ १६
वृक्ष अकेला
फल अनगिनत
दे निरंतर
      -डा. रंजना वर्मा
मन भावन
कभी जो रोकडा था
जंजाल हुआ
       -दिनेश चन्द्र पाण्डे

९ ११ १६
जली पराली
प्रदूषित है हवा
घुटती साँसें
      डा. रंजना वर्मा
कल से आशा
कल का पछतावा
ज़िंदगी यही
       -राजीव गोयल
धागे दूब के
पिरो जाती सुबह
मोती ओस के
      -राजीव गोयल
उपेक्षा तूने
दी झोली भर मुझे
कैसी ये भीख
      आर के भारद्वाज
नामुमकिन
पाना निजातेदर्द
दर्द ज़िंदगी
       -जितेन्द्र वर्मा

१० ११ १६
सूरज पंख
फड़फड़ाए अब
लो भोर हुई
       -मंजूषा मन
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जुगलबंदी  -

मन चकरी
घुमाती रही प्रश्न
मैं स्वयं कौन ?
      -वी पी पाठक
सदा से रही
आत्म तत्व की खोज
नहीं मिलता
      -डा. रंजना वर्मा  
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११ ११ १६
घर में आई
चुगलियों की भेंट
ईर्ष्या की जीभ
      -अभिषेक जैन
माथे पे बल
चिंताओं की लकीरें
ओ! काला धन !
      -प्रियंका वाजपेयी
मिट्टी की नाव
कैसे पहुंचे पार
पानी सवार
       -वी पी पाठक
गिरि कोख से
झरता झर झर
वह निर्झर
      -प्रदीप कुमार दाश
लिखता रवि
किरण कलम से
भोर के गीत
       -राजीव गोयल

१२ ११ १६
ऊंचे दरख़्त
नभ तक ले जाते
हमारी बात
       -प्रियंका वाजपेयी
पहाडी नदी
जैसे बहती सदी
अनवरत
         -डा. रंजना वर्मा
बादल गरजे
लडे  एक दूजे से
बरसे नहीं
        -जितेन्द्र वर्मा
घुन करता
उसी अन्न में छेद
ज़िंदा जिस पे
        -राजीव गोयल
प्रदूषण से
हवा का दम घुटा
सांस ले या दे
         -आर के भारद्वाज

१३ ११ १६
काली रात है
सूरज सो गया है
चाँद डटा है
        -अमन चाँदपुरी
बहती नदी
देख सूरज जला
नदी झुलसी
       -अमन चाँदपुरी      
सूरजमुखी
उजाला पक्ष देखे
रहता सुखी
        -मुकेश शर्मा
वाह रे साधू
भोगी के धन पर
योगी का ठाठ
       -वी पी पाठक

१४ ११ १६
बैठी जाकर
मंदिर के अन्दर
काली दौलत
     - वी पी पाठक
बाल दिवस
कितना उपेक्षित
बाल जीवन
        -डा. रंजना वर्मा
याद पुरानी
टूटते अनुबंध
मेरी कहानी
       -निगम 'राज'
विद्द्युत तार
कतारबन्द खग
बिल्ली ताक में
      -तुकाराम खिल्लारे
पतझर में
बन तितली उड़ें
पीली पत्तियां
       -राजीव गोयल
दबे थे नोट
मोहनजोदड़ो से
निकले आज
        -कैलाश कल्ला
बच्चे हंसते
झर झर हंसते
हरसिंगार
      - वी पी पाठक

१५ ११ १६
सिन्धु न बढ़ा
नदी पीछे न मुड़ी
हो गए एक
        -कैलाश कल्ला
आंधी दौड़ी है
पत्ते बने तितली
भू बनी गुल
        -विभा श्रीवास्तव (हाइगा)
हुआ फरार
भगाकर रात को
आशिक चाँद
         -अभिषेक जैन
हांपता  रोड
सुबह टहलने
निकला तोंद
     -वी पी पाठक
बूंद से सिन्धु
बदले कई रूप
वस्तु तो एक
       -कैलाश कल्ला
मन सलाई
लेके यादों के धागे
बुने अतीत
      -राजीव गोयल

१६ ११ १६
ख़्वाब ने देखी
हकीक़त पहले
दंग हुआ मैं
      -जितेन्द्र वर्मा
करे खोखली
संदेह की दीमक
रिश्तों की नींव
       -राजीव गोयल
जुगुनू लिए
ढूँढ़ रही है चाँद
मावसी रात
         -राजीव गोयल
थका कार्मिक
बोतल का सहारा
सोता टुन्न
      -जितेन्द्र वर्मा
प्यारी गुड़िया
मेड इन इंडिया
विदेशी बोल
       -वी पी पाठक

जुगल बंदी --

मन मंजूषा
रखी सहेजकर
आंसू की बूंद
     डा. रंजना वर्मा

१७ .११.१६
रूमाल नहीं
दो मीठे बोल चाहें
भीगी पलकें
        -मंजूषा मन (हाइगा)
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जुगलबंदी --

सिन्धु चूमने
नीचे उतारा भानु
डूब ही गया
       -कैलाश कल्ला
जलते बदन
नहाने आया सूर्य
लगाया गोता
       -मुकेश शर्मा (हाइगा)
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बहती हवा
बहका ले जाती
मन को मेरे
      -अमन चांदपुरी
बैठी चिड़िया
देख हाथ पसारे
छोटी बिटिया
        -कैलाश कल्ला

