मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु / अक्टूबर माह

श्रेष्ठ हिंदी हाइकु - अक्टूबर माह

मनाओ रोज़
पहली अक्टूबर
दिन वरिष्ठ
     डा. सुरेन्द्र वर्मा
दादा के ख़ास
किताबें चश्मा लाठी
ढेर दवाएं
     नरेन्द्र श्रीवास्तव
आई बरखा
पात पात हरखा
जीवन धन्य
     -डा. रंजना वर्मा
गिर जाते हैं
समय की शाखों से
उम्र के पन्ने
        -अमन चांदपुरी
पत्ते आश्रम
वर्षा-बूँदें ठहरें
तो कभी ओस
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
पल खुशी के
फूल पे बैठी ओस
भाग्य सराहे
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
गोधूलि वेला
समेटे सूरज ने
धूप के पंख
       -राजीव गोयल
शब्द ही शब्द
ढूँढ़ते हैं भीड़ में
अपने अर्थ
      -मनीषा सक्सेना
याद दरख़्त
कभी नहीं सूखता
होता सघन
       -डा. रंजना वर्मा
धूप ने दिए
धरती को जो ज़ख्म
छाँव ने सिए
        -राजीव गोयल
यह तुम हो
या चाँद पूनम का
हैरत में हूँ
       -शिव डोयले
पूनों की रात
बेकरार लहरें
छूने को चाँद
       -राजीव गोयल
दूध की खीर
है छत पर टंगी
मन अधीर
     सुशील शर्मा
ये जिंदगानी
क्षण भर की ही है
झूठी कहानी
       -सूर्य नारायण 'सूर्य'
घूँघट काढ़े
बदरी का दुपट्टा
आया है चाँद
       -जितेन्द्र वर्मा
चढती रात
ओर निखर आया
चाँद का नूर
       दिनेश चन्द्र पाण्डेय
भागता मन
विगत की गली में
यादें खोजता
       -शिव डोयले
शुभ्र धवल
नदिया में बहती
चन्द्र किरण
       -सुशील शर्मा
निकला चाँद
छलनी से बरसे
श्वेत किरण
      विष्णु प्रिय पाठक
बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अंगड़ाई
      -वलजीत सिंह
जल-प्रपात
पृथ्वी को प्रकृति का
एक सौगात
       -सूर्य नारायण गुप्त 'सूर्य'
भोर-किरण
शहनाई की धुन
बेटी हमारी
      -शिव डोयले
सर्द मौसम
पहाड़ ओढ़े खड़े
श्वेत कम्बल
      राजीव गोयल
कितनी बार
टहनी तोड़ डाली
फिर से उगी
      - तुकाराम खिल्लारे
उतरी रात
सांझ की सीढियों से
बिना आहट
      -राजीव गोयल
घट जाएगा
तम का ये पसारा
दीप हुंकारा
      -जगदीश व्योम
दीपक जला
हार कर अन्धेरा
पैरों में गिरा
      राजीव गोयल
सूर्य से होड़
करे सुबह का तारा
नभ चकित
       -जीतेन्द्र वर्मा
दीप प्रकाश
अँधेरे के रथ पे
छुए आकाश
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
ऊधो का देना
न ही माधों से लेना
घोंघे का सुख
       -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
बिखेरे जुल्फें
पहाड़ों से उतरी
सांवली रात
       -राजीव गोयल
नन्हे  बल्बों में
गुम हो गया दीया
तेल-गंघ भी
     -डा. जगदीश व्योम
रोशनी दी है
रंगीन झालरों ने
दीया उदास
      -निगम 'राज़'
फूटे पटाखे
दीप में भरा तेल
उछल पडा
      -विष्णु प्रिय पाठक
कल का पल
चला गया मुझसे
कर के छल
      -सूर्य नारायण 'सूर्य'
अकेला चाँद
देख रहा भू पर
फैला उन्माद
      -भीम प्रजापति
पीड़ा बरसी
आंसू से भर गईं
झील सी आँखें
      नरेन्द्र श्रीवास्तव
खुशी जो मिली
आंसू झट आ गए
यादें लेकर
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
यादों की नाव
मन के सागर में
गोते लगाए
      -राजीव गोयल
भूख से मौत
खबर सुनकर
रोटियाँ आयीं
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
बाज़ार ऐसा
सलाह और धोखे
मिलते मुफ्त
        -नरेन्द्र श्रीवास्तव
अंधे बहरे
चीखती रही वह
देखा न सुना
       -नरेन्द्र श्रीवास्तव
सखा कन्हैया
सिंगार संवारत
लेत बलैयां
       -प्रीती दक्ष
है भर जाता
त्यौहार दीवाली का
समरसता
       निगम 'राज़'
कर बस में
ख्वाहिशों का रथ
सारथी तू ही
       -राजीव गोयल
पंछी जुलाहा
तिनकों से बुनता
नीद की काया
       -राजीव गोयल
महल बड़े
गरीब दुखियों की
लाश पे खड़े
        -विष्णु प्रिय पाठक
वीरान आँखें
पहचान खोजती
बीते कल की
        -शिव डोयले
नज़रें मिलीं
अनकहे उतरी
दिल पे बात
        -दिनेश चन्द्र पाण्डेय
शिशु गोद में
सपनों का संसार
माँ की आँखों में
         -नरेन्द्र श्रीवास्तव
मिटा फासला
मन घट ढलका
रस छलका
       -डा. रंजना वर्मा
मन हिरना
चहके दिन रात
धरे धीर ना
       -भीम प्रजापति
किया विकास
न्यू बुलेट पे बैठा
ग्राम प्रधान
       -विष्णु प्रिय पाठक
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समाप्त 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक श्रम को सादर नमन
    आभारी हूँ

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  2. मेहनत रंग लाती है तो ख़ुशी बढ़ जाती है ....
    साधुवाद व धन्यवाद!

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