सोमवार, 2 जनवरी 2017

श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु - दिसंबर माह २०१६

१.१२. १६
रात अंधेरी
शिकार पे निकली
डायन सर्दी
      -राजीव गोयल

२ १२ १६
होठों में दबा
वो हंसी का टुकड़ा
ढाए गज़ब
      -राजीव गोयल

३.१२ १६
रात की रानी
महकी रात भर
बनी कहानी
        -राजीव निगम राज
जो काली बिल्ली
काट रही थी रास्ता
दब के मरी
         -राजीव गोयल

४ १२ १६
पथिक संग
चलता रहा रात
चाँद अकेला
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
श्रमिक कथा
आखों से छलकती
उर की व्यथा
       प्रदीप कुमार दाश
तेज़ हवाएं
समुद्र से आ गातीं
विप्लव गीत
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
खेत में गिर
कृषक का पसीना
उगाए सोना
       -राजीव गोयल

५ १२ १६
उम्र पर्यंत
तलाशता ही रहा
बाहर खुदा
      -प्रियंका वाजपेयी
कुचल गए
मोटी किताबों तले
मासूम फूल
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
जलता दीप
तन्हाई में गूँजता
खामोश गीत
      -राजीव गोयल
राहें कोहरा
एक एक कदम
खुलती जातीं
         -प्रियंका वाजपेयी

६ १२ १६
चन्दा उड़ेले
मरमरी चांदनी
रात नहाए
        -राजीव गोयल
माँ का आँचल
रजाई से भी भारी
मिटाए सर्दी
         -कैलाश कल्ला
जला अलाव
सभी मिल,बातों का
करें हवन
         -वी पी पाठक

७ १२ १६
फूलों से लदा
बिन पत्तों का पेड़
टेसू का दर्द
      -राजीव गोयल
ये जिंदगानी
अनकही कहानी
नई पुरानी
      -डा. रंजना वर्मा
बातूनी पेड़
बिछड़ी जो पत्तियाँ
हुआ खामोश
      -राजीव गोयल
पहचानिए
रचयिता भीतर
जग रचना
       -जितेन्द्र वर्मा

८ १२ १६
आया शिशिर
हुआ टेसू खामोश
बुझे अंगार
       -राजीव गोयल
हरा के धूप,
आ ही गया कोहरा
कोहराम सा
        -आर के भारद्वाल
षोडशी संध्या
अन्धकार से डरी
सिन्धु में गिरी
         -डा. रंजना वर्मा

९ १२ १६
सूखे गुलाब
गुम हो गई महक
स्मृतियाँ ताज़ी
         -प्रदीप कुमार दाश
अनुभूतियाँ
मन का रत्न कोष
भरती रहीं
        -डा. रंजना वर्मा
बो गए ओले
किसान के खेत में
क़र्ज़ के पौधे
        -राजीव गोयल
ये चदरिया
बुनी नेह धागों से
ओढ़ो सप्रेम
     -मंजूषा मन

१० १२ १६
दो सुखन

जागता रहा
सब जगह खोदा
सोना न मिला
      -आर के भारद्वाज
अनाथ बच्ची
मेरे लिए दौलत
पा-ली है मैंने
      आर के भारद्वाज
सूखे से फटे
बिवाइयों से दुखे
खेतों के पाँव
      -प्रीती दक्ष
गुज़री रात
आया न कोई ख़्वाब
आँखें उदास
     -अमन चांदपुरी
शब्द कटार
करती खामोशी पे
अचूक वार
       -राजीव गोयल

११ १२ १६
ओस के चाटे
नहीं बुझती प्यास
चाहिए जल
       -अमन चाँदपुरी
अंजाना कौन
एक बेमानी प्रश्न
अपना कौन
       -जितेन्द्र वर्मा

१२ १२ १६
प्रात की वेला
करते हरि वंदन
शुक के स्वर
       -डा, रंजना वर्मा
बौराए दिन
सन्न सन्न बहतीं
सर्द हवाएं
      -वी पी पाठक