१८ ११ १६
मेरा वतन
खुशियों का चमन
अभिनन्दन
     -डा. रंजना वर्मा
खोल ही दी
आफत की चाबी ने
बंद दिमाग
        -अभिषेक जैन
काली कमाई
गौरैया के पेट में
हाथी का बच्चा
        -वी पी पाठक
सर्द मौसम
सो रहा सूरज
ओढ़ के धुंद
      -राजीव गोयल

१९ ११ १६
अंजान स्वयं
केवल आडम्बर
धोखा खुद से
        -प्रियंका वाजपेयी
जगते बच्चे
सुबह हो गई क्या
कहते बच्चे
      -प्रियंका वाजपेयी
भोर ज़िंदगी
बदलती शाम में
डूबी रात में
       -जितेन्द्र वर्मा
छपे सतत
मन टकसाल में
इच्छा के सिक्के
     अभिषेक जैन
बेच ईमान
कमाए जो नोट
कागज हुए
       -राजीव गोयल

२० ११ १६
गंदगी में भी
है फूल महकता
उन्नत माथा
        -तुकाराम खिल्लारे
छुए पवन
सिहर उठता है
झील का तन
     -राजीव गोयल
पूनों]की रात
लहरें बन नाचे
सिन्धु अपार
      कैलाश कल्ला
बाहर बिल्ली
चूहेदानी में चूहा
दोनों बेचैन
       -राजीव गोयल

२१ ११ १६
प्याली में सुख
प्रेम की एक चुस्की
मिटेंगे दुःख
       -मंजूषा मन
मांगे थे पैसे
दे गई प्रवचन
पिता की जेब
       -अभिषेक जैन
हांक ले गया
पवन गड़रिया
मेघ रेवड़
      -राजीव गोयल  
   
२२ ११ १६
मन बागीचा
उगे यादों के फूल
टपके आंसू
       कलाश कल्ला
लगता रहा
पहरे पे पहरा
चोर आज़ाद
        -वी पी पाठक
मिलें बिछड़े
जैसे क़त्ल मुझको
किश्तों में करें
      -राजीव गोयल

23 11 16
जुगलबंदी

झील जल में
खेल रहा चन्द्रमा
लहरों संग
     -डा. रंजना वर्मा
स्तब्ध चन्द्रमा
झील में देखकर
जुड़वां भाई
      -राजीव गोयल
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चुरा के भागी
बगिया से सुगंध
चोरनी हवा
       -राजीव गोयल
दोस्तों का जाल
पैगाम पे पैगाम
फिर अकेला
      -वी पी पाठक

२४ ११ १६
अबला नहीं
सरहद पे लड़ी
सबल खड़ी
       -वी पी पाठक
प्यार की बाढ
सहजते न बने
माँ का प्यार
        -जितेन्द्र वर्मा
भोर का तारा
अम्बर में टहले
मुंह अँधेरे
       राजीव गोयल
चाँद तनहा
झील की पगडंडी
चला अकेला
       - प्रदीप कुमार डास (हाइगा)

२५ ११ १६
कामनाएं हैं
हिरन के छौनों सी
भागती जाएं
       -डा. रंजना वर्मा
दिल्ली से आई
पोटली विकास की
हवा हवाई
       -वी पी पाठक
पल रहे हैं
जाने कितने गम
चुप्पी के नीचे
        -राजीव गोयल (हाइगा)
चाँद उतरा
नदिया में नहाने
लहरें खुश
      -जितेन्द्र वर्मा

२६ ११ १६
टूटती आस
बिखर जाते  ख़्वाब
उठती टीस
       राजीव गोयल
मूँगफलियाँ
झोला भर के लाए
बाबूजी आए
        -मंजूषा मन
नहा ओस में
हो गई तरोताजा
भोर की धूप
       +राजीव गोयल

२७ ११ १६
सर्द मौसम
कुछ धूप बचा लें
रात के लिए
       -राजीव गोयल
धान बालियाँ
महकती कुटिया
कृषक खुश
        -प्रदीप कुमार दाश
kindle the lamp
darkness all around
something burning?
         -Tukaram Khillare

28 11 16
मिथ्या उर्मियाँ
मरुजल छलका
मोह फंसाया
     -विभा श्रीवास्तव
किरणांगुली
विद्रोहणी फोड़ती
ओस गुब्बारे
     -विभा श्रीवास्तव
मटर खिली
नीलम की सी डली
खेत अंगूठी
       -डा. रंजना वर्मा

२९ ११ १६
बुलबुलों से
ये तुम्हारे वायदे
उभरें टूटें
        -राजीव गोयल
पन सउआ
बंद ऐसा हुआ
चिढाए मुआ
       राजीव निगम 'राज'
रस्सी को सांप
कहकर डराया
खूब सताया
       -मंजूषा मन

३० ११ १६
आई धरा पे
ओढ़ धूप का शौल
उजली भोर
       -राजीव गोयल
नाचती धूल
झरोंखों से झांकती
जब भी धूप
      -दिनेशचन्द्र पाण्डेय

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समाप्त


















2 टिप्‍पणियां:

  1. गुरुदेव
    सादर प्रणाम ।
    सभी हाइकु लाज़बाब है बहुत बहुत आभार।
    गुरुवार पुनः प्रणाम।

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