१३ १२ १६
तूफां के पैर
जम गए धरा पे
उखड़े पैर
       -अभिषेक जैन
उम्र  ने बोई
तजुर्बों की फसल
सहेजूँ कैसे
     -प्रीति दक्ष
वीर पहाड़
पहन हिम वर्दी
अटल खडा
       -राजीव गोयल

१४ १२ १६
गो वत्स स्वर
बाबा की पुकार
माता के लिए
      -डा. रंजना वर्मा
मन बावरा
खंगाले उम्र भर
खोखले रिश्ते
       -प्रियंका वाजपेयी
उग न सका
दगा के कोहरे में
वफ़ा का सूर्य
      -अभिषेक जैन

१५ १२ १६
आसमां चुप
सरसराता  धुंआ
चाँद तनहा
       -प्रियंका वाजपेयी
पत्ते की नाव
हवा खेवनहार
चींटी सवार
      -वी पी पाठक
 
१६ १२ १६
बुढापा बैठा
बाहर धूप सकने
ठंडा जीवन
       -जितेन्द्र वर्मा
कांपते होठ
अनकही कहते
मौन की भाषा
        -डा. रंजना वर्मा
प्रिय की यादें
वर्षा के बुलबुले
फूटे बतासे
       -वी पी पाठक

१७ १२ १६
डूबती नदी
किनारों की चाह में
खूब तड़पी
       -आर के भारद्वाज
डूबा है चाँद
मिलने तेरी याद
चली आई है
       -जितेन्द्र वर्मा

१८ १२ १६
भागी निंदिया
तिजोरी के सोने ने
सोने न दिया
         -अभिषेक जैन
पंख पसार
उड़ते पक्षी संग
मैं उड़ जाऊं
      -अमन चांदपुरी (हाइगा)
हंसता नाती
नानाजी ढूँढ़ रहे
अपनी लाठी
        - दिनेश चन्द्र पांडे

१९ १२ १६
जिया जो कल
बनगया है भूत
आज डराता
     ---जितेन्द्र वर्मा
गज़र गया
छोड़ याद केंचुली
पिछला वर्ष
       -राजीव गोयल

२० १२ १६
सच का सीना
दूभर कर देता
झूठ का जीना
       -आर के भारद्वाज
खुशी के साज
बजें जिन घरों में
स्वर्ग वहीं है    
      -आर के भारद्वाज
बंद किताबें
मज़बून सीने में
दबा के रोईं
     -आर के भारद्वाज
फूल उगते
महकते, टूटते
देते सन्देश
      --मुकेश शर्मा

२१ १२ १६
तापते रहे
प्रपौत्रों के अलाव
बूढ़े नयन
      -प्रियंका वाजपेयी
काश ये मन
न होता नाग जैसा
विश्वासघाती
     -डा. रंजना वर्मा
मन पटल
तन्हाइयों का ब्रश
उकेरे यादें
      -राजीव गोयल
फूल न हुआ
इसी सोच में,,रहा
सूखता काँटा
       आर के भारद्वाज

२२ १२ १६
स्वर्णिम रेखा
सिन्धु उर्मियों पर
स्वप्न सरीखी
       -डा. रंजना वर्मा
तोड़ तपाई
लाल कली लौंग की
फैली सुगंध
     दिनेश चन्द्र पाण्डेय
तुम्हारे लिए
कायनात है पूरी
सोच के भोगो
       -जितेन्द्र वर्मा

२३ १२ १६
खोजे चिड़िया
कटे वन में ठौर
हत्यारा कौन ?
        -रमेश कुमार सोनी बसना
फूलों का दर्द
खुश्बू से भरे , पर
काँटों से घिरे
      -आर के भारद्वाज
बांटता फिरे
चिट्ठियाँ सुगंध की
पवन अश्व
      -राजीव गोयल
हार पे हार
निर्लज्ज है बहुत
फिर तैयार
     -अमन चांदपुरी
गिरा कहर
बनकर कोहरा
थमा शहर
      -राजीव गोयल
सच दीखता
झूठ के बीच जैसे
श्याम में श्वेत
      -जीतेन्द्र वर्मा

२४ १२ १६
नैनों के घन
बरसों हैं बरसे
मन तरसे
      -डा. रंजना वर्मा
पपीहा प्यास
पुकारे दिन रात
पीया न आए
      -विष्णु प्रिय पाठक
जुगल बंदी --

बचा न पाए
आँगन की तुलसी
संध्या दीपक
        -प्रियंका वाजपेयी
जलें न दिए
आजकल घरों में
तुलसी तले
        -राजीव गोयल
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२५ १२ १६
ठण्ड की रातें
अनकही सी बातें
कितनी लम्बी
      -डा. रंजना वर्मा
खेलते रहे
लुका-छिपी का खेल
कोहरा धूप
      -वी पी पाठक
कंडे की आंच
सुलगती रहती
अम्मा तापती
       -जितेन्द्र वर्मा
लता का स्वर
लवंग लतिका की
घुली मिठास
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय

२६ १२ १६
खो गई धूप
ढूँढ़ती रही शीत
हाथ मलती
       -वी पी पाठक
परिंदे लौटे
जी उठा फिर से
सूखा दरख़्त
      -राजीव गोयल

२७ १२ १६
याद आगया
वृद्धाश्रम में माँ को
बेटे का ज़ख्म
     -अभिषेक जैन
रेल खिड़की
मंज़र नजारों का
खुली किताब
      -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
सत्ता चरित्र
हिमपात के वक्त
सूर्य लापता
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
मैं और तुम
नदी किनारे खड़े
फिर भी प्यासे
       -आर के भारद्वाज
दो सुखन
(१)   आतंकी मरा
चुभा काँटा निकला
कंटक कटा
       -आर के भारद्वाज
(२)   आंधी में पेड़
मुठभेड़ में गुंडा
ढेर हो गया
        -आर के भारद्वाज
जुगलबंदी -

हिमपात से
प्रसन्न पर्यटक
नव उमंग
       -डा. रंजना वर्मा
आए सैलानी
पहाड़ों ने पहनी
बर्फ़ीली टोपी
      -राजीव गोयल
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आया न चाँद
रोता रहा चकोर
ओस गवाह
       -राजीव गोयल

२८ १२ १६
जोश ढो लाता
भोर रश्मि सारंगा
धुंध मिटाता
       -विभा श्रीवास्तव
गरीब झुग्गी
पक रही है भूख
ठन्डे चूल्हे पे
        -राजीव गोयल
दुःख में सुख
ढूँढ़ता रहता हूँ
ऐसे जीता हूँ
       जितेंद्र वर्मा

३० १२ १६
स्वप्न धवल
ख्यालों-मुंडेरों सजे
वर्ष नवल
     -विभा श्रीवास्तव
धूप-कोहरा
खेलें आंखमिचौली
सखी-सहेली
      -रमेश कुमार सोनी
ठंडी हवाएं
जिस्म में समाकर
रूह जमाएं
       -निगम 'राज़'
बर्फ के फोए
उड़ते हवाओं में
बांधते समां
       -जितेन्द्र वर्मा
मेरे जो लम्हे
बहका लिए तूने
उन्हें लौटा दो
      -आर के भारद्वाज

३१ १२ १६
हटीला बड़ा
प्रकाघ की राह में
कुहासा खडा
     -संतोष कुमार सिंह
बहती जाएं
भावों की नदिया में
शब्दों की नौका
     -राजीव गोयल
झरती रही
रात भर कामिनी
फूलों की सेज
      -डा. रंजना वर्मा
बारह माह
खट्टा मीठा सा स्वाद
गुज़रा साल
     वी. पी .पाठक
राम राम जी
साल का आख़िरी है
दिनमान जी
      -निगम 'राज़'
 सूर्य ने भेजा
किरणों भरा जाल
कोहरा फंसा
       -आर के भारद्वाज

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3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! माह के श्रेष्ठ हाइकु एक साथ। अद्वितीय। और उहमें मेंरी रचनाओं को भी स्थान देने के लिए कोटिशः आभार।

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  2. बहुत उच्च कोटि के हाइकु .....
    इस टिप्पणी सहित आपका आभार ।

    निगम'राज़'

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